अधिकमास – मलमास – पुरुषोत्तम मास 

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सौर मास और चांद्र मास में सामंजस्य बनाए रखने के लिए अधिकमास की परिकल्पना हमारे पूर्व विद्वानों द्वारा की गई है। सूर्य सिद्धांत, सिद्धांत शिरोमणि, ब्रह्म सिद्धांत आदि ग्रंथों के अनुसार जिस चान्द्र मास में सूर्य सक्रांति ना हो, उस चान्द्र मास को अधिकमास कहा जाता है। इस मास को आध्यात्मिक विषयों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है जिस कारण इसे “पुरुषोत्तम” मास भी कहा जाता है। पुरुषार्थ चिंतामणि के अनुसार एक अधिकमास से दूसरे अधिकमास तक की अवधि 28 महीने से लेकर 36 महीने के अंदर-अंदर होना संभव रहता है इसलिए हर तीसरे वर्ष में अधिकमास की पुनरावृत्ति होती है। 

वैसे तो वर्ष में बारह महीने होते हैं लेकिन जब 12 से ज्यादा हो तब ये अतिरिक्त महिना ही अधिकमास कहलाता है। इसे मलमास भी कहा जाता है, मल अर्थात व्यर्थ या बेकार या मैल भी कह सकते है। जो बेकार की चीजें या बातें मनुष्य अपने दिल-दिमाग में ढोकर चलता है, उन सभी का त्याग इस मास में गंगा जी में स्नान कर प्रवाहित कर देने से पुण्य फलों में वृद्धि होती है। मन के मैल का त्याग इस मास में करना सर्वोत्तम कहा गया है। 

भगवान विष्णु जी ने स्वयं अपना नाम “पुरुषोत्तम” देकर कहा है कि अब मैं इस मास का स्वामी हो गया हूँ और इसका नाम पूरे जगत में पवित्र होगा और मेरा नाम होने से यह मास अन्य सब मासों का अधिपति होगा। इस पुरुषोत्तम मास में प्रतिदिन स्नान, दान, जपादि करने से लोगों के दु:ख, क्लेश, शोक, पाप और दारिद्रय आदि का निवारण हो जाता है। जो मनुष्य श्रद्धा से, भक्ति से व्रत-उपवास रखता है, भगवान विष्णु जी का पूजन करता है, पुरुषोत्तम माहात्म्य का पाठ करता है या सुनता है, दान करता है तब वह मनोवांछित फल प्राप्त करता है और अंत में गोलोक पहुंचकर श्रीकृष्ण की शरण में रहता है। 

वर्ष 2026 में 17 मई से अधिकमास आरंभ हुआ है और यह 15 जून 2026 तक रहेगा। अधिकमास में विवाह करना, यज्ञ, देवता की मूर्ति स्थापना, महादान, मुंडन, पहली बार किसी देव तीर्थ की यात्रा, नवग्रह में प्रवेश, भूमि खरीदना, नई गाड़ी खरीदना आदि कार्य वर्जित माने गए हैं। 

 

अधिकमास में वर्जित कार्य 

नववधू का प्रवेश, नव – यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण करना, किसी भी व्रत का उद्यापन करना, नवीन अलंकार, नये  वस्त्र धारण करना, कुआँ, बावली, बाग, तालाब आदि खोदना, किसी कामना से व्रत का आरंभ, सोना (स्वर्ण), भूमि, तुला, गाय आदि का दान, अष्टका श्राद्ध, उपनयन, दूसरे वर्ष का श्राद्ध, उपाकर्म कर्मों का सम्पादन आदि को निषेध माना गया है। किसी भी तरह का कोई शुभ कार्य नहीं किया जाता है। 

 

दान-स्नान 

इस मास में दान, स्नान, पूजा आदि का विशेष महत्व है। किसी पवित्र नदी, तालाब अथवा कोई भी पवित्र स्थान पर स्नान किया जा सकता है। इस पुरुषोतम मास में भगवान विष्णु की आराधना की जाती है, इसका अत्यधिक महत्व है। पुरुषोत्तम माहात्म्य, विष्णु स्तोत्र, विष्णु सहस्त्रनाम, श्रीसूक्त, पुरुषसूक्त आदि पाठों का अत्यधिक महत्व है। कोई भी एक पाठ करना चाहिए। 

अगर प्रतिदिन संभव न हो तब इस माह की समाप्ति पर स्नान, जप तथा अपनी सामर्थ्यानुसार दानदि करना चाहिए। इस माह में कुछ वस्तुओं का दान शुभ माना गया है, जैसे – गुड़, गेहूं, शुद्ध घी, वस्त्र, मिठाई, दाख, केले, ककड़ी, मूली, कूष्माण्ड अर्थात कद्दू या पेठा आदि का दान दक्षिणा के साथ। माह की समाप्ति पर ही भगवान को तीन बार अर्घ्य देना चाहिए और भगवान विष्णु के 33 नामों का पाठ करना चाहिए। 

 

भगवान विष्णु के 33 नाम 

विष्णुं, जिष्णुं, महाविष्णुं, हरि, कृष्णं, अधोक्षजम्, केशवं, माधवं, रामं, अच्युत्यं, पुरुषोत्तमम्, गोविन्दं, वामनं, श्रीशं, श्रीकृष्णं, विश्वसाक्षिणं, नारायणं, मधुरिपं, अनिरुद्धं, त्रिविक्रमम्, वासुदेवं, जगद् योनिं, अनन्तं, शेयशायिनम्, सकर्षणं, प्रद्युम्नं, दैत्यरिं, विश्वतोमुखम्, जनार्दनं, धरावासं, दामोदरं, मघार्दनं, श्रीपतिं ।।