
बृहत् पराशर होरा शास्त्र के 98वें अध्याय में तीन पुत्रों के बाद पुत्री अथवा तीन पुत्रियों के बाद पुत्र के जन्म के फलों के बारे में और उनकी ग्रह शान्ति के विषय में भी बताया गया है। आइए जानें :-
श्लोक 1,2 का अर्थ
पराशर जी बोले – अब मैं अन्य दोषप्रद लक्षण के बारे में कहता हूँ। तीन पुत्रों के बाद पुत्री का या तीन पुत्रियों के बाद पुत्र का जन्म हो तो त्रिखल जन्म या त्रीतर जन्म (त्रि का अर्थ है 3 और इतर का अर्थ है दूसरा) कहलाता है। ऐसी स्थिति में पिता व माता के कुल में अरिष्ट भय होता है। अतः ऐसा योग होने पर कंजूसी न करते हुए शान्ति विधान करना चाहिए।
श्लोक 3,4 का अर्थ
शान्ति हेतु सूतक निवृति के बाद शुभ समय व् दिन (चन्द्र तारा बलयुक्त) में आचार्य व अन्य पंडितों का वरण करके ग्रह यज्ञ करते हुए शान्ति करें। चारों दिशाओं में चार कलशों पर पूर्व में ब्रह्म, दक्षिण में विष्णु, उत्तर में महेश व पश्चिम में इंद्र की सोने की प्रतिमा स्थापित करके पूजा करें। कलश स्थापन विधि से अनाज के ढेर पर कलश स्थापित करें। गणेश, नवग्रह, क्षेत्रपाल, योगिनी आदि का पूजन व सूर्य भगवान् की विशेष पूजा सर्वत्र विहित ही है।
श्लोक 5,6,7,8,9 का अर्थ
तत्पश्चात चार रुद्र सूक्त व शान्ति सूक्त (शांतिमंत्र, शान्त्यध्यायोक्त) पढ़ें। आचार्य तत्तत देवों का हवन करता है तथा प्रत्येक कलश पर प्रधान देव की स्थापना करते हुए, एक एक ब्राह्मण उस देवता का जप करता रहे। आचार्य घी, तिल व चरु का हवन करें। आहुतियों की संख्या 1008 या 108 या 28 यथावसर रखें। ब्रह्मा आदि सब देवताओं के मंत्र अपने-अपने वेदानुसार लें। हवन के पश्चात स्विष्टकृत आहुति, बलिदान (दिक्पाल, क्षेत्रपाल बलि) एवं पूर्णाहुति दें।
तत्पश्चात सपरिवार शिशु का अभिषेक करें। सब ब्राह्मणों व आचार्यों को दक्षिणा दें। पश्चात कांसे के बर्तन में घी से छाया पात्र दान करें। बाद में दीनों, अनाथों को भी अन्नादि (तीन अन्न, तीन प्रकार के वस्त्र, तीन धातु) का यथाशक्ति दान करें।
हे मैत्रेय ! इस प्रकार शान्ति करने से सब प्रकार के अरिष्ट दूर हो जाते हैं।
