बृहत् पराशर होरा शास्त्र – अथ दर्शजन्मशान्त्यध्याय:

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बृहत् पराशर होरा शास्त्र के 89वें अध्याय में दर्श अर्थात अमावस्या के दिन जातक जन्म के विषय में बताया गया है कि इस तिथि में जन्म के क्या फल हो सकते हैं और इसके निवारण के विधि-विधान का भी वर्णन किया गया है।   

पराशर बोले – श्लोक 1,2,3 का अर्थ 

जातक का जन्म अमावस्या में जन्म हो तो माता-पिता व स्वयं की दरिद्रता वित्त, पुत्र, यश आदि धनों की कमी रहती है। इसमें भी कुहू अर्थात सर्वथा चंद्र रहित अमावस्या में हो तो सब प्रकार के दोष रहते हैं। अतः इस दोष के निराकरणार्थ बुद्धिमान व्यक्ति को शान्ति विधान करना चाहिए। 

सर्वप्रथम कलश स्थापना की विधि से कलश स्थापित करें। कलश में गूलर, बड़, पीपल, पिलखन, आम के पत्ते, नीम के पत्ते, नीम की छाल व जड़ भी डालें। पांच रत्न डालकर उसे वस्त्र से लपेटकर अग्नि कोण में स्थापित करें। 

 

पूजा की विधि – श्लोक 4,5 का अर्थ 

इसके बाद कलश में सभी तीर्थों, समुद्रों का आवाहन करें। इसका पौराणिक मन्त्र इस प्रकार है :- 

“सर्वे समुद्रा: सरितस्तीर्थानि जलदा नदा:।

 आयान्तु यजमानस्य दुरितक्षयकारका:।।

पुनः निम्न मन्त्रों से कलश पर जल छिड़के :- 

आपोहिष्ठामयो भुवः। तानऊर्ज्जेदघातन। महेरणाय चक्षसे। यो वः शिवतमो रसः। तस्य भाजयते हनः। उशतीरिवमातर:। तस्माद अरंग मामव। यस्य क्षयाय जिन्वय। आपो जनयथा च न:।  

इस प्रकार कलश को अग्निकोण में स्थापित करें। कलश पर अमावस्या के देवता सूर्य व चन्द्रमा की क्रमशः सोने व चाँदी की मूर्त्ति या ताम्र या चांदी की मूर्त्ति बनवाकर अग्न्युत्तारण व प्राणप्रतिष्ठा करके स्थापित करे। 

 

श्लोक 6,7,8,9,10 का अर्थ 

इसके बाद अमावस्या देवों की पूजा षोडशोपचार या कम से कम पंचोपचार से करें। पूजा मन्त्र इस प्रकार कहे गए हैं :- 

1) आप्यायस्य मदिन्तम सोम विश्वेभिरंशुभि:।  

भवा न: सम्प्रथस्तम: सखाषवृधे।।

2) सविता पश्चात्तात सविता पुरस्तात। सवितोत्तरात्तात। 

सविताधरात्तात सविता न: सुवतु सर्वतातिं सविता नो रासतां दीर्घमायुः।।   

इसके बाद शुद्ध चरु व सामग्री का भक्तिपूर्वक हवन करना चाहिए। हवन के मन्त्र इस प्रकार है : –

1) आकृष्णेन रजसा इत्यादि प्रसिद्द सूर्यमन्त्र अथवा पूर्वोक्त पूजा मन्त्र से सूर्य का हवन करें। 

2) सोमो धेनुं सोमो अर्वन्तमाशुं सोमो वीरं कर्मण्यं ददाति

सादन्यं विदथ्यं सभेयं पितृश्रवणं यो ददाशदस्मै।।

इस मन्त्र से चन्द्रमा या सोम का हवन करें। 

3) तत्पश्चात ‘त्र्यम्बकं यजामहे’ इत्यादि से तिल की आहुति दें। 

4) पश्चात ‘ॐ भूर्भुवः स्वः’ इन व्याहृतियों से तिलों का हवन करें। 

प्रत्येक मन्त्र की 108 या 28-28 आहुतियाँ दें। 

हवन के बाद शंकर  अभिषेक (रुद्रसूक्त या नमक चमक द्वारा रुद्राभिषेक) करके, घी से छाया पात्र का दान कराएं। 

तत्पश्चात दंपत्ति व पुत्र का संयुक्त अभिषेक करें तथा स्विष्टकृत आहुति दें। ब्राह्मण द्वारा उक्त सारी विधि कुशलतापूर्वक की जाएगी। योग्य विद्वान ब्राह्मण द्वारा कराएँ, स्वयं विज्ञ व मंत्रोच्चार कुशल हों तो स्वयं करें। दक्षिणा दान में काली गौ, सोना, चांदी दें। ब्राह्मणों को यथाशक्ति भोजन कराएँ। इस प्रकार अनिष्ट दूर होकर कल्याण होता है।