बृहत् पराशर होरा शास्त्र – अथ स्त्रीलक्षणाध्याय: 

Posted by

बृहत् पराशर होरा शास्त्र के 84 वें अध्याय में महर्षि पराशर जी द्वारा स्त्रियों के शुभाशुभ शारीरिक लक्षणों का वर्णन किया गया है। 

मैत्रेय ने पूछा – श्लोक 1, 2 

हे महर्षे ! आपने जन्मकाल पर आधारित पुरुष स्त्री जातक फल विस्तार से कहा, लेकिन मैं स्त्रियों के शरीरांगों के लक्षणों से विशेष फल जानना चाहता हूँ। 

पराशर बोले – हे मैत्रेय ! जैसा शंकर जी ने कभी पूर्वकाल में पार्वती जी से कहा था, वही शरीरांग लक्षण फल मैं तुम्हें बताता हूँ। 

स्त्रियों का पादतल (तलुवा) – श्लोक 3, 4 

पैर का तलुवा (Sole) कोमल, चिकना, मांसल, न बहुत बड़ा न बहुत छोटा अर्थात सम, लाल रंग, पसीना न आता हो और छूने पर गर्माहट अनुभव हो तो ऐसी स्त्री को (ऐसा पुरुष का हो तब उसको भी) बहुत सांसारिक सुख भोग अर्थात धन, संपत्ति, प्रतिष्ठा, वाहन, सेवक, मान आदि प्राप्त होते हैं। 

इसके विपरीत कान्तिहीन, छूने पर रुखा, कड़ा, स्वाभाविक रूप से जिसमें एड़ी आदि फटती हों, टेढ़ा अर्थात बाहर या भीतर की तरफ झुका हुआ, छाज अर्थात सूप के आकार का (आगे से बहुत चौड़ा), बहुत पतला या छोटा तलुवा दुःख व दुर्भाग्यदाता होता है। 

 

तलुवे में चिन्ह – श्लोक 5, 6 

पैर के तलवे पर यदि शंख, स्वस्तिक, चक्र, कमल, ध्वज, मछली, छतरी के समान रेखाएं हों तो वह नारी अवश्य ही किसी राजा (धनी, प्रसिद्द व अधिकारयुक्त, शक्तिसम्पन्न व्यक्ति) की पत्नी होती है। पैर में यदि एड़ी से आगे से शुरू होकर अँगुलियों तक ऊर्ध्वरेखा हो तो भी स्त्री (या पुरुष को भी) को जीवन में समस्त सुख मिलते हैं। 

पादतल में सांप की तरह की अनेक रेखा, चूहे के समान रेखा हों तो बहुत दुःख व दरिद्रता की द्योतक है। 

 

पैर के नाख़ून – श्लोक 7 

पैर के नाख़ून लाल, ऊँचे (चपटे नहीं हों), चिकने, गोलाई लिए हुए, जिनका अग्रभाग स्वाभाविक रूप से गोल हो तो शुभ होते हैं।

इसके विपरीत स्वयं बिना किसी दोष के फटने या टूटने वाले, कालिमा (कृष्णवर्ण) से युक्त हों तो अशुभ फलदायक होते हैं।  

 

पैर का अंगूठा – श्लोक 8 

पैर का अंगूठा ऊँचा, मांसल, पुष्ट, गोलाई लिए हुए हो तो अतुल भोगदायक होता है। 

टेढ़ा, चपटा, छोटा, दबा हुआ सा हो तो दुःख व दरिद्रता देता है। 

 

पैर की अंगुलियाँ – श्लोक 9 

पैर की अंगुलियाँ कोमल, घनी अर्थात सटी हुई सी, मांसल हों तो उत्तम फल देती है। 

लम्बी अँगुलियों वाली कुल का नाम डुबोने वाली व पतली, दुबली सी अँगुलियों से धन की कमी रहती है।  

 

श्लोक 10, 11 के अनुसार फल 

पैर की अंगुलियां बहुत छोटी हों तो अल्पायु, अंगुलियाँ छोटी बड़ी हों तो स्त्री चरित्र से शिथिल होती है। (छोटी-बड़ी का अर्थ है कि अस्वाभाविक अंतर हो जाता है) चपटी होने से दासकर्म, चाकरी करने वाली और बहुत खुली रहने से धनहीन होती है। 

जिस स्त्री के पैर की अंगुली एक के ऊपर एक चढ़ी हों तो वह अनेक पुरुषों के साथ बारी-बारी से क्रमशः विवाह या संबंध करती है। 

 

श्लोक 12, 13 के अनुसार फल 

जिस स्त्री की मध्यमा व अनामिका व कनिष्ठिका भूमि का स्पर्श ना करे तो वह पतिहीन होती है। इनमें दो अंगुलियाँ भूमि स्पर्श न करे तब भी विवाह प्रायः सपना ही रह जाता है। जिसके पैर की तर्जनी अंगुली (अंगूठे के साथ वाली) अंगूठे से आगे निकल जाए तो वह लड़की कुंवारेपन में ही पराये पुरुष के द्वारा स्पृष्ट, छुई हुई प्रेम प्रसंग, इच्छा – अनिच्छा से पुरुष द्वारा स्पृष्ट होती है। 

 

श्लोक 14, 15 के अनुसार फल 

जिस स्त्री के चलते समय पैर से मिटटी हटती हो (जो पैर को घसीटकर चलती हो) तो वह स्त्री कुल की हानि करने वाली होती है। उसका पितृकुल व पतिकुल भी पीड़ित होता है। जिसके पैर की कनिष्ठिका अंगुली चलते समय जमीन ना छुए तो वह पहले पति को त्यागकर या विधवा होकर दूसरे पति को प्राप्त करती है। 

 

पैर का ऊपरी भाग – श्लोक 16,17 

जिस स्त्री के पैर का ऊपरी भाग, कुछ उठान लिए, पसीने से रहित नसें न दिखती हों, मांसल हों, कोमल हों तो वह रानी होती है।  

यदि इसके विपरीत उभरी नसों वाला, कठोर हो तो धनहीन व खूब घूमने वाली होती है। यदि पैर पर रोम (छोटे-छोटे बाल) हों तो दासी, मांस रहित हो तो दुर्भाग्य का सूचक है। 

 

पैर की एड़ी के लक्षण – श्लोक 18 

पैर की एड़ी सम हो तो स्त्री सुभगा अर्थात सौभाग्ययुक्त होती है। चौड़ी व बड़ी एड़ी से दुर्भाग्ययुक्त होती है। बहुत ऊँची अर्थात उठी हुई हो, पैर के टखने से नीचे अपनी चार अंगुल से अधिक जगह हो तो कुलटा या पर पुरुष गामिनी होती है। बहुत बड़ी – मोटी व चौड़ी हो तो दुःख पाने वाली होती है। 

 

पिंडली का लक्षण – श्लोक 19 

जिसकी पिंडली पर बाल न हों, दोनों पिंडलियाँ समान आकार की हों, गोलाई लिए हुए, नसें न दिखती हों तथा दिखने में आकर्षक हो तो वह स्त्री अवश्य ही राजपत्नी होती है। इसके विपरीत लक्षणों से धन व अधिकारहीन समझना चाहिए।  

 

घुटने का लक्षण – श्लोक 20 

स्त्री के घुटने गोल न हों, चिकने मांस से ढके हुए हों तो बहुत शुभ है।  

उभरे हुए, मांस से रहित हों तो स्वेच्छाचारिणी व घुटने लम्बोतरे ढीले-ढाले लटके हुए से हों तो निर्धन होती है। 

 

जांघ (उरु) का लक्षण – श्लोक 21 

हाथी की सूँड के समान आनुपातिक रूप से ऊपर से अधिक गोल व नीचे आते आते कम गोलाई, लेकिन संतुलित हों, गोल, कोमल हों तथा नसें न दिखती हों तो वह स्त्री अवश्य ही रानी होती है। चपटी बालों से युक्त जाँघे हों तो विधवा या दुर्भगा (पति का घर न पाने वाली) होती है। 

 

कमर का लक्षण – श्लोक 22, 23 

अपनी अँगुलियों के नाप से 24 अंगुल नाप वाली कमर हो तो वह सम कटि है। इसके लगभग कमर की गोलाई हो तथा ऊँचे नितम्ब हों तो ऐसी कमर उत्तम स्त्रियों की होती है।  

आगे की ओर झुकाव लिए हुए, चपटी, लम्बी, मांसहीन कमर हो तो अशुभ है। उक्त नाप से कुछ अधिक कम नापवाली रोमों से युक्त हो तो दुःख व वैधव्य की सूचिका है। 

 

नितम्ब(Hips) लक्षण – श्लोक 24 

यह भाग ऊँचा, उठा हुआ, मांसल, पुष्ट (थुलथुल नहीं हो) बड़ा हो तो सुख व सौभाग्य का सूचक होता है। इसके विपरीत दबे हुए, मांसहीन, हिलते-डुलते से कमर की चौड़ाई से चौड़े न हों तो दुःखदायक हैं।  

 

योनि लक्षण –  श्लोक 25 

योनि लक्षण में ऊँचा भग, मणि न दिखे,लालिमा लिए हुए, कोमल बाल हों, कछुवे की पीठ के समान गोलाई में उठी हुई योनि हो तो शुभ है। योनि का आकार पीपल तरह हो तो भी शुभ है। 

 

श्लोक 26 का फल 

जिस स्त्री की योनि हिरन के खुर के समान, सम्मुख भाग में अधिक फैलाव युक्त, भगनासा दिखती हो तथा खूब बाल हों, खुला मुँह हो तो अशुभ फल देने वाली होती है। 

 

श्लोक 27 का फल 

योनि का बायाँ भाग ऊँचा हो तो कन्याओं की अधिकता होती है। दक्षिण भाग ऊँचा हो तो पुत्र होते हैं। यदि योनि का घुमाव, आवर्त्त, भँवरी शंख के समान हो तो स्त्री को प्रायः गर्भ धारण नहीं होता। 

 

बस्ति/पेडू लक्षण – श्लोक 28  

बस्ति नाभि से नीचे के भाग को कहते हैं। सामान्यतः नाभि से शुरू कर नीचे चार अंगुल तक क्षेत्र बस्ति कहलाता है। स्त्री का वह भाग कड़ा न हो, फैला हुआ, मामूली ऊँचा हो तो उत्तम होता है। इसके विपरीत युक्त, नसें उभरी हुई हों तथा उस भाग पर रेखाएं हों तो अच्छा नहीं होता है। 

 

नाभि लक्षण – श्लोक 29 

नाभि थोड़ी गहरी, घुमाव बायीं ओर हो तो अच्छा, सब सुख देने वाला होता है। बीच की गाँठ उभरी हुई हो या बहुत उठी हुई नाभि शुभ नहीं होती है। 

 

कुक्षि/कोख लक्षण – श्लोक 30 

नाभि से ऊपर का भाग कोख का होता है। पेट फैला हुआ सा हो तो वह बहुत से पुत्रों को जन्म देती है। यदि मेंढक के पेट के समान पेट (कोख) हो तो स्त्री राजा को उत्पन्न करती है। 

 

श्लोक 31 का फल 

ऊँची कोख से बाँझ, बल पड़ते हों तो वैराग्य युक्त, सन्यासिनी, आवर्त या भंवर पड़ती हो तो दासी होती है। 

 

पार्श्व लक्षण – श्लोक 23 

पार्श्व भाग पेट का किनारा, जहाँ पसलियां ख़तम होती हैं तथा बायाँ दायाँ बगल वाला भाग होता है। यदि ये भाग समान, माँस से भरा हुआ, कोमल हो तो शुभ होता है। बहुत उठा हुआ, रोयों से युक्त, नसें उभरी हुई हों तो अशुभ होता है।  

 

हृदय लक्षण – श्लोक 33 

बायीं ओर छाती पर, ह्रदय प्रदेश पर बाल अर्थात बड़े दिखने वाले रोम न होना सुखप्रद है। रोमों से युक्त व बहुत फैलाव वाला हो तो अशुभ होता है।  

 

स्तन लक्षण – श्लोक 34 

दोनों स्तन लगभग समान, स्वस्थ, परस्पर अधिक सटे हुए, मजबूत हों तो बहुत उत्तम है। अग्रभाग मोटा हो अर्थात जड़ से पतले व आगे मोटे हों, बीच से अधिक अंतर हो, सूखे दिखे तो अच्छे नहीं होते हैं। 

 

श्लोक 35 का फल 

जिस स्त्री का दायाँ स्तन मामूली बड़ा हो तो उसे अधिक पुत्र होते हैं। यदि बायाँ स्तन बड़ा हो तो कन्याएँ अधिक होती हैं, ऐसा पुराने ऋषियों ने कहा है। 

 

स्तनाग्र लक्षण – श्लोक 36 

स्तनाग्र अर्थात एकदम आगे का भाग काला, गोल होना अच्छा है। भीतर को धंसे हुए, बड़े, बहुत पतला भाग अच्छा नहीं माना गया। 

 

कन्धों का लक्षण – श्लोक 37 

स्त्रियों के कंधे समान, मजबूत व गाँठे न दिखे तो शुभ है। उस स्थान पर रोम (बाल) होना, उठे हुए होना, टेढ़े होना, मांसरहित होना अशुभ होता है। 

 

काँख/बगल लक्षण – श्लोक 38 

स्त्रियों की बगल सूक्ष्म व मुलायम बालों से युक्त, मजबूत (इसका अर्थ है कि हथेली से ढकने पर हथेली भरी-भरी सी लगे तो शुभ होती है। इसके विपरीत नसें दिखती हों, गहरी हो, गड्ढेदार हो, पसीना बहुत ज्यादा आता हो तो शुभ नहीं मानी जाती। 

 

भुजाओं का लक्षण – श्लोक 39,40 

कलाई की गाँठ व कुहनी की हड्डी मांस में छिपी हुई हो तथा उभरी हुई न हो, नसें व रोम न दिखते हों, सीधे, गोलाई लिए हुए हों तो बहुत शुभ होते हैं। 

मांसहीन दिखने योग्य सांवले व खड़े रोमों से युक्त हों, सामान्य नाप से कुछ छोटे हों, मोटी नसें दिखाई पड़ती हों, टेढ़े हों अर्थात बहुत बाहर या बहुत अंदर की ओर झुके हों तो क्लेशदायक होते हैं।  

 

हाथ के अंगूठे का लक्षण – श्लोक 41 

हाथ के अंगूठे पुष्ट, बंद कमल की कली के समान हों तो शुभफलप्रद एवं सब सुख प्रदान करने वाले होते हैं। इसके विपरीत पतले, कमजोर, बीच से पतले, टेढ़े, दिखने में मध्यमा अंगुली के बराबर से ही मोटे लगें तो दुख:प्रद होते हैं। 

 

हथेली का लक्षण – श्लोक 42,43 

हथेली लाल, बीच में गड्ढा न हो, मुलायम, कम रेखाओं वाली, अंगुलियां मिलाकर बीच में स्थान बचे तो सब सुख प्राप्त होता है। 

अधिक रेखाएं होना पति के लिए अनिष्टकारक, बिलकुल कम रेखाएं हों तो निर्धन, हथेली में भी नसें उभरी दिखे तो भिक्षुका होती है। 

 

करपृष्ठ लक्षण – श्लोक 44 

करपृष्ठ का अर्थ है हथेली का पिछला भाग या हिस्सा। अगर यह मजबूत है, उठा हुआ है, एक समान है, भरा-भरा सा, कोमल व रोमरहित हो तो शुभ होता है। इसके विपरीत काफी ज्यादा नसें दिखें, नीचा हो, बालों से युक्त हो तो दुःख व दारिद्रय देता है। 

 

हथेली की रेखाओं का विचार – श्लोक 45,46,47,48  

हथेली में गोल, स्पष्ट, चिकनी, पूरी व गहरी सी रेखा (उर्ध्व रेखा) हो तो सब प्रकार के सुख मिलते हैं। 

मछली का आकार बने तो सौभाग्यशाली, स्वस्तिक चिन्ह हो तो धनी, कमल आकृति बने तो राजा की पत्नी व राजा को पैदा करने वाली होती है। 

दक्षिणावर्त का चिन्ह हो तो सकल भूमण्डल के सम्राट की प्रिया होती है। शंख, छत्र या कछुए जैसी रेखाएं हो तो ऐसी स्त्री के पुत्र समर्थ राजा या बहुत धनी होते हैं।                              

हाथ में तराजू के समान रेखा हो तो व्यापारी की पत्नी होती है। अथवा हाथी, घोड़ा, बैल जैसी आकृति बने तथा हाथ में उक्त चिन्ह हों तब विशेषतया व्यापारी की पत्नी होती है। 

 

श्लोक 49,50,51,52 

हाथ में मकान या वज्र के समान रेखाएं हों तो उसका पुत्र शास्त्रकार होता है। हाथ में शकट (बैलगाड़ी) जैसा चिन्ह या जुआ का चिन्ह हो तो किसान की पत्नी होती है। 

चँवर, अंकुश या धनुष की आकृति हो तो रानी होती है। त्रिशूल, तलवार, गदा, माला या दुंदुभि के समान रेखा हो तो भी राजपत्नी होती है।  

अंगूठे के मूल से निकलकर कनिष्ठा की जड़ तक यदि कोई रेखा जाए तो वह स्त्री पति घातिनी होती है, अतः ऐसी स्त्री को दूर से वर्जित करें। 

काक, मेंढक, गीदड़, भेड़िया, बिच्छू, सांप, गधा, ऊँट, बिलाव जैसी रेखाएं दुःखप्रद होती हैं। 

 

अँगुलियों का झुकाव  – श्लोक 53, 54 

अंगुलियाँ कोमल, सन्तुलित पर्व विभाजन वाली, लम्बी, गोलाई लिए हुए और क्रमशः पतली अर्थात सुती हुई, सिरों की ओर क्रमशः पतली होती हुई, रोमों से रहित शुभ रहती हैं। 

काफी छोटी, पतली या कमजोर दिखने वाली, अँगुलियों के बीच में छेद हों, अँगुलियों के पिछले हिस्से में रोम हों या तीन से अधिक पर्वों वाली या कम पर्वों वाली होना दुःखदायी है। 

 

नाख़ून का लक्षण – श्लोक 55 

नाख़ून लाल, मध्य भाग से उन्नत व किनारों की ओर से ढालू, आगे की ओर क्रमशः कम चौड़े होते हुए उत्तम होते हैं। 

चपटे, गहरे, रंगहीन, पीले या सफ़ेद धब्बों वाले नाख़ून दु:खदायक होते हैं। 

 

कमर की हड्डी का लक्षण – श्लोक 56 

कमर की हड्डी (मेरुदण्ड) अथवा रीढ़ की हड्डी दिखती ना हो, रीढ़ के दोनों ओर उठा हुआ मांस हो तथा रीढ़ छिपी हुई सी हो तो शुभ लक्षण है। 

कमर पर नसें दिखें, रोम या बाल हों, कमर की वंशास्थि झुकाव लिए हुए हो तो अशुभ फलदायक होती है।  

 

गले का लक्षण – श्लोक 57, 58 

गले में साफ़ दिखने वाली तीन रेखाएं हों, गले की हड्डी जिसे कण्ठास्थि अथवा टेंटुआ भी कहा जाता है, वह दिखता न हो तथा गर्दन गोलाई लिए हुए हो, मांस से भरी हुई, कोमल हो तो शुभ व प्रशंसनीय फल देती है।  

मोटी गर्दन वाली स्त्री विधवा, टेढ़ी गर्दन वाली दासकर्म करने वाली, चपटी या बैठी सी गर्दन वाली नि:सन्तान व छोटी गर्दन वाली पुत्रहीन होती है।  

 

गले का लक्षण – श्लोक 59 

कण्ठ के बीच का उठा हिस्सा सीधा, मांस में दबा हुआ, मामूली उभार वाला शुभ होता है। सूखा, नसें दिखती हों, रोम प्रकट हों, आकार में बड़ा या टेढ़ा होना अशुभ है।  

 

चिबुक/ठुड्डी का लक्षण – श्लोक 60 

लाल, कोमल, मजबूत ठुड्डी अच्छी शुभ होती है। इसके विपरीत बड़ी, दिखते रोमों वाली, मोटी व बीच में पड़ी लकीरनुमा गड्ढे के कारण दो भाग में बँटी हो तो अशुभ होती है।  

 

कपोल का लक्षण – श्लोक 61 

ऊँचे, गद्देदार, गोलाई लिए हुए गाल स्त्रियों के सन्दर्भ में शुभ होते हैं इसके विपरीत कठोर, गड्ढेदार, मांसहीन गाल अशुभ होते हैं। 

 

मुँह का लक्षण – श्लोक 62 

मुँह ना बहुत बड़ा, न बहुत छोटा हो, ढीले-ढाले लटकते से होंठ आदि न हों, कुछ गोलाई लिए हुए हों, लार आदि की कमी से सूखा प्रतीत न हो, दिखने में मन को अच्छा लगे तो उत्तम होता है। 

 

निचले होंठ का लक्षण – श्लोक 63, 64 

अधर अर्थात निचला होंठ लालिमा लिए हुए, गोलाई युक्त, चिकना, बीच में रेखा से युक्त, मनोहर हो तो स्त्री रानी होती है। उसे समस्त भौतिक सुख व अधिकार प्राप्त होते हैं। 

मांसहीन, अकारण फटने वाला, लंबा, रुखा, कालिमायुक्त, मोटा हो तो वैधव्य व क्लेश का सूचक है। 

 

उत्तरोष्ठ लक्षण – श्लोक 65 

कमल की पंखुड़ी के समान लाल, चिकना, बीच में से थोड़ा उठा हुआ, रोमहीन उत्तरोष्ठ, ये सब लक्षण शुभ व सौभाग्यदायक होते हैं। 

 

दांतों का लक्षण – श्लोक 66, 67 

चिकने, चमकदार, दूध के समान रंगतवाले, ऊपर-नीचे समान संख्या वाले, ऊपर के दाँत थोड़े ऊँचे, अच्छे होते हैं। 

निचला जबड़ा थोड़ा आगे हो, पीली रंगत या सांवली रंगत, आकार में बड़े, दो पंक्तियों वाले, दिखने में कुरूप, खुले-खुले दाँत शुभ नहीं होते हैं। 

 

जीभ का लक्षण – श्लोक 68 

लाल, कोमल, पतली नोंक वाली जीभ, बहुत भोग देने वाली होती है। इसके विपरीत बीच में या आगे से चौड़ी जीभ, कड़ी व लाल रंग से अलग रंगत वाली अशुभ होती है। 

 

जीभ की रंगत का फल – श्लोक 69 

सफ़ेद जीभ से जल से मृत्यु, काली जीभ से कलहप्रिया, मोटी मांसल जीभ से निर्धन व लम्बी जीभ से अभक्ष्य खाने वाली, बड़ी चौड़ी जीभ आलसी व असावधान स्त्री होती है। 

 

तालु का लक्षण – श्लोक 70,71 

स्त्रियों का तालु कोमल, लाल व चिकना शुभ होता है। सफ़ेद तालु पति को अल्पायु, पीला तालु हो तो गृह त्यागने वाली, काला तालु हो तो सन्ताहीनता व रुखा तालु हो तो बड़े परिवार वाली होती है। 

 

हास्य का लक्षण – श्लोक 72 

हँसते या मुस्कुराते समय बिल्कुल दाँत न दिखे या मामूली दिखें, थोड़े से गाल फूल जाएँ, हँसते समय कंधा या सिर ना हिले, हँसी आकर्षक व मनोहर हो तो शुभ फलप्रद होती है। 

 

नासिका का लक्षण – श्लोक 73, 74 

दोनों नथुने समानाकार, गोल, छोटे छेद वाली नाक शुभ होती है। आगे से मोटी या बीच में से दबी हुई नाक शुभ नहीं होती। 

अग्रभाग या नोंक लाल हो या थोड़ी दबी हुई सी हो तो वैधव्य कारक, चपटी हो तो दासी व नाक बहुत छोटी या बड़ी हो तो झगड़ालू होती है। 

 

नेत्र विचार – श्लोक 75, 76, 77 

दिखने में आकर्षक, कोनों में लाली लिए हुए, काली पुतली वाले, गाय के दूध के समान भूरे रंग वाले, बड़े, चिकनी व काली पलकों वाले नेत्र शुभ होते हैं। 

शहद के समान रंगत वाली आँखों से सुख व सौभाग्य मिलता है। 

बहुत उठी हुई, बाहर को निकली हुई सी आँखों से स्त्री अल्पायु, गोल आँखों से कुलटा, बाईं आँख छोटी या स्वाभाविक रूप से दबती हो तो पुंश्चली, दायीं आँख दबती हो तो बाँझ होती है। 

कबूतर के समान खुले-खुले पलकों वाली व छोटी आँखें दुश्चरित्र की सूचक है। जबकि हाथी के समान चिपकी सी आँखें शुभ नहीं होती हैं।  

 

पलक विचार – श्लोक 78 

कोमल, काले, घने, मुलायम, पतले पलक सौभाग्यदायक तथा खुले-खुले, भूरे रंग वाले, मोटे पलक दुःखदायक होते हैं। 

 

भ्रू लक्षण – श्लोक 79 

गोल, धनुषाकार, चिकनी, काली, परस्पर सटी हुई, कोमल रोम वाली भौंहें सुख व कीर्ति देती है।  

 

कानों का विचार – श्लोक 80 

बड़े कान व सुन्दर घुमाव हो तो पुत्र व सौभाग्य मिलता है। कनपटी से सटे से प्रतीत हों या घुमावहीन हो, नसें दिखती हों, टेढ़े हों तथा पतले से लगें तो ऐसे कान अशुभ होते हैं। 

 

ललाट लक्षण – श्लोक 81,82 

माथे पर नसें ना दिखे, रोम न हो, आधे चंद्र के समान आकार हो, गड्ढेदार ना हो, अपनी अंगुली से तीन अंगुल या उससे मामूली अधिक माथा हो तो सुत व सौभाग्यदायक होता है। 

जिस माथे पर स्पष्ट स्वस्तिक चिन्ह दिखे तो राज्य मिलता है। लम्बोतरा, रोमयुक्त, बहुत ऊंचा माथा दु:खदायक होता है। 

 

मूर्धा लक्षण – श्लोक 83 

मांग भरने की जगह, बालों का प्रारम्भ स्थान, उठा हुआ, हाथी के मस्तक के समान गोलाई लिए हुए, बीच में थोड़ा सा बँट सा दिखे तो शुभ होता है। 

मोटी, बड़ी टेढ़ी मूर्धा दुःख व दरिद्रता देती है। यहाँ टेढ़ी से तात्पर्य है कि बालों का आरम्भ स्थान गोल वृत्तखंड चाप न बनाए तो अशुभ है।  

 

बालों का लक्षण – श्लोक 84, 85 

कोमल, काले, पतले लम्बे बाल शुभ होते हैं। भूरे, रूखे, कठोर, खुले, छोटे बाल अशुभ होते हैं। 

अत्यंत गौरी स्त्री के कुछ भूरे बाल तथा सांवली स्त्री के बिल्कुल काले बाल भी शुभ होते हैं। 

बहुत गौरी स्त्री के बहुत काले बाल व सांवली स्त्री के भूरापन लिए बाल शुभ नहीं होते हैं। 

स्त्री लक्षणों में से जो जो पुरुषों में संभव हों, उन्हें पुरुषों के सन्दर्भ में भी कहें। 

 

छींक विचार – श्लोक 86 

एक बार छींक होती हो तो सुखी, दो छींके होती हों तो धनी व् दीर्घायु, चार छींके हों तो सुखनाशक व इससे अधिक छींके शुभ नहीं होती हैं। 

 

कद काठी विचार – श्लोक 87  

दोनों हाथ फैलाकर जीतनी चौड़ाई हो, उतनी ही ऊंचाई मनुष्य की हो तो वह मनुष्य राजा होता है या वटवृक्ष की तरह पूजनीय होता है। 

 

श्लोक 88 का अर्थ 

पांच अंग बड़े, चार छोटे, पांच पतले, छः ऊँचे, पांच लाल, तीन विस्तृत, तीन गहरे हों तो बहुत शुभ हैं। 

 

अंतिम श्लोक का विस्तार से अर्थ देखें तो उसका अर्थ है :- 

1) भुजा, दोनों आँखों का मध्य भाग, गालों का प्रदेश, अंडकोष व छाती बड़ी होनी चाहिए। 

2) गर्दन, लिंग, नितम्ब, पिंडली ये चार भाग छोटे हों। 

3) अँगुलियों के पर्व पतले, दाँत, रोम, त्वचा, नाख़ून पतले हलके हों।  

4) काँख (बगल), मुँह, पीठ, गले की कण्ठनासा, छाती, नख ये छह अंग ऊँचे उठे हुए हों। 

5) हाथ व पैर, मुख, नेत्र, नाख़ून, स्तन ये पांच अंग लाल हों। 

6) छाती, मुँह, ललाट फैले हुए हों। 

7) नाभि, स्वर व सत्त्व गंभीर हों। ऐसे मनुष्य महान होते हैं।