
बृहत् पराशर होरा शास्त्र के अध्याय 79 में गुणों (सात्विक, राजसिक, तामसिक) के बारे में महर्षि पराशर ने विस्तार से बताया है।
पराशर जी कहते हैं – अब मैं सत्त्व, रजस, तमस गुणों के आधार पर फल कथन करता हूँ। सत्त्व प्रकृति का ग्रह उदय हो अर्थात बलवान हो या उसकी दशादि हो तो मनुष्य सत्वगुण युक्त होता है।
इसी तरह रज:प्रकृति ग्रह से मनुष्य रजोगुण की अधिकता वाला हो जाता है। तमोगुणी ग्रह के उदय से मनुष्य मूर्ख व् तमोगुण की अधिकता से युक्त होता है।
यदि तीनों गुणों से युक्त ग्रहोदय हो तो मनुष्य तीनों गुणों के सम्मिश्रण से युक्त स्वभाव वाला होता है। इस प्रकार सत्त्वगुणी, रजोगुणी, तमोगुणी व समगुणी प्रकार से चार प्रकार के लोग होते हैं। इन्हें क्रमश: उत्तम, मध्यम, अधम व उदासीन भी कहते हैं। अब मैं इन मानवभेदों के गुणों का स्पष्टीकरण करता हूँ।
उत्तम पुरुषों के गुण
सतोगुणी मनुष्य में इन्द्रियों का वश में होना (शम), मन का नियंत्रण (दम), आचरण व शरीर की पवित्रता, क्षमाभाव, सरलता, लोभ न करना, सत्य बोलना ये गुण होते है।
मध्यम पुरुषों के गुण
मध्यम प्रकृति लोग शूरवीर, तेजस्वी, धैर्यशाली, कार्यकुशल, पीछे न हटने वाले, सज्जनों के रक्षक अर्थात व्यर्थ विवाद न करने वाले, लेकिन उच्च या महत कार्य के लिए दृढ साहसी होते हैं।
अधम पुरुषों के गुण
अधम प्रकृति लोग असत्यवादी, लालची, जड़, आलसी, सेवाकार्य अर्थात सेवा टहल करने में कुशल होते हैं।
उदासीन पुरुषों के गुण
सम्प्रकृति लोग कृषि या व्यापार या पशुपालन (आज के युग में धनप्रद व्यवसाय) करने में कुशल, कभी सत्य तो कभी असत्य बोलने वाले होते हैं।
इस प्रकार व्यक्ति को गुणानुसार पहचान कर, तदनुकूल कार्यों में कुशल दैवज्ञ को लगाना चाहिए। अर्थात प्रकृति के अनुकूल कार्यों में व्यक्ति रूचि ले तो सफलता मिलती है। यदि दो-तीन गुणों के लक्षण एकत्र मिलते हों तो जिस गुण की प्रधानता हो, उसी के अनुसार निर्णय करें। यदि प्रधानता न दिखे तो समगुणी समझकर जातक के कार्यक्षेत्र, व्यवसाय आदि का निर्णय करें।
गुणों का प्रयोजन
इस प्रकार कन्या व वर या मालिक व नौकर अथवा साझेदारों के परस्पर गुणमिलान करके उनकी सफलता, परस्पर प्रेम भाव व स्नेह का निश्चय करना चाहिए। उदासीन, मध्यम व उत्तम प्रकृति लोगों का भी परस्पर सम्बन्ध प्रसन्नतादायक होता है। अर्थात वर, स्वामी या बड़ा साझेदार उच्च प्रकृति व उससे एक कक्ष्या वाला आश्रित हो तो भी ठीक है। अतः वर श्रेष्ठ प्रकृति व कन्या निकटस्थ प्रकृति, सेव्य (स्वामी) व सेवक में भी देखें। इस तरह संबंध रखने से सुख मिलता है अन्यथा हानि होती है।
गुणों का कारण
मनुष्य में गुणों का उदय पिता (वीर्य) माता (क्षेत्र) जन्मसमय व संगति से होता है। इनमें उत्तरोत्तर बलवत्ता होती है। अतः सबसे अधिक बली संगति, उससे कम प्रसूति समय, उससे कम माता-पिता के गुण होते हैं। उत्तम बीज को भी समुचित भूमि मिलने पर भी, उत्तम जलवायु न मिले तो उत्तम उत्पत्ति नहीं होती। अतएव जन्म समय के अनुसार जातक में अपने निजी गुणों का उदय होता है। जन्मसमयानुसार गुणादि की परीक्षा करके जातक का फलादेश करना चाहिए।
काल अर्थात अव्यक्त महाकाल (स्वयं ईश्वर) ही प्राणियों की उत्पत्ति, पालन व संहार का कारण है। समस्त जड़ जंगम संसार का स्वरुप ईश्वर से ही उद्भूत है। उसी ईश्वर की शक्ति प्रकृति है। वह प्रकृति सत्त्वरजस्तमस भेद से त्रिगुणात्मक है। इसी आधार पर अव्यक्त या निराकार सर्वशक्तिमान व परमसत्व तत्व प्राणियों में व्यक्त या प्रकट होता है।
वह कालपुरुष भी अपनी प्रकृति के गुणों के अनुसार, उत्तम, मध्यम, अधम व उदासीन भेद से चार प्रकार का होता है। उसी कारण जंतु भी चतुर्विध होते हैं। कालपुरुष के उत्तमांग (सिर) में उत्तम जंतु, मध्यमाङ्ग (छाती) में मध्यम जन्तु, जंघादि में उदासीन व पादादि में अधम जन्तु स्थित रहते हैं। उत्तमांग सिर, मध्यमाङ्ग छाती प्रदेश, दोनों जाँघें उदासीन व पैर अधमांग होते हैं।
इस प्रकार गुणानुसार कालपुरुष का अंग विभाग है। तदनुसार ही गुण व प्रकृति तथा कर्मानुसार संसार में जाति विभाग कहा गया है। इस प्रकार स्वयंभू ईश्वर ने अपने गुणों के आधार पर ही समस्त संसार को बनाया है। इसके चार भेद होते हैं।
इसी विषय को यजुर्वेद के पुरुष सूक्त तथा भगवद्गीता में कहा गया है। भारतीय शास्त्रचिन्तन की यह विशेषता है कि वह किसी भी अवस्था में चरम परिणति के समय दार्शनिकता की ओर अग्रसर हो जाता है।
