महाभागवत – देवीपुराण – छत्तीसवां अध्याय 

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नारदजी बोले – महादेव ! विश्वनाथ ! आपने जिस वार्षिकी शारदीय महापूजा की बात बताई थी, जिसे रघुवर भगवान श्रीराम ने रावण के वध की इच्छा से भक्तिपूर्वक सम्पन्न किया था और जो जगदम्बा को अत्यंत प्रिय है, उसका मेरे लिए विस्तार से वर्णन करें।।1-2।।

महामते ! जिस प्रकार भगवान विष्णु ने मनुष्य रूप मे अवतार लेकर असमय में जगन्माता महेश्वरी की पूजा की थी, वह सब मुझे बताने की कृपा करें। प्रभो ! आपसे बढ़कर इस त्रिलोक में इसे बताने वाला अन्य कोई नहीं हैं। देव ! मैं आपका दास और शरणागत हूं, मुझे इस कथा से पवित्र कीजिए।।3-4।।

श्रीमहादेव जी बोले – प्राचीनकाल में त्रैलोक्य जननी भगवती की प्रार्थना करके दशकंधर रावण उनकी कृपा से त्रैलोक्य विजयी हो गया। उसके भक्तिभाव से प्रसन्न होकर भक्तवत्सला भवानी उस महात्मा रावण के नगर में निवास करने लगी।।5-6।।

जब तक रावण की तपस्या का पुण्य क्षीण नहीं हो गया तब तक अपनी योगिनियों के साथ जगदम्बा उसको विजय प्रदान करते हुए वहां निवास करती रहीं ।।7।। जगत को सताने के कारण उसके पुण्य क्षीण होने पर प्रचंड तेजस्विनी जगदम्बा ने श्रीरामचंद्र जी द्वारा पूजित होकर उसका बांधवों सहित नाश कर दिया तथा उसकी नगरी का त्याग कर अपनी योगिनियों समेत वे कैलाश पर्वत पर चली गईं ।।8-9।।

पहले वह रावण इन्द्र आदि देवताओं को जीतकर अपने पराक्रम के घमंड में जगन्नाथ भगवान विष्णु सहित त्रिलोक को कष्ट पहुंचाने लगा। मुनिश्रेष्ठ ! उस दुरात्मा राक्षसराज रावण के भय से देवगण यज्ञ हवि का भोग नहीं कर पाते थे तथा मुनिगण देवपूजन, तप और यज्ञ- यागादि नहीं करते थे। मुने ! उसके भय से प्रतिदिन उपहार सामग्रियों को लेकर उसके अनुग्रह की अपेक्षा करते हुए उसके सामने खड़े रहते थे। जो चंद्र – सूर्यादि दूसरे दिग्पाल और देवगण थे, उस दुष्ट ने उन सबको अपना आज्ञापालक बना लिया था।।10-14।। 

मुने ! तब उससे दु:खी होकर देवताओं ने पृथ्वी के साथ ब्रह्माजी के पास जाकर हाथ जोड़कर प्रार्थना की। प्रभो ! जगत के स्वामी विधाता ! पौलस्त्य (विश्रवा) – का पुत्र महान रावण स्वयं अपने बल के घमंड से त्रिलोकी को पीड़ित कर रहा है। देव ! यह पृथ्वी उसके पाप कर्मों के भार को सहने में असमर्थ होकर आपके पास आयी है। उस दुष्ट के वध का कोई उपाय आप सोचें ।।15-17।। 

देवताओं के ऐसा कहने पर ब्रह्मा जी ने पृथ्वी को सांत्वना दी और वैकुंठ में आकर वे भगवान विष्णु से कहने लगे – ।।18।। संसार के पालन में तत्पर रहने वाले त्रिलोकीनाथ ! प्रभो ! लंका में दशकंधर रावण अत्यंत दुर्लभ हो गया है, उसको मारने के लिए जगत्पते ! आप मनुष्य शरीर धारण करें। विश्वपालक ! आप मनुष्य रूप में अवतार लेकर देवताओं को पीड़ित करने वाले उस दुष्ट रावण का पुत्रों और बांधवों सहित संहार करें।।19-21।। 

ब्रह्मा जी के इस प्रकार कहने पर भगवान विष्णु ने रावण द्वारा सताये गए सभी देवताओं को आश्वस्त किया तथा वे महामति ब्रह्माजी से इस प्रकार कहने लगे – ।।22।।

श्रीभगवान बोले – मैं स्वयं दशरथ के पुत्ररूप में मनुष्य-शरीर धारण करके उस दुष्ट का पुत्रों और बांधवों सहित अवश्य ही संहार करूंगा, किंतु इस कार्य में देवता लोग रीछ और वानरों के रूप में पृथ्वी पर अवतार लेकर भूभार-हरण में मेरी सहायता करें।। 23-24।।

ब्रह्माजी ! दूसरी बात आपको बताता हूँ कि उस दुष्ट के मारने में एक कठिनाई है, उसका आप उपाय खोजें। वह दुष्टात्मा रावण भक्तिपूर्वक त्रिलोकजननी पराम्बा कात्यायनी की पूजा करता है। वे भगवती कात्यायनी भी प्रसन्न होकर अपनी योगिनियों के साथ लंका में वास करती हुई उसे निरंतर विजय प्रदान करती रहती हैं। यदि वे जगदम्बा मुझ पर प्रसन्न होकर लंका का त्याग कर दें तभी मैं रावण को मार पाऊँगा, अन्यथा मैं समर्थ नहीं हूँ। कमलासन ! इसके लिए जो भी करना हो, आप उसे करें। उन जगदम्बा की कृपा के बिना उस शत्रु को जीतने में कोई समर्थ नहीं है।।25-29।।

विधाता ! जब तक जगदम्बा कात्यायनी रावण के अनुकूल हैं तब तक वह महाबली महापराक्रमी रावण अल्प शक्तिवाले इस सारे संसार का यदि नाश भी कर दे तो भी मैं विश्वपालक उसका क्या बिगाड़ सकूँगा।।30-31 ।।

ब्रह्माजी बोले – जगन्नाथ ! यह सत्य है कि भगवती दुर्गा की भक्ति में लगा हुआ दुष्ट भी इस संसार में कभी दु:ख को प्राप्त नहीं होता। किन्तु भगवन ! उस दुष्ट के नाश का अवश्य ही उपाय है। प्रभो ! यह सारा चराचर संसार उन्हीं जगन्माता से उत्पन्न होता है और उन्हीं से पोषित होता है। जगत्पते ! इस संसार को नष्ट करने की उनकी इच्छा अकाल में नहीं हो सकती।।32-34।।

मैं, आप और भगवान शिव इस संसार की सृष्टि, स्थिति और प्रलय के निमित्तमात्र हैं, इसमें वस्तुत: एकमात्र कारण तो वे ही जगदम्बा हैं। जगत्पते ! हम सब देवगण उन्हीं के स्वरूप में अंतर्भूत हैं। अतः हम लोगों के प्रति द्वेष करने वाले उस रावण से क्या हमारी रक्षा वे जगदम्बा नहीं करेंगी।।35-36।।

श्री भगवान बोले – ब्रह्मन ! मैं आपके साथ कैलास पर्वत पर चलूँगा और उस पौलस्त्य (विश्रवा) – के पुत्र दुष्टात्मा रावण के वध के लिए जगदीश्वरी से प्रार्थना करूँगा।।37-38।।

श्रीमहादेव जी बोले – मुनीश्वर ! तब वे दोनों ब्रह्मा और विष्णु शीघ्र ही कैलास पर्वत पर गए, जहां जगन्माता पार्वती भगवान शंकर के साथ विराजमान रहती हैं।।39।। मुनिवर ! ब्रह्मा और विष्णु को आया देखकर भगवान शिव ने उनका अभिनंदन करके उनके आगमन का कारण पूछा।।40।। तब उन दोनों ने राक्षसराज रावण के उपद्रव और अपने मनोवांछित विचार से युक्त सारा वृतांत भगवान शंकर को शीघ्र बताया। मुनिवर ! तब वे ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर एक साथ भगवती पार्वती के समीप उपस्थित हुए।।41-42।। वहां प्रसन्नमुखकमल वाली उन महेश्वरी को देखकर श्रेष्ठ देवताओं ने पृथ्वी पर गिरकर दंडवत प्रणाम किया।।43।। 

उन ब्रह्मादि देवताओं को प्रणाम करते देखकर तत्क्षण कृपापूर्वक महादेवी जगदम्बा अपने परा रूप में रत्नसिंहासन पर विराजमान हो गईं। उनके अठारह भुजाएं थीं, सुंदर हार से वक्ष:स्थल सुशोभित था, उनके मस्तक पर अर्धचंद्र की रेखा विराज रही थी और मुखकमल प्रसन्नता से देदीप्यमान था। सुंदर दंतपंक्ति और मुस्कान से उनका मुखमंडल सुशोभित था, जिस पर तीनों नेत्र प्रकाशमान थे। भगवान विष्णु ने भूमि से उठकर जगदंबिका से हाथ जोड़कर रोमांचित होते हुए भक्तिपूर्वक कहा – ।।44-47।।    

श्रीभगवान बोले – माँ ! पौलस्त्य (विश्रवा) – का पुत्र राक्षसराज रावण आपके कृपा प्रसाद के अभिमान से सम्पूर्ण जगत को पीड़ित कर रहा है। इस कारण से सभी देवता और गंधर्वगण ब्रह्माजी की शरण में गए और ब्रह्माजी ने भी उस दुष्ट के वध हेतु पृथ्वी पर मनुष्य रूप में मुझसे अवतार लेने को कहा। जगदीश्वरी ! मैंने भी उन्हें ऐसा ही करने का वचन दिया है कि पृथ्वी लोक में दशरथ के पुत्र रूप में अवतार लेकर मैं उस दुष्टात्मा का संहार करूँगा, किन्तु वह महाभाग नित्य ही आपकी और भगवान महेश्वर की सेवा करता है। आप भी परम प्रसन्न होकर उसकी रक्षा हेतु उसके नगर में ही वास करती हैं। देववंदिते ! उस देवशत्रु रावण का युद्ध में कैसे नाश होगा? जिसके संरक्षक आप और महेश्वर शिव हैं, उसे कौन मार सकता है ! शिवे ! आप तो स्वयं ही लंकेश्वरी होकर विराजमान रहती हैं। जगदम्बा ! इस संसार की रक्षा के लिए आप ही कोई उपाय बताएं। आपको प्रणाम है – ।।48-55।। 

श्रीदेवी जी बोली – मधुसूदन ! रावण ने दीर्घकाल तक मेरी पूजा की है। यह भी सत्य है कि मैं उसकी रक्षा के लिए ही लंका में निवास करती हूँ। उस महाबली रावण ने जिस भक्तिभाव से मेरी और महेश्वर की आराधना की तथा उसके फलस्वरूप उसे जो संपदा मिली है, उससे अब उसके लिए इस संसार में कुछ भी पाना दुर्लभ नहीं रहा। उसके सारे मनोरथ पूर्ण हो चुके हैं और उसे तपस्या का सम्पूर्ण फल प्राप्त हो चुका है।।56-58।।

अब अपने बल के घमंड से वह इस चराचर जगत को अपने विनाश के लिए ही पीड़ित कर रहा है। मैं स्वयं भी अब उसके संहार के बारे में सोचती हूँ। यदि कोई उपयुक्त निमित्त प्राप्त हो जाए तो मैं स्वयं ही उस दुष्ट को मार डालूँगी, किंतु मेरा स्वयं उसे मारना उचित नहीं लगता। ब्रह्माजी ने ठीक ही कहा है, आपको ही मनुष्यरूप में अवतार लेना चाहिए।।59-61।।               

उस रूप में आप उसके वध का प्रयत्न करें। आपके मनुषयरूप धारण करने पर मेरी अंशभूता लक्ष्मी भी आपकी सहायता करेंगी। वे भी मनुषयरूप में पृथ्वीतल पर अवतरित होगी। वह दुर्बुद्धि वीर रावण उन्हें देखकर कामासक्ति से मोहित होकर अत्यंत लोभपूर्वक मेरे ही दूसरे रूप में प्रकट हुई उन देवी का बलपूर्वक अपहरण कर लेगा। उनके लंका में प्रवेश करने पर भगवान शिव की अनुमति से मैं निश्चय ही उस दुष्टात्मा के विनाश के लिए लंका नगरी का त्याग कर दूँगी। मेरी ही दूसरी मूर्ति लक्ष्मी का जब वह अपमान करेगा तो मेरे कोप से निश्चय ही उसका नाश हो जाएगा।।62-66।। 

मधुसूदन ! मेरे द्वारा लंका नगरी का त्याग करने पर तथा उस दुष्टात्मा रावण के वध हेतु सूर्यवंश के रघुकुल में आपके मनुष्यरूप में अवतार लेने पर ब्रह्माजी के पुत्र ब्रह्मर्षि वसिष्ठ आपको मंत्र प्रदान करेगें। मधुसूदन ! घोर संग्राम में उस परम गोपनीय मंत्र का जब आप अपनी रक्षा तथा रावण के वध के निमित्त स्मरण करेंगे तब रावण के द्वारा चलाए हुए दारुण बाण भी आपको नहीं वेध सकेंगे।।67-70।। 

महामते ! बाणों के उस भयंकर युद्ध में आपको मुझ संहारकारिणी का निरंतर स्मरण करना चाहिए, उससे आपकी विजय होगी। मेरी कृपा से अत्यंत दुस्तर समुद्र को भी लीलापूर्वक वानरों सहित पार करके निश्चय ही लंका में प्रवेश कर सकेंगे।।71-72।। तात ! ब्रह्माजी के बताए विधान से शरतकाल में समुद्र के तट पर मेरी मिट्टी की सुन्दर प्रतिमा बनाकर जनार्दन ! वेदोक्त विधान से मेरी पूजा करके आप उस दुर्धर्ष रावण को स्वर्णमण्डित रथ से गिरा सकेंगे। उस वीरवर रावण का पुत्रों तथा बंधु-बाँधवों सहित युद्ध भूमि में संहार करके मेरी कृपा से आपको लंका विजयी की ख्याति प्राप्त हो जाएगी। इसलिए मधुसूदन ! आप दुष्टात्मा राक्षसराज रावण के वध के लिए शीघ्र ही मनुषयरूप धारण करें।।73-76।। 

श्रीभगवान बोले – माता ! आपमें उस रावण की दृढ़ भक्ति है और वह निरंतर आपका भक्तिपूर्वक स्मरण करता रहता है। आप करुणामयी होने के कारण उसका और उसकी लंका का कैसे त्याग कर पाएगी? वह दुर्धर्ष रावण जब संकट आने पर आपका भक्तिपूर्वक स्मरण करेगा, तब सुरेश्वरी ! उस समय मैं उसे कैसे मार पाऊँगा, यह मुझे बताए! ।।77-78।। 

शिवे ! परमेश्वरी ! जो आपका स्मरण करते हैं, उन्हें भय उपस्थित होने पर मैं, भगवान शंकर और यमराज भी वहाँ पहुंचकर अपने आयुध तथा शक्ति से उनका सरंक्षण करते हैं। तब युद्धभूमि में आपका स्मरण करते हुए आपके भक्त उस रावण का मैं कैसे संहार कर पाऊँगा, जो कि मुझसे रक्षित होने योग्य है।।79-80।।

श्रीपार्वतीजी बोली – महाबाहो ! यह सत्य है कि युद्धभूमि में रावण मेरा स्मरण करेगा तथापि वह जिस प्रकार मृत्यु को प्राप्त होगा, उसे सुनें।।81।। यह सारा संसार मेरा ही है और मैं ही इस संसार के रूप में प्रकट हूँ। जो इस संसार को पीड़ित करता है वह मुझे ही पीड़ित करता है। इस संसार को सताते हुए यदि कोई संकट आने पर मेरा भक्तिपूर्वक स्मरण करता है तो उसे सांसारिक फल नहीं मिलता, अपितु पारलौकिक फल ही मिल पाता है। इस समस्त संसार के प्रति द्वेष ना रखते हुए जो मेरा भक्तिभाव से स्मरण करता है उसका तो मैं इस लोक तथा परलोक में सदा संरक्षण करती हूँ। महामते ! आप लोग भी उस भक्ति की रक्षा के लिए यत्नवान रहते ही है।।82-841/2।।

संकट में महान भयभीत होकर वह रावण जब मेरा स्मरण करेगा तो उसका वह स्मरण विफल ही होगा। इस संसार में चिरकाल तक मनोवांछित भोगों को भोगकर उसे परम दुर्लभ मोक्ष की प्राप्ति होगी। मधुसूदन ! शरीरधारियों के लिए इससे अधिक और क्या प्राप्य हो सकता है ! ।।85-87।।

लंकापुरी में मेरे रहते हुए उसकी युद्धभूमि में मृत्यु असंभव है, इसलिए उस पुरी का मैं त्याग कर दूँगी। युद्धभूमि में मैं उसका संरक्षण भी नहीं करूँगी; क्योंकि वह संसार के लोगों को सताता रहता है। इसलिए आप भगवान सदाशिव को नमस्कार करके मनुष्यरूप में अवतरित हो जाएं।।88-89।।      

।। इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अंतर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में “श्रीभगवती-नारायण-संवाद वर्णन” नामक छत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।36।।  

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महाभागवत – देवीपुराण – सैंतीसवाँ अध्याय