महाभागवत – देवीपुराण – ग्यारहवाँ अध्याय 

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इस अध्याय में त्रिदेवों द्वारा जगदम्बिका की स्तुति करना, देवी का भगवान शंकर को पार्वती रूप में पुन: प्राप्त होने का आश्वासन देना, छाया सती की देह लेकर शिव का प्रलयंकारी नृत्य करना, भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र से सती के अंगों को काटना और उनसे इक्यावन शक्तिपीठों का प्रदुर्भाव होना बताया गया है. 

श्रीमहादेव जी बोले – इस प्रकार यज्ञ के सम्पूर्ण होने पर सती के वियोग से दु:खी शिव साधारण मनुष्यों के समान बार-बार रुदन करने लगे।।1।। तब ब्रह्मा और विष्णु ने उन भगवान से कहा – महाज्ञानी ! आप अज्ञानी के समान मोहग्रस्त होकर क्यों रुदन कर रहे हैं?।।2।। वे देवी जगदम्बा तो सनातन पूर्णब्रह्मस्वरुपा हैं. वे ही महाविद्या हैं, समस्त विश्व की सृष्टि करने वाली हैं और सर्वचैतन्यस्वरूपिणी हैं. जिनकी माया के प्रभाव से सम्पूर्ण संसार तथा हम सभी विमोहित हैं, उनके द्वारा शरीर छोड़ने की बात तो भ्रान्तिपूर्ण विडम्बना ही है।।3-4।। प्रभो! महेश्वर! जिनकी कृपा से आप मृत्युंजय हैं, उनकी मृत्यु तो वास्तविक नहीं है. यह भ्रममात्र ही है।।5।। हम तीनों पुरुष (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) भी उन्हीं के स्वरुप हैं. इस बात से (अर्थात भगवती को मृत मानकर प्राकृत पुरुष की भाँति विलाप करने से) आप ही की निन्दा ध्वनित होती है, उनकी नहीं।।6।। 

परमेश्वर ! उन पार्वती की निन्दा घोर पाप को उत्पन्न करने वाली है, जिसके द्वारा इस प्रकार का पाप होता है, उसका वे निश्चय ही त्याग कर देती हैं।।7।। वे महादेवी धर्मशील पुरुष का कभी त्याग नहीं करती. अधर्मी का त्याग करने में वे पिता आदि संबंधों का भी विचार नहीं करती।।8।। उनका संबंध तो मात्र धर्म से ही रहता है न कि लौकिक कारणों से. जो धर्माचरण करता है, वही उनका पिता, माता और बान्धव है।।9।। जो अधर्म करने वाला है, वह उनका बान्धव नहीं परम शत्रु है. इसी कारण भगवान शिव की निन्दारूपी पाप में रत देखकर दक्षप्रजापति का उन महेश्वरी ने त्याग कर दिया. यदि वे पराम्बा दक्ष की पुत्री के भाव में स्थित होती तो दुर्दान्त दक्षप्रजापति का दमन कैसे होता? इसलिए धर्म-कर्म के फल को प्रदान करने वाली वे महादेवी उस महापापी का त्याग करके स्वयं अपने धाम में चली आईं।।1011।। 

क्या वे क्षण मात्र में ही प्रजापति का संहार करने में असमर्थ थीं? फिर भी उन्होंने इसकी जो उपेक्षा की वह लोकशिक्षण के लिए था. धर्म का उपदेश करने वाली वे भगवती यदि ऎसा आचरण नहीं करती तो लोग पिता के प्रति सहिष्णु कैसे हो पाते? इसलिए वे नित्या परमा शक्ति प्रजापति दक्ष को अपनी माया से मोहित करते हुए और स्वयं अपनी मायाशक्ति से अन्तर्धान होकर गगन-मण्डल में स्थित हो गईं. महादेव ! आप शोक का त्याग करें, क्योंकि अग्नि में तो सती की छाया ने ही प्रवेश किया है।।13-16।।

शिवजी बोले – आप लोगों ने जो कुछ कहा वह सत्य ही है. सती मेरी परा प्रकृति हैं. वे नित्या, ब्रह्ममयी और सूक्ष्मरूपा हैं. उन्होंने स्वयं अपनी देह का त्याग नहीं किया है. किंतु वे मेरे प्राणों की एकमात्र प्रियतमा सती कहाँ चली गयीं? (इस भाव से मुझे व्याकुलता होती है) पुन: जब मैं शान्तचित्त होता हूँ तो उन्हें परमेश्वरी के रूप में देखता हूँ।।17-18।। 

ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र बोले – उन सर्वलोक की एकमात्र वन्दिता जगज्जननी की हम लोग स्तुति करते हैं, तभी प्रसन्न होकर वे पुन: दर्शन देंगी।।19।। 

श्रीमहादेव जी बोले – नारद ! भगवान शिव के साथ वे देवगण ऎसा निश्चय करके साक्षात् ब्रह्मस्वरूपिणी महादेवी की स्तुति करने लगे।।20।।

ब्रह्मा, विष्णु और शिव बोले – आप नित्या, परमा विद्या, जगत में चैतन्यरूप से व्याप्त और पूर्ण-ब्रह्मस्वरूपा देवी हैं. आप स्वेच्छा से शरीर धारण करती हैं. आपका वह परम रूप वेद और आगम से सुनिश्चित अद्वैत ब्रह्म ही है. अपरोक्षानुभूति से जानने योग्य तथा परम गोपनीय आपको हम नमस्कार करते हैं।।21-22।। आप सृष्टि के निमित्त प्रकृति और पुरुष के रुप में स्वयं ही शरीर धारण करती हैं, इसलिए वेदों के द्वारा आपको कल्पित द्वैतरूपा कहा गया है. उस सृष्टि प्रक्रिया में भी आपके बिना पुरुष अपूर्ण और शव के समान ही है. अत: सभी देवताओं में आपकी प्रधानता कही जाती है।।23-24।। 

शिवे ! इस प्रकार की अचिन्त्य रूप और लीला वाली आपकी स्तुति करने में हम अल्पबुद्धिवाले कैसे सक्षम हो सकते हैं. आप स्वयं स्वेच्छा से हमारी सृष्टि और संहार करती हैं. इसलिए इस त्रिलोकी में आपकी स्तुति करने में कौन समर्थ है! ।।25-26।। सभी ज्ञानीजन भी सामान्य मनुष्यों की भाँति आपकी माया से मोहित हैं तो हम आप परमेश्वरी की वन्दना करने में कैसे समर्थ हो सकते हैं? आप ही हमारी चेतना, बुद्धि और शक्ति हैं, आपके बिना हम सभी शव की तरह हैं. अत: हम आपकी स्तुति कैसे करें! आप त्रिगुणात्मक बन्धन से बाँधकर अपनी माया से अज्ञानियों की भाँति हमें भी भ्रान्त कर रही हैं, अत: आपके यथार्थ स्वरुप को कौन जान सकता है! ।।27-29।। परमेश्वरी ! दक्ष प्रजापति के घर में हम लोगों ने आपके उस रूप के दर्शन किए थे, कृपापूर्वक उसी प्रकार हमें पुन: दर्शन दें. जगत को धारण करने वाली आप महेश्वरी को न देखकर हम कान्तिहीन हो गए हैं. इस कारण शव के समान हम आपको अपनी आत्मा तथा प्राण के रूप में देखते हैं।।30-31।।

श्रीमहादेवजी बोले – इस प्रकार स्तुति करने पर महादेवी ने देवताओं के विषाद और शिव की विकलता देखकर आकाश में उन्हें दर्शन दिया।।32।। भगवती काली जिस रूप में दक्ष के यज्ञ में आयी थीं और अपनी माया के द्वारा उनकी छाया जिस प्रकार अग्नि में प्रविष्ट हुई थी, उस मूल प्रकृति को उन्होंने निर्निमेष दृष्टि से देखा. उन महादेवी ने शिव से कहा – महादेव ! आप स्थिरचित्त हों, मैं स्वयं हिमालय की पुत्री बनकर तथा मेना के गर्भ से जन्म लेकर पुन: आपको प्राप्त करूँगी. यह मैं आपसे सत्य कहती हूँ।।33-35।। महेश्वर ! मैंने आपका परित्याग कभी नहीं किया, आप ही मुझ महाकाली के हृदयस्थान और परम आश्रय हैं, इसी से आप जगत्संहारक महाकाल कहे जाते हैं।।36½।। आपने प्रभुता के अभिमान से मुझे कुछ कहा था, उसी अपराध के कारण मैं आपकी साक्षात् पत्नी के रूप में कुछ समय तक नहीं रह सकूँगी. शिव ! आप शान्तचित्त हो जाएँ।।37-38।। 

शम्भो ! मैं आपको एक उपाय बताती हूँ, उसे ही आप संपन्न करें. तब निश्चय ही आप मुझे पहले से भी अधिक सुन्दर स्वरुप में पुन: प्राप्त करेंगे।।39।। महेश्वर ! शिव ! दक्ष की यज्ञाग्नि में मेरे जिस छाया शरीर ने प्रवेश किया था, उसे सिर पर लेकर मेरी प्रार्थना करके, आप इस पृथ्वी पर भ्रमण करें।।40।। वह मेरा छाया शरीर अनेक खण्डों में होकर पृथ्वी पर गिरेगा और उस-उस स्थान पर पापों का नाश करने वाला महान शक्तिपीठ उदित होगा।।41।। जहाँ योनि भाग गिरेगा, वह सर्वोत्तम शक्तिपीठ होगा. वहाँ रहकर तपस्या करके आप मुझे पुन: प्राप्त करेंगे।।42।। 

मुनिश्रेष्ठ ! ऎसा कहकर और महादेव को बार-बार आश्वासन देकर वे देवी अन्तर्धान हो गईं।।43।। मुने! ब्रह्मादि श्रेष्ठ देवगण अपने-अपने लोकों को चले गए और शिवजी पुन: दक्ष के घर में आकर प्रिये ! सती ! सती ! ऎसा कहते हुए सामान्य जन के समान रुदन करने लगे।।44½।। यज्ञशाला में प्रवेश करके उन्होंने सती के छाया शरीर को देदीप्यमान देखा. वह शरीर भूमि पर स्थित था, नेत्र मुँदे हुए थे एवं सभी अंगों से परिपूर्ण था. सती की उस छाया को सहज भाव में सोयी हुई-सी देखकर शोक से व्याकुल हृदय होकर शिवजी ने इस प्रकार कहा – ।।45-46½।। 

सती ! मैं तुम्हारा पति तुम्हारे पास आया हूँ, तुम उठो, पहले की भाँति मुझसे वार्तालाप क्यों नहीं कर रही हो? अपराधी मुझे एवं दक्ष को शोक के महासमुद्र में गिराकर अपनी माया से हमें मोहित करती हुई तुम स्वयं अन्तर्धान हो गई हो. अब मैं अपनी एकमात्र तुझ प्राणप्रिया का त्याग कभी नहीं करुँगा. प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें लेकर मैं कितने दिन घूमता रहूँगा? ।।47-49½।। मुने ! इस प्रकार साधारण मनुष्यों की भाँति बहुधा विलाप करते हुए शिवजी ने अपनी भुजाओं से सती के छाया शरीर का आलिंगन करते हुए उसे सिर पर उठा लिया।।50½।। 

शंकर जी सती के उस छाया शरीर को सिर पर रखकर अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक धरती पर नाचने लगे। ब्रह्मा आदि सुरश्रेष्ठ तथा इन्द्र के नेतृत्व में अन्य देवगण इस अपूर्व दृश्य को देखने अपने-अपने रथों में बैठकर आकाश में आ गये. दसों दिशाओं में सम्यक् पुष्पवृष्टि होने लगी. तदनन्तर सुशोभित जटाओं वाले प्रमथगण मुखवाद्य बजाने लगे और नाचने लगे।।51-53½।। चारों ओर नाचते हुए शिवजी सती के छाया शरीर को कभी सिर पर, कभी दाएँ हाथ में, कभी बाएँ हाथ में तो कभी कन्धे पर और कभी प्रेमपूर्वक वक्ष:स्थल पर धारण कर अपने चरण-प्रहार से पृथ्वी को कम्पित करते हुए नृत्य करने लगे।।54-55½।। चन्द्रलोक में स्थित चन्द्रमा उनके ललाट पर तिलक के समान सुशोभित होने लगा, नक्षत्रमण्डल देदीप्यमान जटाओं में गुँथ गया और सूर्यलोक में स्थित भगवान भास्कर उनके कण्ठाभरण बन गये।।56-57।।

महामुने! कच्छप और शेषनाग उनके चरणाघातों से पीड़ित होकर धरती छोड़ने को उद्यत हो गये. अत्यन्त वेगपूर्वक नृत्य करने से प्रचण्ड वायु बहने लगी, जिसके कारण सुमेरु आदि बड़े-बड़े पर्वत वृक्षों के समान कांपने लगे. इस प्रकार चराचर जगत् को क्षुब्ध करते हुए और सती के छाया शरीर को सिर पर धारण किये हुए नटराज शिव सम्पूर्ण पृथ्वी पर घूमते रहे और वे प्रसन्नतापूर्वक मन में ऎसा सोचने लगे – ।।58-60।। सती ! तुम मेरी पत्नी हो, इसलिए मैं लोकलाज छोड़कर तुम्हारी छाया को सिर पर ढो रहा हूँ, यह मेरा अहोभाग्य है. इस प्रकार अपने भाग्य की सराहना करते हुए शिवजी आनन्दमग्न होकर पुन:-पुन: नृत्य करने लगे।।61-62।। 

इससे सारा संसार अत्यन्त क्षुब्ध होने गया, पक्षीगण मृतक के समान हो गये और लोग अकाल प्रलय की कल्पना करने लगे।।63।। ब्रह्माजी की आज्ञा से ऋषिगण महान् स्वस्तिवाचन करने लगे. देवताओं को चिन्ता हुई कि यह कैसी विपत्ति आ गयी. वे सोचने लगे कि अब संसार की रक्षा का कोई उपाय नहीं दिखता. इस दक्ष ने शिवजी से द्वेष करने के कारण ऎसा कुयज्ञ प्रारम्भ किया, जिससे इस संसार सहित हम सबका नाश हो जाएगा. विघूर्णित नेत्र वाले, सर्वसमर्थ शिवजी तो आनन्द से मतवले होकर सृष्टि पर आयी इस विपत्ति का विचार नहीं कर रहे हैं, वे जगत्संहारक रुद्र कैसे शान्त होंगे? ।।64-67।।

भगवान विष्णु बोले – देवगणों ! मैं उपाय बताता हूँ, आप लोग उसका प्रयत्न करें. महादेवी ने पहले ऎसा कहा था कि सती का छाया शरीर भूतल पर अनेक खण्डों में निश्चय ही गिरेगा और जहाँ-जहाँ इस देह के खण्ड गिरेंगे, उन-उन स्थानों पर शक्तिपीठ रूप पुण्यतीर्थ का उदय होगा. उन देवी ने जो कुछ भी कहा है, वह कभी असत्य नहीं होगा।।67-71।। सती का छाया शरीर भूतल पर अवश्य गिरेगा. अत: सृष्टि की रक्षा के लिए मैं महान् साहस करके परमानन्दमग्न शिव के सिर पर स्थित सती के छाया शरीर को समर्थ सदाशिव के अनजाने में सुदर्शन चक्र से टुकड़े-टुकड़े कर गिराऊँगा. मेरे द्वारा ऎसा करने पर शिवजी के कोप से निश्चय ही वे ब्रह्ममयी जगत्पालनकारिणी महादेवी मेरी रक्षा करेंगी।।72-74½।।

देवी बोलीं – प्रभु विष्णु ! जगन्नाथ ! आप ऎसा यदि करें, तभी जगत् की रक्षा होगी नहीं तो प्रलय हो जाएगा।।75½।।