श्रीराम स्तोत्र

ऊँ श्रीरामो रामचन्द्रश्च रामभद्रश्च शाश्वत:।

राजीवलोचन: श्रीमान् राजेन्द्रो रघुपुंगव: ।।

जानकीवल्लभो जैत्रो जितामित्रो जनार्दन:।

विश्वामित्रप्रियो दान्त: शरण्यत्राणतत्पर:।।

वालिप्रमथनो वाग्मी सत्यवाक् सत्यविक्रम:।

सत्यव्रतो व्रतफल: सदा हनुमदाश्रय:।।

कौसल्येय: खरध्वंसी विराधवधपण्डित:।

विभिषणपरित्राता दशग्रीवशिरोहर:।।

सप्ततालप्रभेत्ता च हरकोदण्डखण्डन:।

जामदग्न्यमहादर्पदलनस्ताटकान्तकृत् ।।

वेदान्तपारो वेदात्मा भवबन्धैकभेषज:।

दूषणत्रिशिरोSरिश्च त्रिमूर्तिस्त्रिगुणस्त्रयी।।

त्रिविक्रमस्त्रिलोकात्मा पुण्यचारित्रकीर्तन:।

त्रिलोकरक्षको धन्वी दण्डकारण्यवासकृत् ।।

अहल्यापावनश्चैव पितृभक्तो वरप्रद:।

जितेन्द्रियो जितक्रोधो जितलोभो जगद्गुरु:।।

ऋक्षवानरसंघाती चित्रकूटसमाश्रय:।

जयन्तत्राणवरद: सुमित्रापुत्रसेवित:।।

सर्वदेवाधिदेवश्च मृतवानरजीवन:।

मायामारीचहन्ता च महाभागो महाभुज:।।

सर्वदेवस्तुत: सौम्यो ब्रह्मण्यो मुनिसत्तम:।

महायोगी महोदार: सुग्रीवस्थिरराज्यद:।।

सर्वपुण्याधिकफल: स्मृतसर्वाघनाशन:।

आदिपुरुषो महापुरुष: परम: पुरुषस्तथा।।

पुण्योदयो महासार: पुराणपुरुषोत्तम:।

स्मितवक्त्रो मितभाषी पूर्वभाषी च राघव:।।

अनन्तगुणगम्भीरो धीरोदात्तगुणोत्तर:।

मायामानुषचारित्रो महादेवाभिपूजित:।।

सेतुकृज्जितवारीश: सर्वतीर्थमयो हरि:।

श्यामांग सुन्दर: शूर: पीतवासा धनुर्धर:।।

सर्वयज्ञाधिपो यज्ञो जरामरणवर्जित:।

शिवलिंगप्रतिष्ठाता सर्वाघगणवर्जित:।।

परमात्मा परं ब्रह्म सच्चिदानन्दविग्रह:।
परं ज्योति: परं धाम पराकाश: परात्पर:।।

परेश: पारग: पार: सर्वभूतात्मक: शिव:।

इति श्रीरामचन्द्रस्य नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ।।

गुह्याद्गुह्यतरं देवि तव स्नेहात् प्रकीर्तितम् ।।

(पद्म. उत्तर. 281/30-48)

भगवान शंकर कहते हैं – ये श्रीरामचन्द्रजी के एक सौ आठ नाम हैं. देवि! ये नाम गोपनीय से भी गोपनीय हैं, किन्तु स्नेहवश मैंने इन्हें तुम्हारे सामने प्रकाशित किया है.

जो भक्तियुक्त चित्त से इन नामों का पाठ या श्रवण करता है, वह सौ कोटि कल्पों में किये हुए समस्त पापों से मुक्त हो जाता है. पार्वती! इन नामों का भक्ति भाव से पाठ करने वाले मनुष्यों लिये भी जल भी स्थल हो जाते हैं, शत्रु मित्र बन जाते हैं, राजा दास हो जाते हैं, जलती हुई आग शान्त हो जाती है, समस्त प्राणी अनुकूल हो जाते हैं, चंचल लक्ष्मी भी स्थिर हो जाती है, ग्रह अनुग्रह करने लगते हैं तथा समस्त उपद्रव शान्त हो जाते हैं. जो भक्तिपूर्वक इन नामों का पाठ करता है, तीनों लोक के प्राणी उसके वश में हो जाते हैं तथा वह मन में जो-जो कामना करता है, वह सब इन नामों के कीर्तन से पा लेता है.

जो दूर्वादल के समान श्यामसुन्दर कमलनयन, पीताम्बरधारी भगवान श्रीराम का इन दिव्य नामों से स्तवन करते हैं, वे मनुष्य कभी संसार बन्धन में नहीं पड़ते. राम, रामभद्र, रामचन्द्र, वेधा, रघुनाथ, नाथ एवं सीतापति को नमस्कार है –

रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे । रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नम:।।

(पद्म. उत्तर. 281/55)

देवि! केवल इस मंत्र का भी जो दिन-रात जप करता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर श्रीविष्णु का सायुज्य प्राप्त कर लेता है.

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