मार्गशीर्ष(मंगसिर या अगहन) माह के व्रत और त्यौहार

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मार्गशीर्ष माह की गणेश जी की कथा – Story Of Lord Ganesha In The Month Of Margashirsha

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त्रेता युग में राजा दशरथ अयोध्या नगरी में राज किया करते थे. वह बहुत ही धार्मात्मा आदमी थे. एक बार वह शिकार खेलने गए तो उनके शब्दवेधी बाण से एक ऋषिपुत्र अचेत हो गया वह अपने अंधे माता-पिता के लिए सरयू नदी से पानी भर रहा था. लड़के का नाम श्रवण कुमार था जो अपने अंधे माता-पिता को काँवड़ में बिठाकर तीर्थ यात्रा के लिए निकला था. राजा दशरथ ने जब आकर देखा तो पता चला कि उनका बाण श्रवण को लग गया था, उसने राजा दशरथ को देख अपने माता-पिता को पानी पिलाने के लिए कहा और उसके बाद उसके प्राण निकल गए.

राजा ने श्रवण के माता-पिता को पानी पिला दिया और इसके बाद सारी बात बता दी कि अनजाने में श्रवण की मृत्यु हो गई. सारी बात जानने के बाद उन अंधे माता-पिता ने राजा दशरथ को श्राप दिया कि जैसे हम अपने पुत्र के वियोग में तड़प रहे हैं वैसे ही एक दिन तुम भी तड़पोगे और तुम्हारी मृत्यु भी ऎसे ही पुत्र वियोग में होगी. राजा ने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ किया तो पुत्र रुप में रामचन्द्र जी की प्राप्ति हुई लेकिन कुछ साल बाद रामचन्द्र जी सीता माता व लक्ष्मण के साथ चौदह वर्ष के लिए वनवास चले गए.

वनवास के समय ही रावण सीता का हरण कर लंका ले जाता है और उन्हें अशोक वाटिका में रखता है. सीता हरण के समय जटायु रावण से युद्ध करते हुए मारा जाता है और जटायु का भाई संपाति पता लगाता है कि सीता को रावण ने कहाँ रखा हुआ है. संपाति कहता है कि यदि हनुमान जी गणेश जी की कृपा प्राप्त कर लेते हैं तो वह सीता का पता करने लंका जा सकते हैं. श्रीराम जी की आज्ञा पाकर हनुमान जी गजानन का व्रत करते हैं. गजानन के व्रत के प्रभाव से बिना कोई देरी किए वह लंका जाते हैं और सीता माता का हाल पूछते हैं और श्रीराम के बारे में समाचार भी देते हैं. उसके बाद श्रीराम जी रावण को पराजित कर लंका पर अपनी विजय स्थापित करते हैं और सीता माता को मुक्त कराते हैं.

 

सुदी पूनम – Sudi Poonam In Margashirsha Month

इस माह में मंगसिर माह का माहात्म्य सुनना चाहिए. गंगाजी में स्नान के बाद ब्राह्मण को जिमाना चाहिए, दान करना चाहिए. हवन आदि भी इस समय कराना शुभ रहता है. भगवान की पूजा कर के दीया जलाते रहना चाहिए. इस समय अगर किसी की सामर्थ्य हो तो भगवान को छप्पन भोग भी लगा सकता है.

 

भैरव जयन्ती – Bhairav Jayanti In Margashirsha Month

मार्गशीर्ष माह में कृष्ण पक्ष की अष्टमी को भैरव जयन्ती मनाई जाती है. इसे कालाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है. इस तिथि को भैरव जी का जन्म हुआ था तो इसे भैरव जयन्ती कहते हैं. इस दिन व्रत भी रखा जाता है और जल का अर्ध्य भैरव जी को देकर उनकी पूजा की जाती है. कुत्ते को भैरव जी की सवारी माना गया है इसलिए इस दिन कुत्ते का पूजन भी किया जाता है.

इस जयन्ती पर व्रत रखकर रात्रि जागरण किया जाता है और शिव पार्वती जी की कथा सुनते हैं. भैरव जी का मुख्य हथियार दण्ड माना गया है इसलिए इन्हें दण्डपति भी कहते हैं. भगवान शिव के दो रुप और माने गए हैं, वह भैरव और विश्वनाथ हैं. रविवार और मंगलवार को भैरव जी का दिन माना गया है. इन दोनो दिनों में इनकी पूजा करने से भूत प्रेत बाधाओं का अंत होता है.

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भैरव जयन्ती की कहानी – Story Of Bhairav Jayanti

एक बार की बात है ब्रह्मा जी व विष्णु जी में विवाद हो जाता है कि विश्व का धरणहार तथा परम तत्व कौन है? इस विवाद का कोई हल नहीं निकला तो महर्षियों को हल के लिए बुलाया गया. महर्षियों ने अपना मत बताया कि “परमतत्व कोई अव्यक्त सत्ता है. ब्रह्मा तथा विष्णु जी उसी विभूति से बने हैं. विष्णु जी तो महर्षियों की बात मान लेते हैं लेकिन ब्रह्मा जी उनकी बात से सहमत नहीं हुए क्योंकि वे स्वयं को ही परम तत्व मानते थे. परम तत्व की अवज्ञा करना बहुत बड़ा अपराध था. इस अपराध का फल देने के लिए शिवजी ने तत्काल भैरव का रुप धारण करके अष्टमी के दिन ब्रह्मा जी का गर्व चूर कर दिया. उसी दिन से इस दिन को भैरव अष्टमी कहा जाने लगा.

 

रानी सती जी का उजमण – Rani Sati Ji Ka Ujaman

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मार्गशीर्ष अथवा मंगसिर की कृष्ण नवमी को रानी सती जी का जन्म हुआ था. इस दिन रानी सती के मंदिर में जाकर सती माता का भली प्रकार से सभी प्रकार की सामग्रियों से पूजन करना चाहिए. इस दिन उद्यापन भी किया जाता है. भक्ति तथा श्रद्धा भाव से पूजन करना चाहिए.

 

दत्तात्रेय जयन्ती – Dattatreya Jayanti

मार्गशीर्ष माह की कृष्ण दशमी को दत्तात्रेय जयन्ती मनाई जाती है. पुराणों के अनुसार इनके तीन सिर व छ: भुजाएँ मानी जाती हैं. इन्हें त्रिदेवों का अंश कहा गया है.

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दत्तात्रेय जयन्ती की कहानी – Story Of Dattatreya Jayanti

इनके जन्म की कथा बड़ी विचित्र सी बताई गई है. एक बार की बात है कि नारद मुनि भगवान शंकर, विष्णु तथा ब्रह्मा जी से मिलने स्वर्ग गए लेकिन उनकी भेंट तीनों देवों में से किसी से नहीं हो पाई. उनकी मुलाकात त्रिदेवों की पत्नियों पार्वती,लक्ष्मी तथा सरस्वती जी से हो गई. उनसे मिलने पर नारद मुनि ने तीनों का घमंड तोड़ने के लिए कहा कि मैं विश्व भर में घूमता हूँ परन्तु अत्रि ऋषि की पत्नी अनुसूइया के जैसी पतिव्रता धर्म वाली, सुशील व सदगुण संपन्न स्त्री मैने कहीं नहीं देखी. वह आगे कहते हैं कि देवियाँ भी पतिव्रत धर्म के पालन में उनसे पीछे हैं.

नारद मुनि की बात सुनकर उन तीनों देवियों को के अहंकार को बहुत ठेस पहुंचती है क्योंकि वे कहती थी कि उनके समान पतिव्रता स्त्री पूरे संसार में कहीं भी नहीं हैं. नारद मुनि के जाने के बाद तीनों देवियाँ अपने-अपने पतियों से देवी अनुसूइया का पतिव्रत धर्म तोड़ने को कहती हैं. संयोग की बात यह होती है कि तीनों देव अत्री मुनि के आश्रम में एक ही उद्देश्य लेकर एक साथ पहुंच जाते हैं. वह तीनों ही अनुसूइया का पतिव्रत धर्म भ्रष्ट करना चाहते थे तो उन्होंने एक योजना बनाई और योजना के अनुसार वह तीनों ऋषियों का वेष धरकर भोजन की इच्छा देवी अनुसूइया के सामने प्रकट करते हैं.

देवी अनुसूइया अतिथि सत्कार को अपना धर्म समझती थी इसलिए वे तीनों देवों से कहती हैं कि आप स्नानादि से निवृत होकर आए तब तक मैं आपके लिए भोजन का इंतजाम करती हूँ. तीनों देवों के स्नान करने पर देवी ने उन्हें आसन ग्रहण करने को कहा. आसन ग्रहण करने की बात पर तीनों कहते हैं कि हम आसन तभी ग्रहण करेगें जब तुम प्राकृतिक अवस्था में अर्थात बिना वस्त्रों के हमें भोजन कराओगी.

यह सुनकर अनुसूइया देवी को क्रोध तो बहुत आया लेकिन वह इन तीनों की चालाकी समझ चुकी थी. अनुसूइया देवी ने अपने पति ऋषि अत्री के चरणोदक को तीनो देवों पर छिड़क दिया जिसके प्रभाव से त्रिदेव छोटे बच्चे के रुप में बदल गए. अब अनुसूइया उनकी शर्त के आधार पर उन्हें भोजन कराती है और सभी को अलग-अलग पालने में सुलाकर पालना झुलाने लगती है. काफी समय बीत जाने पर भी त्रिदेव वापिस नहीं जाते तो तीनो देवियाँ उनकी खोज में निकलती हैं और अत्री ऋषि के आश्रम में पहुंचती हैं. वहाँ पहुंचकर वह अनुसूइया से त्रिदेवों के बारे में पूछती हैं तो अनुसूइया पालने की ओर इशारा कर कहती हैं कि तुम्हारे देव पालने में सो रहे हैं.

अनुसूइया कहती है कि तीनों पालने में सो रहे हैं अपने-अपने देवों को पहचानो और ले जाओ. तीनों देवियाँ जब पालने में झाँकती है तो छोटे रुप में तीनो बालकों का चेहरा एक समान ही होता है जिससे वे पहचान ही नहीं पाती कि कौन सा देव किस बालक के रुप में है. लक्ष्मी माता थोड़ी चतुराई दिखाते हुए विष्णु जी को पहचानते हुए उन्हें उठाती तो हैं लेकिन वह शंकर जी निकलते हैं जिससे उन्हें उपहास का पात्र बनना पड़ता है.

तीनों देवियाँ माता अनुसूइया से बहुत अनुनय-विनय तथा विनती करती हैं कि उन्हें उनके देव लौटा दो. माता कहती हैं कि इन तीनों ने मेरा दूध पीया है इसलिए इन्हें मेरे पास किसी ना किसी रुप में रहना ही होगा. ऎसा कहने पर तीनों देवों के अंशों को मिलाकर एक विशिष्ट(Special) बालक का जन्म होता है जिसके तीन सिर और छ: भुजाएँ होती हैं. यही बालक बाद में बड़े होकर दत्तात्रेय ऋषि कहलाते हैं. अब बालक के मिलने के बाद अनुसूइया देवी अपने पति की चरणोदक से तीनों देवों को फिर से बड़ा कर देती हैं.

दत्तात्रेय ब्रह्मा, विष्णु, महेश त्रिदेवों के संयुक्त अंश माने गए हैं इसलिए इस व्रत को भी मोक्ष देने वाला माना गया है.

 

उत्पन्ना एकादशी – Utpanna Ekadashi

उत्पन्ना एकादशी का यह व्रत मार्गशीर्ष माह की कृष्ण पक्ष की एकादशी को रखा जाता है. इस दिन भगवान कृष्ण की पूजा की जाती है. इस एकादशी का व्रत रखने वाले को दशमी की शाम से ही भोजन वर्जित होता है. एक दिन पहले ही दशमी की रात में व्रती को भोजन नहीं करना चाहिए. एकादशी के दिन ब्रह्मवेला में भगवान कृष्ण की पुष्प, जल, धूप तथा अक्षत से पूजा की जाती है. इस व्रत में भगवान को केवल फलों का ही भोग लगाया जाता है.   

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उत्पन्ना एकादशी की कथा – Story Of Utpanna Ekadashi

सतयुग काल में एक बार मुर नाम के दैत्य ने इन्द्र को पराजित कर देवताओं को उनके लोक से निकाल स्वयं अधिकार कर लिया. इन्द्र सहित सारे देवता भगवान शंकर की शरण में पहुंचते हैं. भगवान शंकर उन्हें विष्णु जी के पास भेज देते हैं. विष्णु जी देवताओं को तो मार देते हैं लेकिन मुर दैत्य भाग जाता है.

विष्णु जी मुर को भागता देख लड़ना छोड़ देते हैं और बदिकाश्रम की गुफा में आराम करने लगते हैं. मुर ने उस गुफा में पहुंचकर विष्णु जी को मारना चाहा लेकिन विष्णु जी तत्काल अपने शरीर से एक कन्या को जन्म देते हैं और उसे आर्शीवाद देते हैं कि तुम संसार में माया जाल में उलझे तथा मोह के कारण मुझसे विमुख प्राणियों को मुझ तक लाने में सक्षम हो जाओगी. तुम्हारी आराधना करने वाले प्राणी आजीवन सुख से रहेगें.

 

मोक्षदा एकादशी – Mokshada Ekadashi

मार्गशीर्ष अथवा मंगसिर माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को मोक्षदा एकादशी कहा जाता है. इस दिन दामोदर  भगवान की पूजा की जाती है और पूजा में दामोदर भगवान को धूप, दीप, नैवेद्य आदि अर्पित किया जाता है. दामोदर भगवान को श्रद्धा-भक्ति से याद कर उनका कीर्तन व जागरण करना चाहिए और उनसे प्रार्थना करनी चाहिए –

गोविन्द मेरी यह प्रार्थना है, भूलूँ न मैं नाम कभी तुम्हारा,

निष्काम होके दिन रात गाऊँ, गोविन्द दामोदर माधवेति ।।

गोविन्द दामोदर माधवेति, हे कृष्ण! हे यादव! हे सखेति ।।

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मोक्षदा एकादशी व्रत कथा – Story Of Mokshada Ekadashi

प्राचीन समय में गोकुल नगर में एक वैखानस नाम का राजा था जो बड़ा धर्मात्मा व भगवान का भक्त था. एक रात्रि स्वप्न में उसने अपने पिता को नरक भोगते हुए देखा. प्रात: काल उठते ही राजा ने अपने वेदपाठी ब्राह्मणों से इसका कारण पूछा कि मेरे पिता का उद्धार कैसे होगा? ब्राह्मण बोले कि यहाँ पास में ही पर्वत ऋषि का आश्रम है, आप उनकी शरण में जाएँ जिससे आपके पिता का शीघ्र ही उद्धार होगा. राजा पर्वत ऋषि के आश्रम जाता है और उन्हें दण्डवत प्रणाम करने के बाद कहता है कि मेरे पिता नरक में दण्ड भोग रहे हैं कृपया उनकी मुक्ति का मार्ग मुझे बताएँ कि कैसे उनका उद्धार होगा?

पर्वत मुनि ने राजा से कहा कि धर्म-कर्म सब देरी से फल देने वाले हैं और यदि शीघ्र फल पाना है तब शंकर जी इसके लिए प्रसिद्ध हैं लेकिन उन्हें भी इतनी शीघ्रता से प्रसन्न नहीं किया जा सकता है. यह काम इतना आसान भी नहीं है और जब तक वह प्रसन्न होगें तब तक तुम्हारे पिता उन यमदूतों से और कष्ट पाते रहेगें. तभी पर्वत ऋषि कहते हैं कि एक उपाय है जो सरल व सुगम है और शीघ्र फल देने वाला भी है.

ऋषि कहते हैं कि मोक्षदा एकादशी का व्रत परिवार सहित विधिपूर्वक करके पिता को संकल्प कर दो, इससे निश्चित रुप से तुम्हारे पिता की मुक्ति होगी. राजा परिवार सहित मोक्षदा एकादशी का व्रत करता है और उसके फल को अपने पिता को अर्पित कर देता है. इस व्रत के प्रभाव से राजा के पिता स्वर्ग लोक को चले जाते हैं और अपने पुत्र से भी कहते हैं कि मैं परमधाम को जा रहा हूँ.

मोक्षदा एकादशी का जो भी मनुष्य श्रद्धा भाव से माहात्म्य भी सुनता है उसे दस यज्ञों के समान फल मिलता है.

 

गीता जयन्ती – Geeta Jayanti

गीता जी का जन्म मंगसिर सुदी एकादशी को हुआ था इसलिए इस जयन्ती पर गीता जी की पूजा सारी सामग्री सहित करनी चाहिए. पूजा कर आरती करके बाद में भोग लगाकर उसे प्रसाद रुप में सभी को बाँटना चाहिए. इस जयन्ती पर गीता का पाठ भी करना चाहिए.

 

मार्गशीर्ष में पूर्णिमा व्रत – Poornima Fast In Margashirsha Month

सत्यनारायण जी

इस व्रत को मार्गशीर्ष माह की पूर्णिमा को रखा जाता है. इस दिन भगवान नारायण की पूजा का विधान माना गया है. सुबह सवेरे उठकर स्नान आदि से निवृत होकर सफेद कपड़े पहनकर फिर आचमन करें. व्रत रखने वाले को “ओम नारायण” कहकर आह्वान करना चाहिए. उसके बाद भगवान को आसन, गंध, पुष्प आदि भगवान को अर्पित करने चाहिए. भगवान के समक्ष चौकोर वेदी बनाते हैं और हवन करने के लिए अग्नि स्थापित की जाती है. हवन में घी, बूरा आदि की आहुति दी जाती है. हवन समाप्त होने पर भगवान का पूजन कर अपना व्रत उन्हें समर्पित करना चाहिए.

संध्या काल के बाद जब भी चन्द्रमा निकलता है उसे प्रणाम कर सफेद फूल, चावल, चंदन सभी जल में डालकर अर्ध्य देना चाहिए. अर्ध्य देते हुए चन्द्रमा से प्रार्थना करनी चाहिए – हे रोहिणीपते ! आपका जन्म अत्रि कुल में हुआ है और आप क्षीरसागर से प्रकट हुए हैं. आप कृपा कर मेरे दिए अर्ध्य को स्वीकार करें. अर्ध्य देने के बाद फिर से हाथ जोड़कर चन्द्रमा की ओर मुख करके कहें –

“हे भगवान ! आप श्वेत किरणों से सुशोभित होते हैं. आपको नमस्कार है, आप द्विजों के राजा है आपको प्रणाम है. आप रोहिणी पति हैं, आपको प्रणाम है, आप लक्ष्मी के भाई हैं, आपको प्रणाम है”. इस व्रत को करने वाले को रात्रि में नारायण भगवान के पास ही सोना चाहिए और अगले दिन सुबह के समय ब्राह्मणों को भोजन कराकर उन्हें दान, दक्षिणा आदि देकर विदा करें.  

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