कार्तिक माह माहात्म्य – पच्चीसवाँ अध्याय

सुना प्रश्न ऋषियों का और बोले सूतजी ज्ञानी। पच्चीसवें अध्याय में सुनो, श्री हरि की वाणी।। तीर्थ में दान और

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कार्तिक माह माहात्म्य – चौबीसवाँ अध्याय

लिखवाओ से निज दया से, सुन्दर भाव बताकर। कार्तिक मास चौबीसवाँ अध्याय सुनो सुधाकर।। राजा पृथु बोले – हे मुनिश्रेष्ठ!

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कार्तिक माह माहात्म्य – तेईसवाँ अध्याय

तेईसवाँ अध्याय वर्णन आँवला तुलसी जान। पढ़ने-सुनने से ‘कमल’ हो जाता कल्यान।। नारद जी बोले – हे राजन! यही कारण

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कार्तिक माह माहात्म्य – बाईसवाँ अध्याय

बाईसवें अध्याय की, जब लिखने लगा हूँ बात। श्री प्रभु प्रेरणा प्राप्त कर, कलम आ गई हाथ।। राजा पृथु ने

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कार्तिक माह महात्म्य – इक्कीसवाँ अध्याय

लिखने लगा हूँ श्रीहरि के, चरणों में शीश नवाय। कार्तिक माहात्म का बने, यह इक्कीसवाँ अध्याय।। अब ब्रह्मा आदि देवता

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कार्तिक माह माहात्म्य – बीसवाँ अध्याय

माँ शारदा की प्रेरणा, स्वयं सहाय। कार्तिक माहात्म का लिखूं, यह बीसवाँ अध्याय।। अब राजा पृथु ने पूछा – हे

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कार्तिक माह माहात्म्य – उन्नीसवाँ अध्याय

श्री विष्णु मम् हृदय में, प्रेरणा करने वाले नाथ। लिखूँ माहात्म कार्तिक, राखो सिर पर हाथ।। राजा पृथु ने पूछा

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कार्तिक माह माहात्म्य – अठारहवां अध्याय

लिखता हूँ मॉ पुराण की, सीधी सच्ची बात । अठारहवां अध्याय कार्तिक, मुक्ति का वरदात।। अब रौद्र रूप महाप्रभु शंकर

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कार्तिक माह माहात्म्य – सत्रहवां अध्याय

भक्ति से भरे भाव हे हरि मेरे मन उपजाओ। सत्रहवां अध्याय कार्तिक, कृपा दृष्टि कर जाओ।। उस समय शिवजी के

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