माघ माहात्म्य – आठवाँ अध्याय
यमदूत कहने लगा कि तुमने बड़ी सुंदर वार्ता पूछी है. यद्यपि मैं पराधीन हूँ फिर भी तुम्हारे स्नेहवश अपनी बुद्धि
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यमदूत कहने लगा कि तुमने बड़ी सुंदर वार्ता पूछी है. यद्यपि मैं पराधीन हूँ फिर भी तुम्हारे स्नेहवश अपनी बुद्धि
चित्रगुप्त ने उन दोनों के कर्मों की आलोचना करके दूतों से कहा कि बड़े भाई कुंडल को घोर नरक में
पूर्व समय में सतयुग के उत्तम निषेध नामक नगर में हेमकुंडल नाम वाला कुबेर के सदृश धनी वैश्य रहता था.
दत्तात्रेय जी कहते हैं कि हे राजन! एक प्राचीन इतिहास कहता हूँ. भृगुवंश में ऋषिका नाम की एक ब्राह्मणी थी
श्री वशिष्ठजी कहने लगे कि हे राजन! अब मैं माघ के उस माहात्म्य को कहता हूँ जो कार्तवीर्य के पूछने
तब राजा दिलीप कहने लगे कि महाराज यह पर्वत कितना ऊँचा और कितना लंबा-चौड़ा है? तब वशिष्ठ जी कहने लगे