तन्त्रोक्तं रात्रिसूक्तम्
{योगनिद्रास्तुति:} ऊँ विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीम्। निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजस: प्रभु:।।1।। अर्थ – जो इस विश्व की अधीश्वरी, जगत को धारण
Astrology, Mantra and Dharma
{योगनिद्रास्तुति:} ऊँ विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीम्। निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजस: प्रभु:।।1।। अर्थ – जो इस विश्व की अधीश्वरी, जगत को धारण
वशिष्ठजी कहने लगे कि हे राजा दिलीप! बहुत से जन-समूह सहित अच्छोद सरोवर में स्नान करके सुखपूर्वक मोक्ष को प्राप्त
प्रेत कहने लगा कि हे पथिक! मैं इस समय तुम्हारे पास जो यह गंगा जल हैं, उसे माँगता हूँ क्योंकि
पथिक कहने लगा कि हे प्रेत! तुमने सारस के वचन किस प्रकार और क्या सुने थे. सो कृपा करके कहिए.
पिशाच कहने लगा कि हे मुनि! केरल देश का ब्राह्मण किस प्रकार मुक्त हुआ यह कथा कृपा करके विस्तारपूर्वक कहिए.
लोमश जी कहने लगे कि वह राजा पहले तो तामिश्र नामी नरक में गया फिर अंध तामिश्र नरक में जहाँ