बृहत् पराशर होरा शास्त्र – अथ ज्येष्ठादिगण्डशान्त्यध्याय 

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बृहत् पराशर होरा शास्त्र के 97वें अध्याय में ज्येष्ठादि गण्ड या गण्डान्त में जन्म लेने पर जातक पर क्या कुप्रभाव होगा तथा उनका निवारण कैसे किया जा सकता है, इनका वर्णन किया गया है। आइए जानें :- 

 

श्लोक 1,2 का अर्थ 

पराशर जी बोले – ज्येष्ठा गण्ड या गण्डान्त में उत्पन्न होने पर माता-पिता व स्वयं का नाश होता है। अतः सब दोषों के निवारणार्थ शान्ति विधान कहता हूँ। सभी गण्ड नक्षत्रों में मूल शान्ति की तरह ही मण्डपादि बनाना चाहिए। ज्येष्ठा में इंद्र प्रधान देवता व अग्नि अधिदेवता हैं। राक्षस को प्रत्यधिदेवता समझें। इस प्रकार तीनों देवों का मूर्त्ति निर्माण करके पूजन करना चाहिए।  

श्लोक 3,4,5,6,7,8,9 का अर्थ 

इंद्र का स्वरुप वज्र व अंकुश धारण किए हुए, ऐरावत पर सवार, सुन्दर रूप में मूर्त्ति बनायें। सामर्थ्यानुसार सुवर्ण की मूर्त्ति बनाएँ। ‘इन्द्रायेन्दोमरुत्वते’ मंत्र से गन्धाक्षत पुष्पादि व भोज्य पदार्थों से लोकपाल समेत इन्द्रादि की पूजा करें। वारुण मंत्रों से सर्वत्र कलश पूजन करें। पहले ‘त्वं नो अग्ने’ पुनः ‘त्वं नो अग्ने’ मंत्र, पुनः ‘समुद्रज्येष्ठा:’ पुनः ‘इयं मे गंगे’ मन्त्रों का पाठ कर कलशों की प्रतिष्ठा करें। दो-दो वस्त्र चढ़ाएं। 

बाद में इंद्र सूक्त, रुद्रीय पाठ, मृत्युंजय मंत्र का पाठ व संकल्पपूर्वक हवन करें। पश्चात पूर्वोक्त मन्त्रों व वारुण मन्त्रों से अभिषेक करना चाहिए। इन मन्त्रों का उल्लेख पहले कर चुके हैं। इंद्र सूक्तादि ऋग्वेदोक्त लें। अथवा इंद्र का प्रसिद्द मंत्र पीछे नक्षत्र देवता मंत्र प्रसंग में कहा गया है, उसी का प्रयोग करें। पूर्वोक्त पूजन मंत्र इस प्रकार है –  

इन्द्रायेन्दो मरुत्वते पवस्य मधुमत्तम:। ऋतस्य योनिमासदम।  

 

श्लोक 10,11,12,13 का अर्थ 

अभिषेक के बाद यजमान सफ़ेद वस्त्र पहनकर घृतपात्र दान करें। पुनः देवताओं का उत्तर पूजन करें। ‘रूपं रूपं’ इति मंत्र से ‘चित्र देवानाम’ मंत्र से, ‘तच्चक्षुर्देविहितां’ मन्त्रों का उच्चारण करें। देवता को विशेषार्घ्य समर्पण के समय यह श्लोक पढ़ें :- 

‘नमस्ते सुरनाथाय नमस्तुभ्यं शचीपते। 

गृहाणार्ध्य मया दत्तं गण्डदोषोपशान्तये।।

दानेनानेन देवेश गण्डदोषविनाशय।।’

उसके बाद सामर्थ्यानुसार दानकार्य तथा ब्राह्मण भोजन कराने से आयु की वृद्धि व गण्डदोष का नाश होता है। 

 

अन्य नक्षत्र शान्ति – श्लोक 14,15 

अन्य अश्लेषा, मघा, अश्विनी, रेवती आदि में भी मूल शान्ति की तरह कुम्भ स्थापन करके, संबंधित नक्षत्र स्वामी की प्रतिमा नक्षत्र से ही पूजन करके, हवन, अभिषेक, दान, ब्राह्मणभोजनादि विधि तत्तत नक्षत्र पति का नमोल्लेख करते हुए, मूल नक्षत्र की ही तरह करें।  

 

श्लोक 16,17,18 का अर्थ 

ज्येष्ठा नक्षत्रोत्पन्न कन्या जेठ को, चतुर्थ चरण में देवर को नष्ट करती है। अश्लेषा के 2,3 व 4 चरणों में व मूल के 1,2,3  चरणों में उत्पन्न लड़का व लड़की क्रमशः सास व ससुर को नष्ट करते हैं। अतः इनके विवाह के समय में भी कल्याण चाहने वाले व्यक्ति को इनकी शान्ति करानी चाहिए। शांति का विस्तार आर्थिक स्थिति के अनुसार निश्चित करें। यदि देवर, जेठ, सास, ससुर न हों तब विवाह के समय शान्ति आवश्यक नहीं है।  

 

सामर्थ्य न होने पर शान्ति – श्लोक 19,20,21 का अर्थ 

यदि सामर्थ्य न हो तो केवल गोदान से ही करें। गोदान समस्त भूमण्डल के दान से भी बढ़कर है। मूल, ज्येष्ठा, अश्लेषा व मघा के दोष निवारणार्थ तीन गोदान, रेवती व अश्विनी के दोषशमनार्थ दो गाय, अन्य गण्ड नक्षत्रों एवं दुर्योगों में केवल एक गाय का ही दान करें। गौ न होने पर गाय का मूल्य ही दें।