
बृहत् पराशर होरा शास्त्र के 83वें अध्याय में स्त्री जातकों के लिए फलादेश अलग से किया गया है। इस अध्याय के शुरू में मैत्रेय जी महर्षि पराशर से कुछ प्रश्न करते हैं।
मैत्रेय ने पूछा – श्लोक 1 – हे मुने ! आपने यहाँ तक जातक फल के अनेक प्रकार, रूप, विधि व पद्धितियाँ कहीं हैं लेकिन स्त्रियों की कुंडली में सबका उपयोग कैसे होगा ?
पराशर बोले – श्लोक 2 – हे मैत्रेय ! उस विषय में भी कहता हूँ। सामान्यतः पुरुष व स्त्री जातक के नियम समान ही हैं। अर्थात जो-जो योगायोग पुरुष जातक में कड़े हैं, वे ही स्त्री जातक में भी विचारणीय है। जो-जो बातें स्त्रियों में असंभव हों, वे बातें स्त्रियों के पति को प्राप्त होती है।
विशेष फलादेश के नियम – श्लोक 3, 4
विशेषतया स्त्रियों की कुंडली में ही देखे जाने वाले योग्य योग संक्षेप में कहता हूँ। स्त्रियों की कुंडली में लग्न से नारी का स्वास्थ्य व सौंदर्य, पंचम स्थान से संतानोत्पत्ति, सप्तम से पति का प्रेम व साथ अर्थात सुहाग व अष्टम स्थान से पति की आयु (वैधव्य) का विचार करें।
स्त्री में असंभव फल (प्रसंगवशात, राजयोग, तस्करपतित्व, व्यापारादि) उनके पतियों को प्राप्त होता है। यदि स्त्री स्वयं इन कार्यों में लिप्त हो तो उसी को फल मिलता है।
स्त्री का स्वरुप – श्लोक 5,6,7
1) लग्न व चन्द्रमा दोनों ही सम राशि में हों तो स्त्री लज्जा, नम्रता, विनय, स्नेह, दयादि स्त्रियोचित्त गुणों से युक्त तथा स्त्रियोचित्त आकृति वाली कोमल शरीर वाली होती है। अर्थात ऐसी स्त्री उत्तम होती है।
2) यदि सम राशिगत लग्न व चन्द्रमा को शुभ ग्रह देखते हों या योग करें तो सदैव स्वस्थ व सुन्दर बनी रहती हैं।
3) यदि लग्न व चन्द्रमा विषम राशिगत हों तो पुरुषोचित स्वरुप वाली, ऊँचा कद, दबंग व कठोर स्वभाव वाली होती है।
4) यदि विषम राशिगत लग्न चंद्र को पापग्रह देखें या योग करें तो दु:शील वाली अर्थात अप्रिय आचरण, समन्वय भाव से रहित तथा स्वयं प्रभु होती है। पापयुक्त रहने पर प्रायः स्त्रियोचित गुणों से रहित होती है।
5) यदि मिश्र ग्रहों (शुभाशुभ) से युक्त या दृष्ट लग्न चंद्र हों तो मिश्रित स्वभाव वाली होती है। लग्न व चन्द्रमा में से जो अधिक बलवान हो, उसी के अनुसार विशेष फल कहना चाहिए।
त्रिशांश से स्त्री फल – श्लोक 8
लग्न व चन्द्रमा में से जो बलवान हो, वह जिस ग्रह की राशि व त्रिशांश में हो, उसके आधार पर स्त्रियों का विशेष फल कहना चाहिए। यह फल बहुत सटीक बैठता है।
श्लोक 9,10,11,12 के अनुसार :-
9) लग्न या चन्द्रमा में से जो बलवान हो वह यदि मेष/वृश्चिक राशि में होकर मंगल के त्रिशांश में हो तो कुमारी अवस्था में ही पुरुष संसर्ग करने वाली होती है। शुक्र के त्रिशांश में हो तो विवाह के बाद चरित्र से शिथिल होती है। बुध का त्रिशांश हो तो मायाविनी, खप्पर करने वाली होती है। गुरु के त्रिशांश में हो तो सती साध्वी, शनि के त्रिशांश में हो तो दासी भाव से युक्त होती है।
10) बलवान लग्न या चन्द्रमा मिथुन, कन्या राशि में हो और मंगल के त्रिशांश में हो तो छल कपट से युक्त, शुक्र के त्रिशांश में हो तो बहुत अधिक कामुक स्वभाव वाली, बुध के त्रिशांश में हो तो अनेक गुणों से युक्त, शनि के त्रिशांश में हो तो आकार या प्रकृति (रजोदर्शन, संतानोत्पत्ति) से नपुंसक, गुरु के त्रिशांश में हो तो सती होती है।
11) बलि लग्न या चन्द्रमा वृष, तुला राशि में हों तथा मंगल के त्रिशांश में हो तो दुष्ट स्वभाव वाली, शुक्र के त्रिशांश में हो प्रसिद्द गुणों वाली, बुध के त्रिशांश में हो तो कलाओं में निपुण, गुरु के त्रिशांश में हो तो गुणवती तथा शनि के त्रिशांश में हो तो पुनर्विवाह करने वाली होती है।
12) कर्कराशिगत बलि लग्न या चंद्र हो और मंगल का त्रिशांश हो तो स्वतंत्रता चाहने वाली, शुक्र का त्रिशांश हो तो कुल को बदनाम करने वाली होती है।
श्लोक 13,14,15,16 के अनुसार
13) कर्क राशिगत लग्न या चन्द्रमा में बुध का त्रिशांश हो तो शिल्प कलाओं को जानने वाली, गुरु के त्रिशांश में बहुत गुणों से युक्त, शनि के त्रिशांश में पति घातिनी होती है।
14) सिंह लग्न या राशि में मंगल का त्रिशांश हो तो बहुत बोलने वाली, शुक्र के त्रिशांश में सती, बुध के त्रिशांश में पुरुषों के समान आचरण करने वाली, गुरु के त्रिशांश में रानी, शनि के त्रिशांश में कुल में भ्रष्ट, त्यक्त या उपेक्षित होती है।
15) धनु, मीन लग्न या राशि में मंगल का त्रिशांश हो तो अनेक गुणों वाली, शुक्र के त्रिशांश में दुश्चरित्रा, बुध के त्रिशांश में विशिष्ट ज्ञान वाली, गुरु के त्रिशांश में अनेक गुणों वाली, शनि के त्रिशांश में संभोगादि में कम रूचि रखने वाली होती है।
16) मकर, कुम्भ लग्न या राशि में मंगल का त्रिशांश हो तो दासी, शुक्र के त्रिशांश में बुद्धिमान, बुध के त्रिशांश में दुष्टा व दुराचार करने वाली, गुरु के त्रिशांश में पतिव्रता, शनि के त्रिशांश में नीच जनों में अनुराग रखने वाली होती है।
पति विचार
श्लोक 17,18,19 के अनुसार :-
17) स्त्री की कुंडली में सप्तम भाव में कोई ग्रह न हो तथा सप्तम भाव पर शुभ ग्रहों की दृष्टि भी न हो तो स्त्री का पति योग्य पुरुष नहीं होता अर्थात डरपोक, आलसी और निखट्टू होता है। कुंडली के सप्तम भाव में चर राशि हो तो पति प्रवासी होता है। सप्तम में बुध शनि हो तो पति नपुंसक होता है।
18) कुंडली के सप्तम भाव में सूर्य हो तो परित्यक्ता, तलाकशुदा होती है। सप्तमस्थ मंगल से कम अवस्था में ही विधवा, अशुभ ग्रहदृष्ट शनि हो तो विवाह के सुख से रहित, कुँवारी ही बूढ़ी हो जाती है।
19) सप्तम भाव में कई पाप ग्रह हों तो विधवा तथा कई शुभ ग्रह हों तो सौभाग्यशाली होती है। मिश्रित ग्रह हों तो पुनर्विवाह वाली होती है।
इन्हीं श्लोकों में प्रसिद्द मांगलिक योग छिपा हुआ है। स्त्री के सातवें, आठवें भाव पर अधिक पाप प्रभाव बहुत हानिकर होता है।
पर पुरुषगमन योग – श्लोक 20, 21
यदि शुक्र के नवांश में मंगल और मंगल के नवांश में शुक्र हो तो स्त्री पर-पुरुष गमन करती है। यदि इस योग के साथ सप्तम भाव में चन्द्रमा भी हो तो पति की सहमति से ही पर-पुरुष गमन करती है।
मकर, कुम्भ, वृष, तुला लग्न हो। लग्न में शुक्र व चन्द्रमा स्थित हों तथा उन्हें पाप ग्रह देखें या अन्य दुश्चरित्र योग बनते हों तो स्त्री व उसकी माता दोनों ही पर-पुरुष के साथ रमण करती हैं।
पति का स्वभाव – श्लोक 22,23,24,25
सप्तम भाव में मंगल की राशि या नवांश हो तो स्त्री का पति क्रोधी व परस्त्री का लोलुप होता है। बुध की राशि या नवांश हो तो विद्वान्, कलाओं में निपुण विद्वान् होता है। गुरु की राशि या नवांश हो तो सब गुणों से युक्त जितेन्द्रिय होता है। शुक्र की राशि नवांश हो तो सौभाग्यशाली, सुन्दर व स्त्री का प्यारा होता है। शनि की राशि या नवांश हो तो अवस्था में अधिक या प्रौढ़ दिखने वाला, मूर्ख होता है। सूर्य का नवांश हो तो बहुत कठोर, सूर्य की राशि हो तो बहुत परिश्रमी होता है। सप्तम में कर्क राशि या नवांश हो तो पति सुन्दर, प्यारा, कामी, कोमल स्वभाव वाला होता है। यदि मिश्रित राशि व नवांश हो तो मिश्रित फल कहें तथा राशि व नवांश के बलानुसार फल की प्रधानता कहें।
अष्टमस्थान विचार
श्लोक 26,27,28, 29 के अनुसार फल
स्त्री की कुंडली में अष्टम में सूर्य हो तो स्त्री दुःख व दरिद्रता से युक्त, शरीर में विकार वाली, खिन्न रहने वाली व गृहस्थ जीवन में असावधान रहती है। अष्टम में चन्द्रमा हो तो स्तन, आँखें व योनि में दोष या आकार प्रकार से हीनता वाली, पहनने-ओढ़ने के सुख में कमी वाली, रोगी व निन्दित होती है। अष्टम में मंगल हो तो कमजोर, रोगी, विधवा, कान्तिहीन व शोक प्राप्त करने वाली दुःखी होती है। अष्टम में बुध हो तो धर्महीन (गृहस्थ धर्म से रहित) भयभीत रहने वाली, स्वाभिमान व धन से रहित, गुणहीन व कलहप्रिय होती है।
श्लोक 30,31,32,33 के अनुसार फल
अष्टम में बृहस्पति हो तो कम संतान वाली, विकृत आचरण वाली, बड़े हाथ-पैरों वाली, पति से त्यक्त व अधिक खाने वाली होती है। अष्टम में शुक्र हो तो घमंडी व असावधान, धन से रहित, निर्दयस्वभाव, मलिन रहने वाली, कपटी होती है। अष्टम में शनि हो तो बुरे स्वभाव वाली, मैली-कुचैली रहने वाली, धोखेबाज, पतिसुख से वंचित होती है। अष्टम में राहु हो तो कुरूप, पति का प्यार न पाने वाली, कठोर स्वभाव वाली, रोगिणी व व्यभिचारिणी होती है।
वन्ध्या योग – श्लोक 34 का फल
लग्न में शुक्र चन्द्रमा हो तथा शनि मंगल से युक्त हो और पंचम भाव में पाप ग्रह की दृष्टि या योग हो तो स्त्री बाँझ होती है अर्थात संतानोत्पत्ति में असमर्थ रहती है।
स्त्री रोग योग – श्लोक 35 का फल
सप्तम भाव में मंगल या किसी पाप ग्रह का नवांश हो तथा सप्तम भाव पर शनि की दृष्टि हो तो स्त्री को योनि से संबंधित रोग होता है (जैसे रजोदोष, धातुक्षय, प्रदर,मासिक धर्म की अनियमितता आदि)। मंगल के नवांश से अधिक व अन्य पापग्रहों के नवांश से कम मात्रा में होता है।
सप्तम भाव में शुभ ग्रह का नवांश हो तो स्त्री पति की प्यारी व रोग से रहित होती है।
पिता के घर में सुख योग – श्लोक 36 का फल
बुध की राशि मिथुन या कन्या में लग्न में ही चन्द्रमा व शुक्र हो तो स्त्री को पिता के घर में ही सुख व आराम मिलते हैं। पति के घर में विशेष सुख नहीं मिलता है।
बहुसुख योग – श्लोक 37 का फल
लग्न में चंद्र, बुध व शुक्र हों तो स्त्री को बहुत सुख मिलता है जैसे – पति सुख, पुत्र का सुख, धन व ऐश्वर्य का सुख आदि मिलता है।
लग्न में यदि बृहस्पति अकेला या शुभ ग्रह से युक्त हो तो बहुत ऐश्वर्यशाली, धन व पुत्रों का सुख पाने वाली होती है।
संतान बाधा योग – श्लोक 38,39,40,41 का फल
38) लग्न से अष्टम भाव में कर्क या सिंह राशि में सूर्य व चन्द्रमा एक साथ हों तो स्त्री बाँझ होती है। इसी तरह अष्टम में मिथुन, कन्या या कर्क में चंद्र, बुध एक साथ हों तो स्त्री को केवल एक बार ही गर्भ धारण होता है।
39) 1,8,10,11 लग्न में चंद्र व शुक्र हों तथा उन्हें पाप ग्रह देखें तो स्त्री निश्चित रूप से बाँझ होती है।
40) सप्तम भाव में राहु व सूर्य तथा पंचम में पाप ग्रह हो अथवा अष्टम में शुक्र, गुरु, राहु हो तो स्त्री की संतान होकर नष्ट हो जाती है।
41) अष्टम स्थान में शुक्र, गुरु, मंगल हों या मंगल सप्तम में शनि से दृष्ट हो तो स्त्री को गर्भपात होते रहते हैं।
कुलनाशक योग – श्लोक 42 का फल
जिस स्त्री के जन्म समय में लग्न या चन्द्रमा पाप ग्रहों की कर्तरी में हो तो ऐसी स्त्री के पितृकुल व पतिकुल दोनों ही नष्ट हो जाते हैं। कदाचित भाई व पुत्र से रहित होती है।
विषकन्या योग – श्लोक 43, 44 का फल
अश्लेषा, कृत्तिका, शतभिषा नक्षत्र व रविवार, मंगलवार या शनिवार को भद्रा तिथि (द्वितीया, सप्तमी, द्वादशी) हो तो इस दिन उत्पन्न कन्या विष कन्या होती है।
जिस स्त्री के जन्म लग्न में एक पाप व एक शुभ ग्रह हो तथा दो पाप ग्रह शत्रु क्षेत्री या षष्ठ स्थान में हों तो वह विषकन्या कहलाती है।
विषकन्या योग का फल – श्लोक 45
विषयोग में उत्पन्न कन्या, संतान, सौभाग्य, शरीर सुख, धन, वस्त्र, आभूषणों से रहित व सदैव शोक का अनुभव करने वाली दुर्भाग्यशीला होती है।
विषयोग भंग – श्लोक 46 का फल
लग्न या चन्द्रमा से सप्तम में सप्तमेश या कोई शुभ ग्रह हो और सप्तमेश बलवान हो तो विषयोग का प्रभाव नष्ट हो जाता है।
पति सुख हीन योग – श्लोक 47 का फल
लग्न से 1,12,4,7,8 भाव में मंगल किसी भी शुभ ग्रह की दृष्टि या योग से रहित हो तो इस योग में उत्पन्न स्त्री को पति सुख में अन्य योगायोगों के बलाबल अनुसार कमी रहती है। यही प्रसिद्द मंगलीक योग है। प्रसिद्द योग में केवल मंगल की भाव स्थिति का विचार करते हैं जबकि पूर्वोक्त योगों के परिप्रेक्ष्य में 1,7,8 भावों में मंगल रहने से तथा शुभ दृग्योग हीन होने पर, सप्तमेश के निर्बल होने पर ही उत्कट अशुभ वैधव्यादि फल होते हैं।
(मंगलीक योग का यह नामकरण महर्षि पराशर द्वारा नहीं दिया गया है, ये नाम धीरे-धीरे बस प्रसिद्द हो गया है। श्लोक में भी केवल मंगल की ग्रह स्थिति बताई गई है कि इन विशेष भावों में उपर्लिखित फल मंगल द्वारा दिए जायेंगे।)
कुयोग होने पर विवाह निर्णय – श्लोक 48, 49 का फल
जिन योगों में पति सुख की कमी या हीनता कही गई है, उन्हीं योगों में उत्पन्न लड़के को स्त्री सुख में कमी होती है। अतः समान कुयोग वाले वर से ऐसी कन्या का विवाह करने पर अनिष्ट नहीं होता है। यह बात विषकन्या योगों में भी लागू है। ध्यान रहे लग्नगत मंगल के दोष का निवारण लग्नगत मंगल से ही विशेष होता है। 7,8 भावगत मंगलादि पापयोग का निराकरण 7, 8 गत पाप ग्रह से ही होगा।
समलैंगिक योग – श्लोक 50,51 का फल
शुक्र व शनि नवांश कुंडली में एक दूसरे की राशि में हों अथवा वृष, तुला लग्न में कुम्भ का नवांश हो तो स्त्री की कामाग्नि बहुत उत्कट होती है। उसे केवल पुरुष संयोग से ही संतुष्टि नहीं मिलती। ऐसी स्त्री अपनी सहेलियों या रहस्य सखियों के साथ पुरुषोचित रति अर्थात स्त्री ही स्त्री से रति क्रिया करती है।
वेदशास्त्रज्ञ स्त्री – श्लोक 52 का फल
समराशि लग्न में जन्म हो और मंगल, बुध, गुरु, शुक्र बलवान हों तो ऐसी स्त्री अनेक शास्त्रों में कुशल, वेदार्थ को जानने वाली विदुषी होती है।
संन्यास योग – श्लोक 53 का फल
सप्तम भाव में कोई पाप ग्रह व नवम में कोई भी ग्रह हो तो ऐसी स्त्री पाप ग्रह से पूर्व निर्दिष्ट (प्रवज्यायोगाध्याय) संन्यास धारण करती है।
पति से पहले मृत्यु योग – श्लोक 54, 55 का फल
अष्टम स्थान में शुभ ग्रह हों तथा उससे पाप ग्रह दृष्टि या योग न करें तो पति से पहले ही ऐसी स्त्री की मृत्यु हो जाती है।
अष्टम में शुभ व पाप ग्रह हों तथा दोनों बराबर बलवान हों तो पति-पत्नी की साथ-साथ या मामूली समय के अंतर से मृत्यु होती है। यह दुर्घटना या अपमृत्यु का योग नहीं है।
