
बृहत् पराशर होरा शास्त्र के इस 82वें अध्याय में महर्षि पराशर जी द्वारा उन योगों का वर्णन किया गया है जिससे संन्यास योग का पता चलता है कि व्यक्ति विशेष की कुंडली में कौन से योग विद्यमान हैं जिनकी वजह से उसने गृह त्याग कर संन्यास ले लिया।
पराशर जी बोले – हे मैत्रेय ! अब मैं प्रवज्या योगों (परिव्रजन या गृहत्याग या संन्यास योग) को कहता हूँ। ऐसा योग होने पर मनुष्य घर त्याग कर किसी सम्प्रदाय में दीक्षित हो जाता है।
यदि किसी एक राशि में 4,5 या 6 ग्रह निकटस्थ स्थित हों अर्थात अंशों में नगण्य अन्तर हो तथा वे बलवान हों तो प्रवज्या योग होता है। यदि प्रवज्या योग में सूर्य अधिक बली हो तो मनुष्य तपस्वी अर्थात अनुशासित जीवन वाला, व्रत नियम वाला, कन्दमूलादि खाने वाला एकांतवासी होता है।
चन्द्रमा बलवान हो तो कपाली, कपाल धारण करने वाला, श्मशान आदि में साधना करने वाला अघोरी होता है।
मंगल बली हो तो लाल कपड़ों वाला साधु होता है। बुध बलवान हो तो यती अर्थात योगी होता है। शुक्र बलवान हो तो चक्रादि मुद्रा धारण करने वाले सम्प्रदाय में दीक्षित होता है। शनि बली हो तो निर्ग्रन्थ अर्थात (नागा साधु या जैन साधु) दिगंबर होता है। कई ग्रह बलवान होने पर भी सर्वबली ग्रह से निर्णय करना चाहिए।
निर्बल सन्यास योग – यदि योगकारक ग्रह बलवान हों, लेकिन सूर्य के साथ अस्त हो गए हों तो मनुष्य पूर्वोक्त सम्प्रदायों में रूचि व श्रद्धा रखता है, वास्तव में दीक्षित सन्यासी नहीं होता है। इस योग में प्रव्रजित अर्थात गृहत्यागी हो सकता है।
यदि योगकारक ग्रह अस्त व बलहीन हो तथा सूर्य बलवान हो तो सूर्य के अनुसार तपस्वी होना सिद्ध होता है।
यदि जन्म राशीश अन्य ग्रहों से दृष्ट न हो तथा वह शनि को देखे तो जन्म राशीश व शनि में से जो बलवान हो, उसके अनुसार प्रवज्या होती है।
जन्मराशीश निर्बल हो तथा केवल शनि उसे देखे तो शनि के अनुसार निर्ग्रन्थ संयासादि होता है।
1) यदि चन्द्रमा, शनि के द्रेष्काण में या शनि, मंगल के नवांश में हो तो तथा चन्द्रमा पर शनि की दृष्टि हो तो शनि के अनुसार दिगम्बरादि सन्यासी होता है।
2) मंगलादि पांच तारा ग्रहों में जब समान राशि अंश हो तो युद्ध समझा जाता है। शुक्र उत्तर या दक्षिण में कहीं भी स्थित हो वह विजयी ही माना जाता है। शेष मंगल, बुध, गुरु, शनि उत्तरस्थ रहने पर विजयी होते हैं।
3) प्रवज्याकारक ग्रह यदि युद्ध में पराजित हो तो मनुष्य परिव्रज्या ग्रहण करके उसे बाद में छोड़ देता है अर्थात संन्यास तो लेता है लेकिन बाद में संन्यास छोड़ भी देता है।
मैत्रेय ने पूछा – हे महर्षे ! यदि प्रवज्या कारक ग्रहों में सबका बल समान हो तो किस ग्रह के अनुसार प्रवज्या कहनी चाहिए।
पराशर बोले – यदि बहुत ग्रह बलवान हों तो सब ग्रहों की प्रवज्या मनुष्य को प्राप्त होती है। जब जिस प्रवज्या योग कारक ग्रह की दशा आएगी, तब उसी ग्रह से संबंधित प्रवज्या होगी। दूसरे योगकारक की दशा आने पर पहले वाली प्रवज्या को छोड़कर, दूसरे ग्रह की प्रवज्या को मनुष्य प्राप्त करता है।
अन्य प्रवज्या योग
1) नवम स्थान में गुरु हो तथा शनि लग्न, चन्द्रमा व गुरु तीनों पर दृष्टि रखे तब प्रवज्या होती है। यदि इसी योग के साथ राजयोग भी पड़ जाएँ तो मनुष्य सन्यासी होकर तीर्थकृत अर्थात शास्त्रकार, सम्प्रदाय प्रवर्तक, युग प्रवर्तक मुनि या सन्यासी होता है।
2) नवम स्थान में शनि हो तथा शनि को कोई ग्रह न देखता हो तब राजयोग भी पड़ने पर व्यक्ति राजा के पद पर प्रतिष्ठित होकर बाद में संन्यास धारण करता है। यदि राजयोग न हो तो उक्त दोनों योगों में सन्यासी मात्र रहता है।
