महाभागवत – देवी पुराण – साठवाँ अध्याय 

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श्रीनारद जी बोले – देवदेव ! महेश्वर ! प्रभो ! जिस तरह से इंद्र को ब्रह्महत्या का पाप लगा, जिस तरह से वे महामति इंद्र तथा ब्रह्मा आदि देवता महाकाली के दर्शन की इच्छा से गए, जिस प्रकाश से वे ब्रह्मा आदि देवगण देवाधिदेव शिव की कृपा से सभी लोकों को पार करके उन भगवती के लोक में पहुंचे और वे भैरवों द्वारा रक्षित उनके पुर के द्वारों को पार कर अंतःपुर में गए तथा जिस तरह उन्होंने देवी को देखा एवं उन भगवती की जैसी मूर्ति का दर्शन किया; यह सब आप मुझे विस्तारपूर्वक बतलाइये।।1-4।।  

श्रीमहादेव जी बोले – पूर्वकाल में ब्रह्मा जी के द्वारा दिए गए वर से उत्पन्न महान असुर वृत्र सभी देवताओं को जीतकर स्वयं इंद्र हो गया। नारद ! महान बल तथा पराक्रम वाले उस वृत्रासुर ने चन्द्रमा, सूर्य, अग्नि, मरुद्गण, कुबेर तथा यम के अधिकारों को छीनकर तीनों लोकों पर एकाधिकार प्राप्त कर लिया था।।5-6।।  ब्रह्मा जी ने दधीचि की अस्थि से बनाये गए महाअस्त्र के द्वारा देवराज इंद्र के हाथ से उस दुरात्मा की मृत्यु निश्चित की थी। मुनिवर ! देवराज इंद्र ने बृहस्पति के निर्देशानुसार पद्मयोनि ब्रह्मा जी से प्रार्थना करके इस रहस्य को जाना। तत्पश्चात इंद्र मुनि दधीचि के पास स्वयं गए और लोकों की रक्षा के निमित्त भिक्षा के रूप में उनकी अस्थि की याचना की।।7-9।। 

मुने ! उन इंद्र ने दोनों हाथ जोड़कर मुनिश्रेष्ठ महात्मा दधीचि को प्रणाम किया और दधीचि ने कहा – ‘आपका स्वागत है’ ।।10।। तत्पश्चात मुनि दधीचि भी देवराज इंद्र को आया हुआ जानकर अपने स्थान से उठ खड़े हुए और उन्होंने आसन देकर कुशल आदि पूछा तथा कहा – देवराज ! आपका यहाँ आगमन किसलिए हुआ, उसे मुझे बतलाइये।।1½।। दधीचि मुनि के ऐसा कहने पर देवराज इंद्र ने उनसे कहा – मुने ! हम लोगों का जैसा समाचार है, वह क्या आपको ज्ञात नहीं है?।।12½।।      

ब्रह्मा जी के द्वारा दिए गए वरदान से उत्पन्न वृत्र नामक महान असुर हम लोकपालों को जीतकर स्वयं त्रिलोकेश हो गया है। मुनिश्रेष्ठ ! हम सभी देवतागण उसके भय से स्वर्ग छोड़कर मनुष्यों की भाँति इस मृत्युलोक में निवास कर रहे हैं।।13-14½।। मैं न तो यज्ञभाग प्राप्त कर पा रहा हूँ और न कोई हमारी पूजा ही कर रहे हैं। इस प्रकार की दुर्गति को प्राप्त हुआ मैं आपसे और कुछ क्या कहूँ। मुने ! आप ही कृपा करके यदि देवताओं का उद्धार करें, तभी दुःख:रूपी सागर में निमग्न हम देवताओं का उद्धार हो सकेगा, आप ही हमारे उद्धारक हैं।।15-16।।  

दधीचि बोले – जो हो चुका है और जो आगे होगा, वह सब मैं अपने विशिष्ट ज्ञानरूपी नेत्रों से जान रहा हूँ। इंद्र ! मुझे क्या करना है, वह मुझे बताइये।।17।।  

इंद्र बोले – ब्रह्मन ! मैं क्या कहूँ ! मुझे बड़ा भय लग रहा है। महामुने ! मैं जिसके लिए आपके पास आया हूँ, उसे सुनिए।।18।। ब्रह्मा जी ने उस वृत्रासुर की मृत्यु किसी प्रकार से निश्चित नहीं की है, अपितु आपकी अस्थियों से बनाये गए अस्त्रों से ही उसकी मृत्यु संभव है। प्रभो ! इसीलिए मैं आपके पास आया हूँ। मुनिश्रेष्ठ ! जिसके लिए मेरा आगमन हुआ है। वह सब मैंने आपसे बता दिया। अब जैसा उचित हो, वैसा आप विचार करें।।19-20।।  

श्रीमहादेव जी बोले – देवराज इंद्र के ऐसा कहने पर मुनीश्वर दधीचि सोचने लगे कि क्या मैं इन इंद्र को निराश करके लौटा दूँ अथवा अपनी देह का त्याग करूँ। इस प्रकार कुछ समय द्विविधा में पड़े हुए महामति दधीचि ने अंत में देह त्याग का निश्चय कर देवराज इंद्र से कहा – ।।21-22।। 

दधीचि बोले – देवराज ! यदि राज्य से च्युत देवतागण मेरी अस्थियों के द्वारा महान असुरराज वृत्र से छुटकारा पाते हैं तो मैं अवश्य ही योगबल से अपना यह शरीर त्याग दूँगा।।23।। उसी प्राणी का शरीर धन्य है, जिसका उपभोग दूसरे के सुख के लिए हो। यह शरीर तो अनित्य है और धर्म ही नित्य है, अतः मैं इस शरीर का त्याग कर रहा हूँ।।24।।   

मुने ! ऐसा कहकर उन दधीचि मुनि ने योग के द्वारा अपने तेज से अत्यंत देदीप्यमान अपने शरीर को देवराज इंद्र के सामने ही त्यागकर मोक्ष प्राप्त किया।।25।।  

यह देखकर देवराज इंद्र बार-बार दीर्घ श्वास लेते हुए ‘लौकिक विषयों की कामना करने वाले हम देवताओं को धिक्कार है’ इस प्रकार अपनी निंदा करके विषादपूर्ण मन से कुछ समय तक वही खड़े रहे।।26।।मुने ! तत्पश्चात उनकी अस्थियों को आदरपूर्वक ग्रहण कर उन देवराज इंद्र ने देवगणों से मंत्रणा करके उस महान असुरराज वृत्रासुर के वध के लिए उन अस्थियों से अनेक प्रकार के अस्त्र बनाए।।27।।  

तदनन्तर सफल पराक्रम वाले, प्रचंड धुनर्धर, देवगणों के नायक इंद्र देवताओं के लिए दुर्जेय उस महान असुर वृत्र के पास देवताओं के साथ गए और उन्होंने उस शत्रु को महायुद्ध के लिए ललकारा।।28।। मुने ! तत्पश्चात महान युद्ध छिड़ जाने पर देवेंद्र ने उन अस्थियों से निर्मित बाणों, वज्र तथा अति प्रज्वलित चक्र से उस दैत्यपति वृत्रासुर को मार डाला।  29 नारद ! इस प्रकार इंद्र को अपने द्वारा की गई उस ब्रह्महत्या का पाप लगा।  जिस प्रकार उन इंद्र ने जगत की एकमात्र जननी महाकाली का दर्शन किया, अब मैं उस प्रसंग का वर्णन कर रहा हूँ, आप ध्यान से सुनिए।।30।। 

।। इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अंतर्गत ‘दधीचि प्राण त्याग में देवराज-ब्रह्महत्या वर्णन’ नामक साठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ।।