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सुरभिस्तोत्रम्

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महेन्द्र उवाच

नमो देव्यै महादेव्यै सुरभ्यै च नमो नम:।

गवां बीजस्वरूपायै नमस्ते जगदम्बिके।।1।।

नमो राधाप्रियायै च पद्मांशायै नमो नम:।

नम: कृष्णप्रियायै च गवां मात्रे नमो नम:।।2।।

अर्थ – देवी एवं महादेवी सुरभि को बार-बार नमस्कार है। जगदम्बिके! तुम गौओं की बीजस्वरुपा हो, तुम्हें नमस्कार है। तुम श्रीराधा को प्रिय हो, तुम्हें नमस्कार है। तुम लक्ष्मी की अंशभूता हो, तुम्हें बार-बार नमस्कार है। श्रीकृष्णप्रिया को नमस्कार है। गौओं की माता को बार-बार नमस्कार है।

 

कल्पवृक्षस्वरूपायै सर्वेषां सततं परम् ।

श्रीदायै धनदायै च बुद्धिदायै नमो नम:।।3।।

शुभदायै प्रसन्नायै गोप्रदायै नमो नम:।

यशोदायै सौख्यदायै धर्मज्ञायै नमो नम:।।4।।

अर्थ – जो सबके लिए कल्पवृक्षस्वरूपा तथा श्री, धन और बुद्धि प्रदान करने वाली हैं, उन भगवती सुरभि को बार-बार नमस्कार है। शुभदा, प्रसन्ना और गोप्रदायिनी सुरभि देवी को बार-बार नमस्कार है। यश और सौख्य प्रदान करने वाली धर्मज्ञा देवी को बार-बार नमस्कार है।

 

स्तोत्रस्मरणमात्रेण तुष्टा हृष्टा जगत्प्रसू:।

आविर्बभूवतत्रैव ब्रह्मलोके सनातनी।।5।।

महेन्द्राय वरं दत्त्वा वांछितं सर्वदुर्लभम् ।

जगाम सा च गोलोकं ययुर्देवादयो गृहम् ।।6।।

अर्थ – इस प्रकार स्तुति सुनते ही सनातनी जगज्जननी भगवती सुरभि संतुष्ट और प्रसन्न हो उस ब्रह्मलोक में ही प्रकट हो गईं। देवराज इन्द्र को परम दुर्लभ मनोवांछित वर देकर वे पुन: गोलोक को चली गईं, देवता भी अपने-अपने स्थानों को चले गए।

 

बभूव विश्वं सहसा दुग्धपूर्णं च नारद।

दुग्धाद्घृतं ततो यज्ञस्तत:प्रीति: सुरस्य च।।7।।

अर्थ – नारद! फिर तो सारा विश्व सहसा दूध से परिपूर्ण हो गया। दूध से घृत बना और घृत से यज्ञ संपन्न होने लगे तथा उनसे देवता संतुष्ट हुए।

 

इदं स्तोत्रं महापुण्यं भक्तियुक्तश्च य: पठेत् ।

स गोमान् धनवांश्चैव कीर्तिवान् पुण्यवान् भवेत् ।।8।।

अर्थ – जो मानव इस महान पवित्र स्तोत्र का भक्तिपूर्वक पाठ करेगा, वह गोधन से संपन्न, प्रचुर संपत्ति वाला, परम यशस्वी और पुत्रवान हो जाएगा।

 

सुस्नात: सर्वतीर्थेषु सर्वयज्ञेषु दीक्षित:।

इह लोके सुखं भुक्त्वा यात्यन्ते कृष्णमन्दिरम् ।।9।।

अर्थ – उसे संपूर्ण तीर्थों में स्नान करने तथा अखिल यज्ञों में दीक्षित होने का फल सुलभ होगा। ऎसा पुरुष इस लोक में सुख भोगकर अन्त में भगवान श्रीकृष्ण के धाम में चला जाता है।

 

सुचिरं निवसेत्तत्र कुरुते कृष्णसेवनम् ।

न पुनर्भवनं तस्य ब्रह्मपुत्र भवे भवेत् ।।10।।

।।इति श्रीब्रह्मवैवर्तमहापुराणे प्रकृतिखण्डे महेन्द्रकृतं सुरभिस्तोत्रं सम्पूर्णम्।।

अर्थ – चिरकाल तक वहाँ रहकर भगवान की सेवा करता रहता है। हे ब्रह्मपुत्र नारद ! उसे पुन: इस संसार में नहीं आना पड़ता है।

इस प्रकार श्रीब्रह्मवैवर्तमहापुराण के प्रकृति खण्ड में महेन्द्रकृत सुरभिस्तोत्र पूरा हुआ।

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