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महाभागवत – देवी पुराण – उन्नासीवाँ अध्याय 

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श्रीनारदजी बोले – परमेश्वर ! महान पातकों का नाश करने वाले योनिपीठ तीर्थ का माहात्म्य आप के मुखकमल से मैंने सुना। ईश्वर ! आपने जो सर्वश्रेष्ठ, महापुण्यदायक बिल्वपत्र का माहात्म्य संक्षेप में वहाँ पर बताया; वह भी मैंने सुना। अब मैं तुलसीपत्र का परम अद्भुत माहात्म्य सुनना चाहता हूँ तथा महादेव ! संक्षेप में रुद्राक्ष और भगवान् शिव की पूजा के विषय में भी संक्षेप में मुझे उपदेश दें।।1-3।।  

श्रीमहादेव जी बोले – महामते ! तुलसी का माहात्म्य संक्षेप में सुनिए, जिसे सुनकर मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है।।4।। सभी लोगों के रक्षक, विश्वात्मा, विश्वपालक भगवान् पुरुषोत्तम ही तुलसीवृक्ष के रूप में प्रतिष्ठित हैं।।5।। दर्शन, स्पर्श, नाम-संकीर्तन, धारण तथा प्रदान करने से भी तुलसी मनुष्यों के सभी पापों का सर्वदा नाश करती है।।6।। प्रातः उठकर स्नान करके जो व्यक्ति तुलसीवृक्ष का दर्शन करता है, उसे सभी तीर्थों के संसर्ग का फल निःसंदेह प्राप्त हो जाता है।।7।। श्रीपुरुषोत्तम क्षेत्र में भगवान् गदाधर के दर्शन करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वही तुलसी वृक्ष के दर्शन करने से प्राप्त होता है। मुने ! वही दिन शुभ कहा गया है, जिस दिन तुलसी वृक्ष का दर्शन होता है और तुलसी वृक्ष का दर्शन करने वाले व्यक्ति को कहीं से भी विपत्ति नहीं आती।।9।।  

मुनिश्रेष्ठ ! जन्म-जन्मान्तर का किया अत्यन्त निन्दित पाप भी तुलसी वृक्ष के दर्शन मात्र से नष्ट हो जाता है।।10।।  पवित्र अथवा अपवित्र स्थिति में भी जो व्यक्ति तुलसीपत्र का स्पर्श कर लेता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर उसी क्षण शुद्ध हो जाता है तथा अन्त में देवों के लिए भी दुर्लभ विष्णुपद को प्राप्त करता है। तुलसी का स्पर्श करना ही मुक्ति है और वही परम व्रत है।।11-12।।  

मुनिश्रेष्ठ ! जिस व्यक्ति ने तुलसी वृक्ष की प्रदक्षिणा कर ली, उसने साक्षात् भगवान् विष्णु की प्रदक्षिणा कर ली, इसमें कोई संदेह नहीं है।।13।। जो मानवश्रेष्ठ भक्तिपूर्वक तुलसी को प्रणाम करता है, वह भगवान् विष्णु के सायुज्य को प्राप्त करता है और पुनः पृथ्वी पर उसका जन्म नहीं होता।।14।। मुनिश्रेष्ठ ! जहाँ तुलसी-कानन है, वहाँ लक्ष्मी और सरस्वती के साथ साक्षात् भगवान् जनार्दन प्रसन्नतापूर्वक विराजमान रहते हैं।।15।। जहाँ सर्वदेवमय जगन्नाथ भगवान् विष्णु रहते हैं, वहीँ रुद्राक्ष के सहित मैं तथा पितामह ब्रह्मा सावित्री के साथ रहते हैं। मुने ! इसलिए वह उत्तम स्थान देवताओं के लिए भी दुर्लभ है, उस तुलसी के श्रेष्ठ स्थान में जो जाता है, वह भगवान् विष्णु के वैकुण्ठधाम को प्राप्त करता है। जो व्यक्ति स्नान करके उस पापनाशक क्षेत्र का मार्जन करता है, वह भी पाप से मुक्त होकर स्वर्गलोक में जाता है।।16-18।।  

मुनिश्रेष्ठ ! जो व्यक्ति तुलसी वृक्ष के मूल की मिट्टी से ललाट, कण्ठ, दोनों कान, दोनों हाथ, स्तन, मस्तक, पीठ, दोनों बगल तथा नाभि पर उत्तम तिलक लगाता है, उस पुण्यात्मा को श्रेष्ठ वैष्णव समझना चाहिए।।19-20।। 

जो व्यक्ति तुलसी मञ्जरी से भगवान् विष्णु का पूजन करता है, उसे भी सभी पापों से रहित श्रेष्ठ वैष्णव कहा गया है।।21।।  

जो व्यक्ति वैशाख, कार्तिक तथा माघ मास में प्रातःकाल स्नान कर परमात्मा सुरेश्वर भगवान् विष्णु को विधि-विधान से तुलसी पत्र अर्पित करता है, उसका पुण्यफल अनन्त कहा गया है।।22½।। दस हजार गाय दान करने तथा सैकड़ों वाजपेय यज्ञ करने से जो फल प्राप्त होता है, वही फल कार्तिक मास में तुलसी के पत्तों तथा तुलसी-मञ्जरी से भगवान् विष्णु का पूजन करने से प्राप्त होता है।।23-24।। जो तुलसी-कानन में भगवान् विष्णु की पूजा करता है, वह महाक्षेत्र (भगवती कामाख्या के शक्तिपीठ) में की गयी पूजा का फल प्राप्त करता है।। 25।। बुद्धिमान व्यक्ति को तुलसीपत्र रहित कोई पुण्यकार्य नहीं करना चाहिए। यदि कोई करता है तो उस कर्म का सम्पूर्ण फल उसे नहीं प्राप्त होता। तुलसीपत्र से रहित संध्या-वन्दन कालातीत संध्या की तरह निष्फल हो जाता है।।26-27।। तुलसी-कानन के मध्य में तृणों अथवा वल्कलवृन्दों से भी भगवान् विष्णु के मन्दिर का निर्माण कर जो उसमें भगवान् विष्णु को स्थापित करता है तथा उनकी भक्ति में निरन्तर लगा रहता है; वह भगवान् विष्णु के साम्य (सारूप्यमुक्ति) – को प्राप्त करता है।।28।। जो व्यक्ति तुलसीवृक्ष को भगवान् विष्णु के रूप में समझकर तीन प्रकार (शरीर, मन और वाणी) – से उन्हें प्रणाम करता है, वह भगवान् विष्णु के साम्य (सारूप्यमुक्ति) – को प्राप्त करता है।।29।।  

सुरासुरजगद्गुरो ! देवदेवेश ! आपको नमस्कार है। अनघ ! इस भयावह संसार से मेरी रक्षा कीजिए, आपको नमस्कार है।।30।।  

महामते ! जो व्यक्ति बुद्धिपूर्वक तीन बार अथवा सात बार प्रदक्षिणा करके संसार से उद्धार करने वाली भगवती तुलसी को इस मन्त्र से भक्तिपूर्वक प्रणाम करता है वह घोर संकट से मुक्त हो जाता है।।31।। तीनों लोकों के उद्धार में तत्पर शिवे ! जिस तरह साक्षात गङ्गा सभी नदियों में श्रेष्ठ हैं, उसी तरह तीनों लोकों को पवित्र करने के लिए वृक्षों में साक्षात तुलसी स्वरूपिणी आप श्रेष्ठ हैं।।32।।  

तुलसी ! आप ब्रह्मा, विष्णु आदि प्रमुख देवताओं के द्वारा पूर्व में पूजित हुई हैं, आप विश्व को पवित्र करने के हेतु पृथ्वी पर उत्पन्न हुई हैं, विश्व की एकमात्र वन्दनीया आपको मैं नमस्कार करता हूँ, आप प्रसन्न हों।।33।। मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार जो व्यक्ति तुलसी को प्रतिदिन प्रणाम करता है, वह जहाँ-कहीं भी स्थित है, भगवती तुलसी उसकी सभी कामनाओं को पूर्ण करती हैं। भगवती तुलसी सभी देवताओं की परम प्रसन्नता को बढ़ाने वाली हैं।।34-35।।  

जहाँ तुलसीवन होता है वहाँ देवताओं का वास होता है और पितृगण परम प्रीतिपूर्वक तुलसीवन में निवास करते हैं।।36।। पितृ-देवार्चन आदि कार्यों में तुलसीपत्र अवश्य प्रदान करनी चाहिए। इन कार्यों में तुलसीपत्र ना देने पर मनुष्य उस कर्म का सम्यक फल प्राप्त नहीं करते।।37।। महामते ! लोक मुक्तिदा भगवती तुलसी को त्रिलोकीनाथ भगवान् विष्णु, सभी देवी-देवताओं और विशेषरूप से पितृगणों के लिए परम प्रसन्नता देनेवाली समझना चाहिए। इसलिए देव तथा पितृकार्यों में तुलसी-पत्र अवश्य समर्पित करना चाहिए।।38-39।।  

जहाँ तुलसी वृक्ष स्थित है, वहाँ सभी तीर्थों के साथ साक्षात भगवती गङ्गा सदा निवास करती हैं। मुनिश्रेष्ठ ! इसलिए तुलसी वृक्ष के निकट देह-त्याग करने वाले मनुष्यों को वही फल प्राप्त होता है।।40-41।। यदि अत्यन्त भाग्यवशात आँवले का वृक्ष भी वहाँ पर स्थित हो तो वह स्थान बहुत अधिक पुण्य प्रदान करने वाला समझना चाहिए। महामते ! देहधारियों का यदि उस स्थल पर अज्ञानता से भी देहत्याग हो जाता है तो उनकी मुक्ति हो जाती है, यह बात सत्य है, सत्य है, इसमें संशय नहीं।।42-43।।  

जहाँ इन दोनों – तुलसी और आँवला – के निकट बिल्व वृक्ष भी है, वह स्थान साक्षात वाराणसी के समान महातीर्थस्वरूप है। उस स्थान पर भगवान् शंकर, देवी भगवती तथा भगवान् विष्णु का भक्तिभाव से किया गया पूजन महापातकों का नाश करने वाला तथा बहुपुण्यदायक जानना चाहिए। जो व्यक्ति वहाँ एक बिल्वपत्र भी भगवान् शंकर को अर्पण कर देता है; वह साक्षात भगवान् शिव के दिव्य लोक को प्राप्त करता है।।44-46।।  

महामते ! उसी प्रकार तुलसी पत्र तथा धात्रीपत्र (आंवले के पत्तों) द्वारा भगवान् विष्णु की पूजा करने से वह व्यक्ति भगवान् विष्णु की सायुज्य मुक्ति को प्राप्त कर लेता है, यह सत्य है।।47।। जो व्यक्ति वहाँ भगवान् विष्णु, भगवान् शिव अथवा देवी भगवती को एक बिल्वपत्र अर्पण करता है, वह भी पाप से मुक्त हो जाता है।।48।। मनुष्य वहाँ प्राण त्याग कर उस क्षेत्र के प्रभाव से मोक्ष प्राप्त करता है तथा उसका पुनर्जन्म नहीं होता।।49।। मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार मैंने इनका माहात्म्य संक्षेप में  आपसे कहा। जो मनुष्य इस माहात्म्य को सुनता है, वह भी स्वर्गलोक प्राप्त करता है।।50।।  

।। इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अंतर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में तुलसी माहात्म्य वर्णन में ‘आमलक बिल्व संयोग कथन’ नामक उन्नासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ।।  

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