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महाभागवत – देवी पुराण – पचहत्तरवाँ अध्याय 

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श्रीनारदजी बोले – परमेश्वर ! आपने बताया की ‘गङ्गा’ नाम परम पुण्यदायी है। गङ्गा के और भी कितने श्रेष्ठ नाम हैं, मुझे उन्हें बताइये।।1।।  

श्रीमहादेव जी बोले – मुनिश्रेष्ठ ! गङ्गा के एक हजार नामों में से एक सौ आठ नाम अत्युत्तम हैं। आप मुझसे उन नामों को तत्त्वतः सुन लीजिये – ।।2।।  

गङ्गा जी के 108 नाम –

1) ओंकारस्वरूपिणी गङ्गा, 2) त्रिपथगा देवी, 3) शम्भुमौलिविहारिणी, 4) जाह्नवी, 5) पापहन्त्री, 6) महापातकनाशिनी, 7) पतितोद्धारिणी, 8) स्रोतस्वती, 9) परमवेगिनी,10) विष्णुपादाब्ज,11) विष्णुदेहकृतालया, 12) स्वर्गाब्धिनिलया,13) साध्वी, 14) स्वर्णदी, 15) सुरनिम्नगा,16) मन्दाकिनी, 17) महावेगा, 18) स्वर्णशृंगप्रभेदिनी, 19) देवपूज्यत्मा, 20) दिव्या, 21) दिव्यस्थाननिवासिनी, 22) सुचारुनीररुचिरा, 23) महापर्वतभेदिनी, 24) भागीरथी, 25) भगवती, 26) महामोक्षप्रदायिनी, 27) सिंधुसंगगता, 28) शुद्धा, 29) रसातल-निवासिनी।।3-7।।  

30) महाभोगा, 31) भोगवती, 32) सुभगानन्ददायिनी, 33) महापापहरा, 34) पुण्या, 35) परमाह्लाददायिनी, 36) पार्वती, 37) शिवपत्नी, 38) शिवशीर्षगतालया, 39) शम्भोर्जटामध्यगता, 40) निर्मला, 41) निर्मलानना, 42) महाकलुषहन्त्री, 43) जह्नुपुत्री, 44) जगत्प्रिया, 45) त्रैलोक्यपावनी, 46) पूर्णा, 47) पूर्णब्रह्मस्वरूपिणी, 48) जगतपूज्यतमा, 49) चारुरूपिणी, 50) जगदम्बिका, 51) लोकानुग्रहकर्त्री, 52) सर्वलोकदयापरा, 53) याम्याभीतिहरा, 54) तारा, 55) पारा, 56) संसारतारिणी, 57) ब्रह्माण्डभेदिनी, 58) ब्रह्मकमण्डलुकृतालया।।8-12।।         

59) सौभाग्यदायिनी, 60) पुंसां निर्वाणपददायिनी, 61) अचिन्त्यचरिता, 62) चारुरुचिरातिमनोहरा, 63) मर्त्यस्था, 64) मृत्युभयहा, 65) स्वर्गमोक्षप्रदायिनी, 66) पापहारिणी, 67) दूरचारिणी, 68) वीचिधारिणी, 69) कारुण्यपूर्णा, 70) करुणामयी, 71) दुरितनाशिनी, 72) गिरिराजसुता, 73) गौरीभगिनी, 74) गिरीशप्रिया, 75) मेनकागर्भसम्भूता, 76) मैनाकभगिनीप्रिया, 77) आद्या, 78) त्रिलोकजननी, 79) त्रैलोक्यपरिपालिनी, 80) तीर्थश्रेष्ठतमा, 81) श्रेष्ठा, 82) सर्वतीर्थमयी, 83) शुभा, 84) चतुर्वेदमयी, 85) सर्वा, 86) पितृसंतृप्तिदायिनी।।13-17।।  

87) शिवदा, 88) शिवसायुज्यदायिनी, 89) शिववल्लभा, 90) तेजस्विनी, 91) त्रिनयना, 92) त्रिलोचनमनोरमा, 93) सप्तधारा, 94) शतमुखी, 95) सगरान्वयतारिणी, 96) मुनिसेव्या, 97) मुनिसुता, 98) जह्नुजानुप्रभेदिनी, 99) मकरस्था, 100) सर्वगता, 101) सर्वाशुभनिवारिणी, 102) सुदृश्या, 103) चाक्षुषीतृप्तिदायिनी, 104) मकरालया, 105) सदानन्दमयी, 106) नित्यानन्ददा, 107) नगपूजिता, 108) सर्वदेवाधिदेवै: परिपूज्य पदाम्बुजा।।18-21।।  

मुनिश्रेष्ठ ! मैंने आपसे भगवती गङ्गा के ये श्रेष्ठ नाम बता दिए। ये नाम समस्त पापों का विनाश करने वाले हैं।।22।।  

नारद ! जो व्यक्ति प्रातःकाल उठकर गङ्गा के इन परम पुण्य देने वाले एक सौ आठ नामों को भक्तिपूर्वक पढ़ता है, उसके ब्रह्महत्या आदि पाप भी नष्ट हो जाते हैं तथा वह अतुलनीय आरोग्य एवं सुख प्राप्त करता है, इसमें कोई संदेह नहीं है।।23-24।।  

जहाँ-कहीं भी स्नान करके मनुष्य यदि इस उत्तम स्तोत्र का पाठ करे, तो उसे वहीँ पर गङ्गा स्नान का फल निश्चित रूप से प्राप्त हो जाता है।।25।। जो मनुष्य गङ्गा के एक सौ आठ नामों वाले स्तोत्र का प्रतिदिन पाठ करता है, वह अंत में गङ्गा को प्राप्त होकर परमपद प्राप्त कर लेता है।।26।। जो मनुष्य गङ्गा में स्नान के समय भक्तिपरायण होकर इसका पाठ करता है, वह हजारों अश्वमेध यज्ञों का फल प्राप्त करता है।।27।। पञ्चमी तिथि को इसका पाठ करने वाला मनुष्य वह फल प्राप्त करता है जो फल दस हजार गायों के दान का कहा गया है।। 28।। कार्तिक पूर्णिमा को गङ्गा सागर संगम में स्नान करके जो मनुष्य इसका पाठ करता है, वह शिवत्व को प्राप्त हो जाता है, यह सच है, इसमें कोई संशय नहीं है।।29।।  

स्वयं सर्वतीर्थमयी गङ्गा ने जहाँ समुद्र तथा तीर्थराज के साथ संगम किया है, उससे बढ़कर कोई तीर्थ नहीं है।।30।। दूसरे स्थान के गङ्गा तीर्थ में ज्ञान से मुक्ति होती है, किन्तु मुनिश्रेष्ठ ! वाराणसी में भूमि पर अथवा जल में कहीं भी ज्ञान अथवा अज्ञानपूर्वक विज्ञान की प्राप्ति कही गई है। यहाँ स्थल पर गङ्गा जल में अथवा आकाश में ज्ञान या अज्ञान किसी भी तरह से शरीर का त्याग करके मनुष्य मुक्ति प्राप्त कर लेता है। मुने ! वहाँ पर जो मनुष्य किसी अन्य पुरुषार्थ की इच्छा से भी देहत्याग करता है, वह भी महातीर्थ की कृपा से मोक्ष प्राप्त कर लेता है।। 31-33।।  

मृत्यु ने मेरे केशों को पकड़ रखा है – ऐसा सोचकर मनुष्य को तीर्थों में सर्वश्रेष्ठ, मनुष्यों के सभी कार्यों को सिद्ध करने वाली, शक्तिस्वरूपिणी, जलमयी मूर्त्ति, लोकों का उद्धार करने वाली, अविद्या का नाश करने वाली तथा ब्रह्मविद्या प्रदान करने वाली भगवती गङ्गा का आश्रय ग्रहण करना चाहिए।।34-35।।  

मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार मैंने आपसे उत्तम, परम पवित्र, गुप्त तथा महापातकों का नाश करने वाले गङ्गा माहात्म्य का वर्णन कर दिया।।36।।  

मुने ! जो मनुष्य भक्ति से युक्त होकर इस उत्तम आख्यान को पढता है, वह भगवती गङ्गा के दिव्य धाम को प्राप्त हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है।।37।। जिस स्थान पर पवित्र गङ्गा माहात्म्य का पाठ किया जाता है, वहाँ पर गङ्गा सभी तीर्थों के साथ प्रत्यक्ष रूप से निवास करती हैं। यहाँ मनुष्य जो भी देवकार्य या पितृकार्य करता है, वह कर्म इस लोक में अक्षय फल देने वाला कहा गया है।।38-39।।  

मुने ! यह पावन आख्यान जहाँ लिखा हुआ स्थित है, पाप उस स्थान को भय के मारे स्पर्श तक नहीं करता है, यह बात सत्य है, इसमें कोई संशय नहीं है।।40।। मरणासन्न स्थिति में पड़ा हुआ जो मनुष्य भक्तिपूवक इसका श्रवण करता है, वह मृत्यु के अधीन नहीं होता और परम गति को प्राप्त होता है।।41।। एकादशी तिथि को स्नान करके जो व्यक्ति उपवासपूर्वक तुलसी या बिल्वपत्र के समीप बैठकर इसे ध्यानपूर्वक पढता है, वह परम गति प्राप्त करता है।।42।। मुने ! जो मनुष्य पितरों के श्राद्ध के दिन ब्राह्मण के सान्निध्य में इसका पाठ करता है, उसके पितर शाश्वत तृप्ति प्राप्त करते हैं।।43।। जो श्रेष्ठ मानव महाष्टमी की अर्धरात्रि में इसे ध्यानपूर्वक पढता है, वह महादेवी गङ्गा की कृपा से परम आनंद को प्राप्त हो जाता है।।44।। मुनिश्रेष्ठ ! इस आख्यान के पाठ का अनन्त फल कहा गया है। संसार में इसके समान पुण्य प्रदान करने वाला कोई भी आख्यान नहीं बताया जाता है।।45।।  यह आख्यान महापापों का हरण करने वाला तथा पुण्यतम से भी अधिक पुण्यदायी कहा गया है। इस आख्यान का श्रवण करके मनुष्य स्वर्गलोक (परम गति) प्राप्त कर लेता है।।46।।  

।। इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अंतर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में ‘श्रीगङ्गा देवी का अष्टोत्तर शतनाम माहात्म्य वर्णन नामक पचहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।  

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