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महाभागवत – देवी पुराण – इकहत्तरवाँ अध्याय 

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श्रीमहादेवजी बोले – महामुने ! तब भगवती गङ्गा समुद्र के साथ संयुक्त हो विवर से होकर अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक पाताल पहुँचकर कपिलमुनि के निकट गयीं ।।1½।। कपिलमुनि ने देवता आदि के लिए भी दुर्लभ गङ्गा जी को संसार के सौभाग्य से आयी जानकर उनकी पाद्म आदि से पूजा की।।2½।। उन महामुनि से सम्यक रूप से पूजित होकर भगवती गङ्गा ने कहा – मुने ! शीध्र बताइये कि भस्मरूपी सगरपुत्र कहाँ हैं? तब मुनि ने उन्हें सगरपुत्रों को दिखाया।।3-4।। गङ्गा जी ने भी उस भस्म को देखकर क्षण भर में अपने में समाहित कर लिया। नदियों में श्रेष्ठ त्रैलोक्यगामिनी गङ्गा भस्मसात किये गए उन सगरपुत्रों को वेगपूर्वक सभी ओर से बहा ले गयीं।  उसी क्षण सगरपुत्र दिव्य रूपधारी होकर अलौकिक रथ में आरूढ़ हो ब्रह्मलोक को चले गए।।5-6½।।  

अपने पितरों के उद्धार को देखकर राजा भगीरथ परम प्रसन्न हो ‘जय गङ्गे’ ऐसी स्तुति करते हुए रथ में नृत्य करने लगे।।7½।। राजाओं द्वारा वन्दित, मध्याह्नकालीन सूर्य के समान तेजस्वी, रोमाञ्चित शरीर वाले राजा ने महान शब्द करने वाले शंख को बजाया। उस ध्वनि को सुनकर महान वेग का आश्रय ले गङ्गा विवर द्वार से सगरपुत्रों की भस्म को मृत्युलोक में ले आयीं।।8-9½।। उनकी एक अत्यन्त निर्मल धारा पाताल में भी स्थिर रह गयी, जो ‘भोगवती’ नाम से प्रसिद्द और समस्त लोकों के लिए फलदायिनी है।।10½।। मुने ! वे भगवती गङ्गा करुणामयी होकर धीरे-धीरे जल में समाविष्ट हो गयीं, जहाँ सैकड़ों हजार ब्रह्माण्ड प्रकाशित होते रहते हैं।।11।। प्रसन्न मनवाले राजा भगीरथ भी सगरगामिनी गङ्गा का पूजन कर और उन्हें प्रणाम कर अपने नगर को चले आये ।।12।। भगवान् विष्णु के शरीर में निवास करनेवाली भगवती गङ्गा सभी प्राणियों के कल्याण के लिए इस प्रकार पृथ्वी पर आयीं।।13।।   

गङ्गा के पृथ्वी पर अवतरण की इस पुण्यमयी कथा को जो पढता या पढ़ाता है, उसकी मुक्ति उसके हाथ में रहती है। उसकी आयु और कीर्ति की वृद्धि होती है, सर्वत्र उसे सुख की प्राप्ति होती है और सब प्रकार से मंगल होता है।।14-15।। पितृश्राद्ध के दिन भक्तिपूर्वक जो ब्राह्मणों के सान्निध्य में इसका पाठ करता है उसके पापी पितर भी तृप्त होकर परमगति को प्राप्त करते हैं। महामते ! दम्भ का आश्रय लेकर अकाल में अथवा अप्रशस्त देश में किया गया भी वह श्राद्धादि कार्य निश्चय ही पितरों की परम प्रसन्नता का कारण होता है।।16-17।। एकादशी के दिन जो मनुष्य संयत होकर भक्तिपूर्वक इसका पाठ करता है, गङ्गा जी की कृपा से उसको सभी प्रकार की सिद्धियां प्राप्त होती हैं। उसके पुत्र, स्त्री, परिवार-सम्बन्धी सुख की अतुलनीय वृद्धि होती है। देवी की कृपा से उसका गृहस्थाश्रम लक्ष्मीसम्पन्न हो जाता है।।18-19।।  

महामुने ! इस पुण्यमय आख्यान का जो काशी मे विधिपूर्वक पाठ करता है, वह संसार को मोक्ष प्रदान करने वाले साक्षात विश्वनाथ के ही समान हो जाता है, उसके दर्शनमात्र से पापी घोर पातकों से मुक्त हो जाता है।।20½।।  संक्रांति या पूर्णिमा तिथियों पर जो इस उत्तम आख्यान का पाठ करता है, वह अश्वमेध यज्ञ के फलादि को प्राप्त करता है।।21।। गङ्गा के किनारे जाकर जो स्नान करके विधि-विधानपूर्वक इसे पढता या सुनता है, उसके समान पृथ्वी पर दूसरा कोई नहीं होता।।22।। यह उत्तम आख्यान लिखित रूप में जिसके घर में रहता हैं, उस पर दुर्भाग्य या शत्रु का कोई प्रभाव नहीं होता। उसे आजन्म गङ्गा स्नान का फल प्राप्त होता है, उसे न तो ग्रहपीड़ा होती है और न ही बन्धु-बान्धवों का वियोग होता है, न उसे रोगों से कष्ट होता है और न ही शत्रुओं से भय होता है।। 23-24½।। महामुने ! गङ्गा के समान दूसरा तीर्थ इस पृथ्वी पर नहीं है, इसलिए उनका आख्यान अत्यन्त पुण्यमय कहा गया है।।25।।  

।। इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अंतर्गत ‘श्रीगङ्गाविवरस्थलद्वारात्पातालप्राप्ति’ नामक इकहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।  

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