श्रीमहादेव जी बोले – मुनिश्रेष्ठ ! ब्रह्महत्या करने वाला, गोवध करने वाला, सुरापान करने वाला तथा गुरु पत्नीगामी महापापी भी गङ्गा में स्नान कर लेने पर भी महादेवी गङ्गा की कृपा से घोर पापों से मुक्त हो जाता है।।1 ½।। श्रेष्ठ भक्ति से हीन मनुष्य भी बिना मन्त्र आदि के ही, ज्ञानपूर्वक अथवा अज्ञानपूर्वक मात्र एक बार गङ्गा स्नान करके मुक्त हो जाता है।।2½।। मुने ! गङ्गा तट पर भक्तियुक्त होकर विधिपूर्वक गङ्गा जल में स्नान करने से मनुष्य को सात जन्मों में हो सकने वाला अनन्त तथा अक्षय पुण्य प्राप्त होता है और उसे विपुल धन तथा परम सुख की प्राप्ति होती है। वह नरश्रेष्ठ सभी पापों से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त हो जाता है।।3-5।। यदि मनुष्य गङ्गा का स्मरण करते हुए अन्यत्र कहीं भी स्नान करता है तो वहाँ भी उसे गङ्गा स्नान से होने वाले पुण्य के समान पुण्य प्राप्त होता है।।6।।
मुनिश्रेष्ठ ! जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल गङ्गा के जल में स्नान करता है, उस पुण्यात्मा को साक्षात दूसरे शिव के समान ही समझना चाहिए। उसके दर्शन से पापी लोग पाप से मुक्त हो जाते हैं, इसमें संदेह नहीं है।।7½।। जो मनुष्य तुला, मकर और मेष की संक्रांतियों में गङ्गाजल में प्रातःकाल विधिपूर्वक स्नान करता है, उसके पुण्य के विषय में मुझसे सुनिये। वह मनुष्य उभयकुल (मातृ-पितृकुल) के करोड़ों पितरों का उद्धार करके अंत में अपना शरीर त्यागकर शिवत्व को प्राप्त हो जाता है; इसमें संदेह नहीं है।।8-9।।
महामुने ! हजारों महायज्ञ तथा सैकड़ों व्रत और पूजा आदि गङ्गा स्नान की एक कला के भी बराबर नहीं है।।10।। माघमास के शुक्लपक्ष की सप्तमितिथि (अचला सप्तमी) को अरुणोदय काल में गङ्गा स्नान करने पर मनुष्य सांसारिक जन्म-मरण के बंधन से छूट जाता है। उस दिन गङ्गा के तट पर सूर्य की पूजा करने से रोगी महारोग से मुक्त हो जाता है; यह सत्य है, इसमें संशय नहीं है।।11-12।। पूर्णिमा तिथि को गङ्गा के जल में विधिपूर्वक स्नान करने से मनुष्य के पाप नष्ट हो जाते हैं और अंत में वह शिव सायुज्य प्राप्त करता है।।13।।
कार्तिक मास की पूर्णिमा को गङ्गा का दर्शन करने तथा उनमें स्नान करने से मनुष्य महापातकों के समूह से मुक्त हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है।।14।। चैत्रमास के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी को विधि-विधानपूर्वक गङ्गा में स्नान करने से मनुष्य समस्त पापों से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त होता है। मुनिश्रेष्ठ ! आरोग्य, अतुलनीय ऐश्वर्य तथा अन्य जो भी मनोवांछित रहता है – वह सब गङ्गा की कृपा से प्राप्त हो जाता है।।15-16।। महामते ! इसके अतिरिक्त किसी भी दिन गङ्गास्नान करने से मनुष्य सभी पापों से छूट जाता है और परमपद प्राप्त करता है।।17।।
जो लोग एकाग्रचित्त होकर गङ्गा में पितरों का तर्पण करते हैं, उनके पितर निर्विकार ब्रह्मलोक पहुँच जाते हैं।।18।। गङ्गा जल उपलब्ध रहने पर उसे छोड़कर अन्य जल से पितरों का तर्पण नहीं करना चाहिए। यदि कोई अज्ञानवश ऐसा करता है तो वह प्रायश्चित का भागी होता है।।19।। जो समाहित होकर गङ्गा में पितरों का तर्पण करता है, उसे ही पुत्र कहा जाता है, अन्य को पुत्र नहीं कहा जाता।।20।।
मनुष्य को अपने पितरों की तृप्ति के लिए गङ्गा तीर्थ में जाकर श्राद्ध तथा तर्पण करना चाहिए, अन्यथा वह नरकगामी होता है।।21।। गङ्गा को उद्देश्य करके जाते हुए मनुष्य को देखकर श्राद्धभोग की इच्छा रखने वाले उसके पितर प्रसन्न होकर हँसने तथा नाचने लगते हैं।।22।। मुने ! श्राद्ध न करने के कारण पितर निराश होकर लौट जाते हैं। अतः यदि मनुष्य अपने पितरों का श्राद्ध नहीं करता है तो वह नरक में पड़ता है।।23।। गङ्गा के जल में पकाया हुआ अन्न देवताओं को भी दुर्लभ है। उस अन्न से श्राद्ध किये जाने पर पितरों को संतृप्ति होती है।। 24।। जिसके पितर संतुष्ट रहते हैं, उसका जन्म सार्थक है और जिसके पितर कुपित रहते हैं उसका जीवन निरर्थक है।।25।। पितरों के रुष्ट रहने पर मनुष्यों को धर्म की प्राप्ति नहीं होती है। अतः पितरों को भली-भाँति तृप्त करके ही धार्मिक कृत्य करना चाहिए।।26।।
चंद्र अथवा सूर्यग्रहण के अवसर पर यदि भाग्य से गङ्गा का सान्निध्य प्राप्त होता है तो उस समय गङ्गा में स्नान करके विधि-विधानपूर्वक पितृश्राद्ध करना चाहिये। वह श्रेष्ठ श्राद्ध अक्षय, पितरों को तृप्त करने वाला, सौ गङ्गा श्राद्धों के समान और मोक्षप्रद प्रदान करने वाला होता है।।27½।। उस समय पुरश्चरण करने से मनुष्य मन्त्रों को सिद्ध कर लेता है। वह असाध्य कार्यों को भी सम्पन्न कर लेता है और स्वयं शिव-तुल्य हो जाता है। पुरश्चरण कर रहे मनुष्य को किसी दूसरे अधिकारी पुरुष से अपने पितरों का श्राद्ध करा लेना चाहिये। किन्तु अज्ञानवश उसे अपने पितरों को कभी श्राद्ध से वंचित नहीं करना चाहिये।।28-29½।।
अक्षय कही जाने वाली तथा युगादि तिथियों पर गङ्गा के जल में स्नान करके श्राद्ध तथा दान आदि से पितरों को संतृप्त करने से मनुष्य पुनर्जन्म का भागी नहीं होता।।30-31।। उत्तम साधक गङ्गा में पुरश्चरण करके पाप से रहित होकर मंत्रसिद्ध तथा महाज्ञानी हो जाता है। मुनिश्रेष्ठ ! गङ्गा के सान्निध्य में किये गये दान, ध्यान, जप, होम, पूजन तथा श्राद्ध-तर्पण आदि महान पुण्यकारक कहे गए है।।32-33।।
भूलकर भी मनुष्य को गङ्गा में मल-मूत्र का त्याग नहीं करना चाहिए। गङ्गा में मल-मूत्र का विसर्जन करने वाला व्यक्ति चौदह इंद्रों के भोगकाल तक (एक कल्पपर्यन्त) नरक में वास करता है।।34।। पुण्यात्मा व्यक्ति को चाहिए कि असत्य भाषण तथा लोभ का त्याग करके परनिंदा और परद्रोह आदि पापों से रहित हो जाए। यदि भूल से ऐसा कर देता है, तब उस पाप की शान्ति के लिए उसे गङ्गा स्नान करके तथा भगवती गङ्गा को प्रणाम करके उस क्षेत्र से अन्यत्र हट जाना चाहिए।।35-36।। जो पुरुष जलरूपिणी, पूर्णा, परा प्रकृति तथा साक्षात ब्रह्मस्वरूपिणी भगवती गङ्गा को अज्ञानवश नदी – ऐसा मानता है, वह अनेक नरकों में जाता है। आदिशक्ति ही प्राणियों की रक्षा के लिए द्रवरूप में निकली हुई हैं – ऐसी भावना करनी चाहिए।।37-38।।
गङ्गा सभी स्थानों पर तो सुलभ हैं, किन्तु हरिद्वार, प्रयाग और गङ्गासागर संगम – इन तीन स्थानों पर दुर्लभ हैं। इन स्थानों पर गङ्गा महान फल प्रदान करती हैं। अतः महान बुद्धि वाले मनुष्य को चाहिए कि वहाँ पर विशेष प्रयत्न के साथ स्नान, दान आदि कृत्यों को करे।।39-40।। जो मनुष्य काशी में आकर भक्तिभाव से सम्पन्न हो विधिपूर्वक उत्तरवाहिनी गङ्गा में स्नान करता है, वह साक्षात शिवत्व को प्राप्त हो जाता है। वह व्यक्ति देवताओं का भी अत्यन्त पूजनीय कहा गया है और वहाँ पर किया गया पितृ तर्पण भी निर्वाण प्रदान करता है।।41-42।।
विश्वेश्वर सदाशिव की नगरी काशी अत्यन्त दुर्लभ है तथा सभी तीर्थों की आदि निवासस्थली है। वह पृथ्वीमण्डल के अंतर्गत रहते हुए भी भूमण्डल से पृथक है [भगवान् विश्वनाथ के त्रिशूल पर स्थित है]। महामते ! ऐसी दिव्य भूमि तथा भगवती गङ्गा का पावन जल जहाँ है, वहाँ पापी प्राणियों के लिए भी मुक्ति हाथ में ही है।।43-44।। जहाँ देहधारियों की माता अन्नपूर्णा स्वयं अन्न प्रदान करती हैं, जहाँ भगवती गङ्गा जल और भगवती सरस्वती ज्ञान प्रदान करती हैं। मुनिश्रेष्ठ ! जहाँ मृत्यु ब्राह्म आदि से श्रेष्ठ परम-पद (मोक्ष) – को प्रदान करती है और जहाँ पर जगत्पिता विश्वेश्वर मोक्षमार्ग के उपदेश के रूप में विराजमान है; उस काशी का जो सेवन नहीं करता, वह विधाता के द्वारा ठग लिया जाता है। काशी में मणिकर्णिका पर स्नान करने वाला व्यक्ति बिल्वपत्र आदि से भगवान् विश्वेश्वर का पूजन करके शिव सायुज्य प्राप्त कर लेता है।।45-47।।
मुनिश्रेष्ठ ! गङ्गा की मिट्टी से तिलक धारण करके मनुष्य जो कुछ कर्म करता है, वह सब पूर्ण हो जाता है।।48।। जहाँ कहीं भी श्रेष्ठ मनुष्य गङ्गा के जल से देवपूजन, श्राद्ध तथा अभिषेक आदि कर्म करता है – वह कर्म चाहे ज्ञान अथवा अज्ञान से हो, विधिहीन हो गया हो, श्राद्ध आदि के लिए अविहित देश अथवा काल में किया गया हो, दम्भ भावना से युक्त होकर या द्रव्यरहित रूप में अथवा अन्यायोपार्जित द्रव्यों से या पापयुक्त मन से ही किया गया हो; फिर भी वह निश्चित रूप से सम्पूर्ण फल प्रदान करने वाला होता है।।49-51।।
।। इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अंतर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में ‘श्रीगङ्गा माहात्म्य कथन’ नामक तेहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।
