श्रीनारद जी बोले – परमेश्वर ! आपने कृपापूर्वक महापापनाशक, पुण्यप्रद, धन्य करने वाला और दिव्य आख्यान मुझे सुनाया। मैंने जैसा पूछा था – आपने भगवती के उस अद्भुत तथा रहस्यमय तत्त्व को और उन नित्या महामाया के जन्मकर्मादिक की लीला कथाएं भी सुनाई। अब आगे उन भगवती परा प्रकृति के अंश से हिमवान के घर में उत्पन्न भगवती गंगा के दिव्य चरित्र को सुनने की मेरी इच्छा है।।1-3।। प्रभो ! जिस प्रकार जगदम्बा की वह एकमात्र पापहारिणी द्रवमयी मूर्ति उत्पन्न हुई और जिस प्रकार वे इस चराचर त्रिलोक को वे पवित्र करती रहती हैं और जिस प्रकार संसार के उद्धार हेतु उन्होंने पृथ्वी पर अवतार लिया – यह सब तथा अन्य भी उनका माहात्म्य मुझे विस्तार से बताइए।।4-5।। श्रीमहादेवजी बोले – वत्स ! सुनो, मैं तुम्हें पुण्यों में भी परम श्रेष्ठ पुण्यस्वरूपिणी कथा सुनाता हूँ, जिसे सुनकर पापी मनुष्य भी जन्म-मरण वाले इस संसार के बंधन से मुक्त हो जाता है।।6।। प्राचीन काल में गंगा के विवाह-महोत्सव की बात सुनकर भगवान् विष्णु ने गंगा सहित प्रसन्न हुए भगवान् शंकर को देखने की इच्छा से सत्कारपूर्वक उन्हें अपनी वैकुण्ठपुरी में बुलाया। महामुने ! ब्रह्मादि देवगण भी परमेश्वर शिव तथा जगन्नाथ विष्णु के दर्शन की लालसा से वहाँ पहुँचे।।7-8।।
यह बात सुनकर मरीचि आदि दूसरे महर्षिगण भी एक सुन्दर सभा का निर्माण करके वहाँ दिव्य आसनों पर विराजमान हो गए। एक सुन्दर रत्नसिंहासन पर महेश्वर शिव को बैठाकर प्रसन्नचित्त भगवान् विष्णु ने निवेदन किया – महेश्वर ! कोई गीत सुनाइए।।9-10।। आप दीर्घकाल तक सती के वियोग से दु:खित और व्यग्रचित्त रहें हैं। उन सती ने अपने अंशावतार से आपको पुनः प्राप्त कर लिया है। देववन्दित ! आपको गंगा के साथ प्रसन्नचित्त और प्रसन्नमुख देखकर हम सब भी बड़े प्रसन्न हैं। विश्वेश ! इसलिए अत्यन्त प्रीति उत्पन्न करनेवाला आपके मुख से निकला हुआ गान हम सुनना चाहते हैं। महेश्वर ! आप कृपापूर्वक गायन करें।। 11-13।। अमित तेजस्वी भगवान् विष्णु के ऐसे वचन सुनकर भगवान् शंकर ने अत्यंत अद्भुत, श्रेष्ठ और मनोहर गायन प्रस्तुत किया।।14।।
मुनिश्रेष्ठ ! अत्यन्त मनोहारी पहले गीत को सुनकर सभी ब्रह्मादि श्रेष्ठ देवगण मुग्ध हो गए। नारदजी ! दूसरे गीत को सुनकर वैकुंठपति भगवान् विष्णु के शरीर में रोमांच हो आया और वे संज्ञाशून्य होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। मुनिश्रेष्ठ ! तीसरे गीत को सुनकर वे परमेश्वर भगवान् विष्णु क्षण भर में द्रवीभूत हो गए। मुनिश्रेष्ठ ! विष्णु के द्रवीभूत होने से वैकुण्ठ में बाढ़ आ गई और चारों ओर जल व्याप्त हो गया।।15-18।। तब ब्रह्मादि श्रेष्ठ देवगणों ने सचेत होकर समस्त विष्णुधाम वैकुण्ठ को जल से व्याप्त देखा। उस लोक के अन्य सभी स्थानों को विष्णु की जलमयी मूर्ति से व्याप्त देख-देखकर वे अत्यन्त विस्मित हुए।।19-20।। तदनन्तर शिव के गायन से भगवान् विष्णु की द्रवरूपता को जानकर ब्रह्माजी ने उस जल को अपने कमण्डलु में रख लिया। गंगा की एक मूर्ति भगवान् शिव के साथ थी और उस कमण्डलु में प्राप्त जल से उनकी दूसरी द्रवमयी मूर्ति भी प्राप्त हो गयी।।21-22।। मुने ! गंगा की जलमयी मूर्त्ति को कमण्डलु में लेकर लक्ष्मी और सरस्वती को आश्वस्त करके ब्रह्माजी अपने धाम को चले गए।।23।।
भगवान् शिव भी गंगा को साथ लेकर कैलाश आ गए। नारदजी ! सभी अन्य देवगण भी स्वर्ग को चले गए।। 24।। मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार द्रवमयी होकर त्रैलोक्यपावनी गंगा ब्रह्मा के कमण्डलु में स्थित हो गयीं।।25।। जिस प्रकार देवी गंगा विष्णुपद पहुँची और उन सुरेश्वरी ने ”विष्णुपादोद्भवा’ नाम प्राप्त किया और लोकोद्धार हेतु प्रार्थना किए जाने पर उन्होंने जिस प्रकार पृथ्वी पर अवतार लिया तथा जैसे चतुर्मुखी होकर सबके कल्याण के लिए चारों दिशाओं में वे बह निकलीं, अब उस आख्यान को सुनो।।26-27।।
।। इस प्रकार श्रीमहाभागवत महापुराण के अंतर्गत शिव-नारद-संवाद में ‘गंगा का द्रवरूपवर्णन’ नामक चौंसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।
