श्रीमहादेव जी बोले – मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार छल-पूर्वक पृथ्वी का भार मिटाकर श्रीकृष्ण ने पृथ्वी तल से पुनः अपने धाम आने का मन में निश्चय किया।।1।। इसी बीच पृथ्वी तल पर आकर ब्रह्माजी ने द्वारकापुरी में प्रवेश करके श्रीकृष्ण से यह बात कही – ।।2।।
ब्रह्माजी बोले – मनुष्य-शरीर धारण कर पृथ्वी का भार नष्ट करने के लिए हम लोगों ने भगवती से प्रार्थना की थी कि भगवान् शम्भु की सहमति से आप मायापुरुष के रूप में पृथ्वी तल पर आविर्भूत हुई हैं तथा आपने पृथ्वी का भार मिटाने का सब काम कर दिया और शम्भु ने अपने मन में जो अभिलाषा की थी, उसे आपने पूर्ण भी कर दिया। अब आप धरातल से पुनः अपने धाम पहुंचकर और फिर से अपना वास्तविक रूप धारण कर हम देवताओं का पालन कीजिए ।।3-6।।
श्रीकृष्ण जी बोले – ब्रह्मन ! मेरी भी वही इच्छा है, जिसे आप लोग कह रहे हैं। मैं अपने लोक को शीघ्र ही लौटूँगा।।7।।
श्रीमहादेव जी बोले – इस प्रकार ब्रह्माजी को आश्वासन देकर तथा उन्हें विदा करके श्यामसुन्दररूपिणी उन जगदीश्वरी ने द्वारका का त्याग करके स्वर्गारोहण की कामना करते हुए अपने मंत्रियों से कहा -।।8।।
श्रीकृष्ण जी बोले – मंत्रियों ! यदुवंश में उत्पन्न हुए प्रायः सभी लोग मुनि अष्टावक्र के शाप के कारण मृत्यु को प्राप्त होकर स्वर्ग चले गए। अब इस वंश में कुछ-कुछ वृद्ध वीर पुरुष अवशिष्ट रह गए हैं। उन्हें न तो राज्य अच्छा लग रहा है और न पृथ्वीतल पर रहना ही।।9-10।। अतः श्रेष्ठ मन्त्रिगण ! अब मैं निश्चित रूप से शीघ्र ही स्वर्ग के लिए प्रस्थान करूँगा। आप लोग तत्काल हस्तिनापुर में दूत भेज दीजिये और वे वहाँ जाकर युधिष्ठिर, शत्रुओं का दमन करने वाले मेरे सखा अर्जुन, महाबली भीमसेन और नकुल एवं सहदेव से ब्रह्माजी के परामर्श के अनुसार मेरे स्वर्गारोहण के निश्चय बात बता दें।।11-12।।
श्रीमहादेवजी बोले – श्रीकृष्ण की इस आज्ञा से दुःखी मनवाले सभी मंत्रियों ने शीघ्र ही दूतों को हस्तिनापुर भेजा।।13।। उन दूतों ने वहाँ जाकर धर्मपुत्र महाराज युधिष्ठिर तथा अन्य पांडवों से ‘श्रीकृष्ण स्वर्गारोहण के लिए उद्यत हैं’ – ऐसा कहा।।14।। मुने ! वह बात सुनकर वे पांडव अत्यंत दुःखी हुए और उनके अनुगमन का निश्चय करके वे भी उनके यहाँ आ गए।।15।। द्रौपदी आदि भी सभी स्त्रियाँ भी कृष्ण का अनुगमन करने के लिए मन में निश्चय करके शीघ्रतापूर्वक द्वारका पहुँच गयीं। कृष्ण के स्वर्गारोहण की बात सुनकर अन्य बहुत से लोग भी कृष्ण का अनुगमन करने की इच्छा से उनके पास आ गए।।16-17।। उनकी यथोचित पूजा करके कमल के समान नेत्रों वाले श्रीकृष्ण आँखों में आँसू मधुर तथा गंभीर वाणी में उनसे कहने लगे-।।18।।
श्रीकृष्ण जी बोले – महाराज युधिष्ठिर ! मित्र अर्जुन ! वृकोदर भीम ! मेरे पुर तथा जनपद के निवासियों का आप लोग सर्वदा पालन कीजियेगा; क्योंकि अब मैं पृथ्वीलोक से स्वर्ग चला जाऊंगा।।19।।
श्रीमहादेव जी बोले – उनका यह वचन सुनकर वे पांडव अत्यंत दु:खित हुए और अश्रुपूरित नेत्रोंवाले पाण्डव महात्मा श्रीकृष्ण से अलग-अलग कहने लगे – ।।20।।
युधिष्ठिर बोले – प्रभो ! मैंने तो आपका अनुगमन करने के लिए मन में निश्चय कर लिया है – आप ऐसा जान लें। श्रीकृष्ण ! मैं इस पृथ्वीतल पर आप के बिना एक क्षण भी नहीं रहूँगा।।21।।
भीम बोले – यदुनंदन ! मैं भी आपका अनुगमन करूँगा। कृष्ण ! मैं आपके बिना पृथ्वी पर किसी भी प्रकार नहीं रह सकता।।22।।
अर्जुन बोले – यदुनन्दन ! आप मेरे प्राण हैं, आप मेरी आत्मा हैं, आप मेरी गति हैं तथा आप ही मेरी मति हैं. मैं आपके बिना इस भूमि पर क्षण भर भी नहीं रह सकता।।23।।
नकुल बोले – जगदीश्वर ! मैं भी आपका अनुगमन करूँगा। मैं आपके बिना पृथ्वीतल पर एक क्षण भी नहीं रह सकता।।24।।
सहदेव बोले – स्वामिन ! आपका अनुगमन करने का मेरा निश्चय है, मैं इस पृथ्वी पर कहीं नहीं रहूँगा। आप मेरे प्राण, गति तथा शक्ति हैं और तीनों लोकों में मेरे रक्षक भी आप ही हैं।।25।।
श्रीमहादेव जी बोले – इस प्रकार महात्मा पांडवों का यह निश्चय जानकर भगवान् श्रीकृष्ण अपने अंश से उत्पन्न द्रौपदी से मुस्कुराकर यह वचन कहने लगे – ।।26।।
श्रीकृष्ण जी बोले – कृष्णे ! क्या तुम भूलोक में रहोगी अथवा स्वर्ग चलोगी ? द्रुपदात्मजे ! जो तुम्हारी इच्छा हो, उसे मुझे शीघ्र बता दो।।27।।
द्रौपदी ने कहा – मैं आपके अंश से आविर्भूत हूँ और आप आद्या पराशक्ति कालिका हैं। जिस प्रकार जल क्षणभर में मिल जाता है उसी भांति मैं आपका अनुसरण करुँगी।।28।।
श्रीमहादेव जी बोले – इसके बाद श्रीबलराम ने वहाँ आकर स्वर्गारोहण के लिए उद्यत त्रिलोकपति श्रीकृष्ण से रोते हुए कहा – ।।29।।
श्रीबलराम जी बोले – यदि पृथ्वीलोक छोड़कर आप स्वर्ग जाना ही चाहते हैं तो वृष्णिवंश में उत्पन्न सभी लोगों को साथ लेकर अविलम्ब चल दीजिये। राजन ! वृष्णिवंश में उत्पन्न ये सभी राजागण आपके बिना इस पृथ्वी पर भी नहीं रहेंगे।।30-31।।
श्रीमहादेव जी बोले – तत्पश्चात रेशमी पीताम्बर धारण करने वाले कमलनयन श्रीकृष्ण विप्रों को धन देकर शीघ्रतापूर्वक अपने पुर से निकल पड़े। उनके पीछे-पीछे समस्त वृष्णियों के साथ श्रीबलराम जी और अपने मंत्रियों तथा स्त्रीसमुदाय के साथ पाण्डव भी चल पड़े।।32-33।। मुने ! वे सभी समुद्र के किनारे पहुँच गये और उनके पीछे-पीछे अनेक देशों के जनपदों के निवासी भी वहाँ पहुँच गये।।34।।
इसी समय नंदी, सिंह के द्वारा खींचा जाने वाला रत्नजटित रथ लेकर अंतरिक्ष से वहाँ पर आ गये। मुनिश्रेष्ठ ! ब्रह्माजी कई हजार रथ लेकर देवताओं के साथ अंतरिक्ष में विराजमान हो गए।।35-36।।
समुद्र के तट पर आये हुए कृष्णजी को देखकर श्रेष्ठ देवताओं ने प्रसन्नचित्त होकर महान पुष्प-वर्षा की। वे अनेक प्रकार के मृदंग-नगाड़े और सैकड़ों घण्टे बजाने लगे एवं अप्सराएँ नाचने लगीं।।37-38।। इस प्रकार महान मंगलोत्सव किये जाने पर कमल सदृश नेत्रों वाले कृष्ण ने अचानक काली का रूप धारण कर सिंह के द्वारा खींचे जाने वाले महान रथ पर आरूढ़ होकर और श्रेष्ठ देवताओं तथा मुनीश्वरों से स्तुत होकर ब्रह्मा आदि के देखते-देखते शीघ्र ही कैलास के लिए प्रस्थान किया।।39-40।। महामते ! समुद्र के जल का स्पर्श करके द्रौपदी सभी लोगों के देखते-देखते उन्हीं काली के विग्रह में समाविष्ट हो गयीं।।41।। तदनन्तर साक्षात धर्मावतार तथा ऐश्वर्य संपन्न राजा युधिष्ठिर अद्भुत रथ पर आरूढ़ होकर शीघ्रतापूर्वक दिव्य स्वर्गलोक चले गये।।42।।
मुनिश्रेष्ठ ! श्रीबलराम तथा अर्जुन ने समुद्र का स्पर्श करके अपनी देह का त्याग कर दिया और नवीन मेघ के समान तथा शंख, चक्र, गदा एवं पद्म से सुशोभित चतुर्भुज रूप धारण करके वे गरुड़ पर सवार होकर शीघ्र ही साक्षात वैकुण्ठ को प्राप्त हुए।।43-44।। भीमसेन आदि पाण्डव तथा अन्य वृष्णिवंशी लोगों ने भी उस महासागर में अपना गंभीर शरीर त्यागकर स्वर्ग में स्थान प्राप्त किया।।45।। इस प्रकार सबके स्वर्ग चले जाने पर रुक्मिणी आदि आठ पटरानियाँ शिव-विग्रह धारण कर अपने उत्तम लोक को चली गयीं।।46।। महामुने ! श्रीकृष्ण की अन्य भार्याएँ भी अपने शरीरों का त्याग करके क्षणभर में पूर्व की भाँति भैरवरूप हो गयीं।।47।। कृष्ण के कालीरूप की प्राप्ति सुनकर सत्य का अनुसरण करते हुए श्रीदाम जयारूप में तथा वसुदाम विजयारूप में हो गये।।48।।
इस प्रकार श्यामसुंदर रूपवाली जगन्माता भगवती पृथ्वी का भार मिटाने के लिए भगवान् शम्भु की इच्छा के वशीभूत होकर पृथ्वीतल पर लीलापूर्वक पुरुषरूप में आविर्भूत हुईं और महामते ! अपनी माया से पृथ्वी का भार हरण करके पुनः अपना वास्तविक रूप धारण कर अपने लोक को चली गयीं।।49-50½।।
महामुने ! जगत्प्रभु श्रीविष्णु कल्पांतर में द्वापरयुग के अंत में पृथ्वीतल पर अपने पूर्ण अंश से श्रीकृष्ण के रूप में भगवान् शिव के वर प्रदान से अवतीर्ण होंगे और महामते ! वे अपनी लीला से इसी प्रकार पृथ्वी के भार का हरण करेंगे।।51-52।। पृथ्वीलोक में जो लोग जगदम्बिका के कृष्णावतार का चरित्र सुनते हैं और पढ़ते हैं, वे इस लोक में अतुलनीय सुख प्राप्त करके अंत में देवताओं के लिये भी दुर्लभ देवीपद प्राप्त करते है।।53।।
।। इस प्रकार श्री महाभागवत महापुराण के अंतर्गत ‘स्वर्गयात्रागमन’ नामक अठ्ठावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ।।
