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क्यों मनाया जाता है कुंभ पर्व

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कुंभ पर्व के स्नान का हिन्दु धर्म में बहुत महत्व माना गया है लेकिन यह पर्व क्यों आरंभ हुआ और कैसे हुआ, इसके विषय में कई मान्यताएँ तथा कथाएँ प्रचलित हैं. वेदों में कुंभ पर्व का आधार सूत्रों व मंत्रों में वर्णित है लेकिन हमारे पुराणों में इस पर्व को मनाने की चार कथाएँ दी गई हैं. पहली कथा भगवान शिव तथा गंगा जी की है, दूसरी महर्षि दुर्वासा की कथा है, तीसरी कथा में कद्रू – विनता का वर्णन मिलता है और चौथी कथा समुद्र मंथन की है जो अभी तक मान्य मानी गई है और उसी के अनुसार कुंभ पर्व मनाने का प्रचलन है. समुद्र मंथन की यह कथा काफी प्रचलित व प्रसिद्ध है.

 

समुद्र मंथन की कथा – Story of Samudra Manthan

स्कन्दपुराण की कथानुसार एक बार भगवान विष्णु के निर्देश पर देवताओं तथा असुरों ने मिलकर अमृत भरे कुंभ को समुद्र से निकालने के लिए समुद्र मंथन का आयोजन किया. भगवान विष्णु का कछुए का रुप समुद्र के मध्य गया और दोनों ने संयुक्त रुप से मिलकर क्षीरोद सागर के मध्य मंदरांचल पर्वत को कछुए की पीठ पर् रखा और उसके चारों ओर वासुकि नाग लपेटे गए जिससे मंदरांचल पर्वत मथानी बना और वासुकि नाग मथानी को हिलाने वाली नेती अर्थात रस्सी बने, फिर जिस तरह से दही मथकर मक्खन निकाला जाता है ठीक वैसे ही वासुकि नाग की सहायता से समुद्र को मथा गया. जब समुद्र का मंथन किया गया तब उसमें से 14 वस्तुएँ बाहर आई.

 

  1. सबसे पहले हलाहल विष उत्पन्न हुआ जिसे भगवान शिव ने पी लिया और विष पीने पर उनका कंठ नीला हो गया जिससे उन्हें नीलकंठ कहा जाने लगा. जब विष की ज्वाला शांत हो गई तब दुबारा समुद्र मंथन किया गया.
  2. दूसरी बार पुष्पक विमान निकला.
  3. तीसरा ऎरावत हाथी निकला.
  4. चौथी वस्तु पारिजात वृक्ष थी.
  5. नृत्यकलाओं में प्रवीण रंभा अप्सरा भी समुद्र मंथन के समय निकली.
  6. कौस्तुभ मणि निकली.
  7. द्वितीया तिथि का बाल चंद्रमा.
  8. कानों के कुण्डल निकलकर आए.
  9. धनुष निकला.
  10. कामधेनु गाय निकली.
  11. अश्व ( उच्चै श्रवा) निकला.
  12. लक्ष्मी जी की उत्पति भी समुद्र मंथन से हुई.
  13. धनवन्तरि निकले
  14. देव शिल्पी विश्वकर्मा उत्पन्न हुए.

 

धनवन्तरि जी समुद्र मंथन से निकले तब उनके हाथों में ही अमृत भरा कुंभ भी था. कुंभ ऊपर तक अमृत से लबालब भरा हुआ था. भगवान विष्णु जी की कृपा से यह अमृत कुंभ इन्द्र को मिला. अमृत मंथन में राक्षसों ने भी अपना पूरा योगदान दिया था इसलिए वह भी अमृत पाने के लिए उतावले हो रहे थे लेकिन देवता अमृत देना नहीं चाहते थे क्योंकि राक्षस अमृतपान करते तो वह भी सदा के लिए अमर हो जाते इसलिए देवताओं के इशारे पर इन्द्र के पुत्र जयन्त अमृत कुंभ को लेकर वहां से भागने लगे तब उन्हें भागता देख राक्षस भी उनके पीछे भागने लगे. अमृत को पाने के लिए राक्षसों व देवताओं में बारह दिव्य दिनों तक युद्ध होता रहा. यह बारह दिव्य दिन मनुष्यों के बारह वर्ष के समान थे.

 

इस बारह दिव्य दिनों में या मनुष्यों के इन बारह वर्षों में अमृत कुंभ को बचाने के लिए पृथ्वी के जिन – जिन स्थानों पर अमृत की बूँदे गिरती रही उन – उन स्थानों पर कुंभ का महापर्व मनाया जाता है जो बारह वर्षों में ही आता है. यह चार स्थान प्रयाग, हरिद्वार, उज्जैन तथा नासिक हैं. पुराणों के अनुसार अमृत कुंभ की रक्षा में बृहस्पति, सूर्य व चंद्रमा का विशेष योगदान था इसीलिए सूर्य, चन्द्र तथा बृहस्पति ग्रहों के विशेष योग से ही कुंभ महापर्व का आयोजन होता है.

 

उज्जैन – कुंभ महापर्व 2016 (सिंहस्थ गुरु से) 

वर्ष 2016 में भी कुंभ महापर्व उज्जैन में शिप्रा नदी के किनारे आयोजित हो रहा है. इस वर्ष वैशाख पूर्णिमा, 21 मई दिन शनिवार को यह पर्व आरंभ होगा. यह कुंभ सिंहस्थ गुरु में ही मनाया जाता है जो इस बार उज्जैन में हो रहा है इसलिए कई जगह पर इसे सिंहस्थ महापर्व भी कहा गया है.

 

कुंभ महापर्व – उज्जैन की प्रमुख स्नान तिथियाँ – Main Dates of Holy Bath in Ujjain 2016 

 

उज्जैन के सिंहस्थ कुंभ का शाही स्नान केवल एक बार ही होता है. ऎसे स्थानों पर कई बार भीड़ के कारण अरुणोदय काल में स्नान मुश्किल होता है तब दिन भर में कभी भी स्नान कर लेना चाहिए क्योंकि कुंभ महापर्व का माहात्म्य पूरे दिन रहता है.

 

अर्द्धकुंभ पर्व – हरिद्वार 2016 – Main Dates of Holy Bathe in Haridwar 2016

इसी वर्ष हरिद्वार में भी अर्द्धकुंभी पर्व मनाया जाएगा. जब सिंह राशि में गुरु आता है और सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है तब उस दिन हरिद्वार में अर्द्धमुंभी पर्व मनाया जाता है. इस दिन लोग हरिद्वार में गंगा जी में स्नानादि करते हैं, जप तथा दानादि भी करते हैं. इनका इस समय बहुत महत्व माना गया है. इस वर्ष चैत्र शुक्ल सप्तमी तिथि, दिन बुधवार, 13 अप्रैल से अर्द्धकुंभी का पुण्य योग बन रहा है. यह पहला मुख्य स्नान होगा लेकिन श्रीगंगा स्नान का मुख्य पुण्यकाल सूर्योदय से पहले अरुणोदय काल 04:27 से 05:57 तक है और संक्रान्ति का विशेष पुण्य समय दोपहर 13:23 के बाद से होगा.

 

अर्धकुंभ पर्व मनाने का कारण

वैसे तो हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन तथा नासिक तीर्थों में क्रमश: बारह-बारह वर्षों में कुंभ का मेला लगता है लेकिन हरिद्वार तथा प्रयाग दो ही ऎसे स्थान हैं जहां अर्धकुंभ पर्व मनाया जाता है. इस पर्व को मनाने के पीछे लोगों का मत है कि मुगल काल में हिन्दु धर्म पर अत्यधिक कुठाराघात होने लगा था. इसी कारण चारों दिशाओं के शंकराचार्यों ने हिन्दु धर्म की रक्षा के लिए हरिद्वार तथा प्रयाग में साधु-महात्माओं तथा विद्वानों को बुलाकर विचार – विमर्श किया था, तभी से हरिद्वार तथा प्रयाग में अर्धकुंभ मेले का आयोजन किया जाने लगा. कुंभ पर्व की ही तरह अर्धकुंभ पर्व पर भी स्नानादि तथा दानादि का महत्व माना गया है. हवन, यज्ञ, मंत्रादि शुभ अनुष्ठानों के करने का माहात्म्य इस समय माना गया है.

 

अर्द्धकुंभ हरिद्वार की प्रमुख स्नान तिथियाँ – Main Dates for Holy Bathe in Haridwar 2016

जो लोग अर्धकुंभ अथवा महाकुंभ पर्व या मेले मे नहीं जा सकते हैं उन्हें अपने शहर अथवा गाँव की नदी, तालाब अथवा पोखर पर दी गई तिथि को स्नानादि करना चाहिए और जो लोग यह भी नहीं कर सकते हैं तब उन्हें दी गई तिथियों में सुबह सवेरे स्नानादि करना चाहिए और अपनी सामर्थ्यानुसार दानादि भी करना चाहिए.

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