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बृहत् पराशर होरा शास्त्र – अथ एकनक्षत्रजन्मशान्त्यध्याय: 

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बृहत् पराशर होरा शास्त्र के 93वें अध्याय में बताया गया है कि पिता-पुत्र,भाई-बहन या भाई-भाई या बहन-बहन या माता और संतान का किन्हीं भी दो पारिवारिक सदस्यों का एक ही जन्म नक्षत्र होता है तो उसे अशुभ माना जाता है, आइए विस्तार से जानें। 

 

श्लोक 1,2 का अर्थ 

पराशर बोले – यदि पिता व पुत्र, पुत्री या माता व संतान अथवा दो भाइयों या भाई-बहनों का एक नक्षत्र में ही जन्म हो तो उनमें से एक को  मृत्युतुल्य कष्ट या मृत्यु हो जाती है। गर्गाचार्यादि द्वारा प्रोक्त शान्ति विधान कहता हूँ। शुभ दिन, शुभ नक्षत्र, चन्द्रबल व ताराबल देखकर, रिक्ता तिथि के अतिरिक्त तिथियों में, भद्रा करण के अतिरिक्त समय में शान्ति विधान करना चाहिए। 

 

श्लोक 3,4,5,6 का अर्थ 

ईशान कोण में कलश स्थापन करके उस पर नक्षत्र देवता की प्रतिमा सोने या चाँदी से निर्मित करके रखें। नक्षत्र के देवता के मंत्र से वहाँ पर पूजा करें। तब लाल कपडे से मूर्त्ति को लपेटकर सम्पूर्ण कलश को दो वस्त्रों में लपेट लें। पश्चात वैदिक विधि से अग्नि प्रज्ज्वलित करके, नक्षत्र मंत्र से 108 आहुतियाँ दें। समिधा, अन्न (चरु) आदि से हवन करें। पश्चात प्रायश्चित्ताहुति, स्विष्टकृत आहुति दें। तब आचार्य एक नक्षत्र जात दोनों का अभिषेक करें। 

पंचवारुण होम ‘त्वन्नोsग्ने’ इत्यादि पाँच आहुति, व्याहृतिहोम करें, अभिषेक से पहले पुनः करें। यही प्रायश्चित होम है। 

 

श्लोक 7,8 का अर्थ 

ऋत्विकों (कर्मकर्त्ता ब्राह्मणों) को दक्षिणा दें। आचार्य को विशेष दक्षिणा दें। लोभ न करते हुए ब्राह्मणों को भोजन कराएँ। नक्षत्र देवता की प्रतिमा का दान करें। अनाज व वस्त्र का दान करें। साथ ही सामर्थ्य होने पर वाहन, बिस्तर, कुर्सी आसन आदि का भी दान करें। 

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