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महाभागवत – देवी पुराण – इकसठवां अध्याय 

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श्रीमहादेव जी बोले – महामते ! युद्ध में दुर्धर्ष वृत्रासुर का संहार करके ऐरावत हाथी पर आरूढ़ होकर सभी देवगणों से घिरे तथा ब्रह्मर्षियों से स्तूयमान एवं विजयोत्सव के लिए उत्सुक देवराज इंद्र ने अपनी पुरी में प्रवेश किया।।1-2।। अपनी सभा में बैठकर नम्रतापूर्वक इंद्र ने श्रेष्ठ देवगणों और देवर्षियों से स्निग्ध गंभीर वाणी में पूछा -।।3।।  

इंद्र बोले – मुनिश्रेष्ठ दधीचि मेरे कथनानुसार अपनी अस्थियाँ मुझे देने के लिए अपना शरीर त्यागकर स्वर्ग चले गये। इस कारण मुझे ब्रह्महत्या का पाप लगा है, मैं उससे कैसे मुक्त होऊँ, इसके लिए अब क्या करुँ? विप्रगण ! आप कृपापूर्वक मुझे बतायें।।4-5।।  

ऋषिगण बोले – वे मुनिश्रेष्ठ दधीचि तो जीवन्मुक्त थे और वे स्वेच्छा से स्वर्ग गये, इस कारण वृत्रसूदन ! आपको पूरी ब्रह्महत्या नहीं लगी है। देवराज ! उस पाप का नाश करने के लिए महापापों का नाश करने वाले अश्वमेघ नामक महायज्ञ को आप करें।।6-7।। महाबुद्धिमान बृहस्पति एवं अन्य देवताओं ने भी ऐसा सुनकर इसमें अपनी सहमति बतायी। तब शांतचित्त होकर इंद्र अंतःपुर में चले गये। देवगण भी अपने-अपने स्थान को गये।।8-9।।  

मुनिश्रेष्ठ ! तब देवराज इंद्र ने विधिपूर्वक बहुत दान-दक्षिणा सहित अश्वमेघ यज्ञ किया।।10।। एक बार देवताओं की सभा में देवर्षि नारद ने पधारकर देवराज से कहा – देवराज ! आपने यद्यपि यज्ञ कर लिया है, किन्तु ब्रह्महत्या अभी भी आपकी लगी हुई है, उसे मिटाने के लिए आपको यत्न करना चाहिए।।11-12।।  

इंद्र बोले – मैंने उस पाप की शान्ति के लिये अश्वमेघ महायज्ञ किया, फिर भी वह वर्तमान ही है, अब आप ही बतायें, मैं क्या करूँ?।।13।।  

नारदजी बोले – बुद्धिमान इंद्र ! आप अपने गुरु गौतम ऋषि के पास जाकर इसका उपाय पूछें। वे मुनि सर्वज्ञ हैं और आपको इसका उपाय अवश्य बताएँगे। गुरु का कथन श्रेष्ठ शास्त्र है, गुरु का कथन श्रेष्ठ तप है। करुणामय गुरु प्रसन्न होकर जैसा कह देते हैं वही होता है, उससे भिन्न्न नहीं, सभी वेदों का यही मत है कि गुरु की आज्ञा के अनुसार कर्म करना ही श्रेष्ठ प्रायश्चित है। उनके आज्ञानुसार कर्म करके पाप से आपकी मुक्ति हो जायेगी।।14-16।।          

श्रीमहादेवजी बोले – ऐसा कहने पर नारदमुनि अपने उत्तम स्थान को चले गए।।17।। उन्होंने मध्यान्ह सूर्य के समान तेजस्वी, सर पर पिङ्गवर्णी जटाओं से सुशोभित और ब्रह्मा के ध्यान में लीन उन महात्मा गौतम को देखा।।18।। वृत्रासुर को मारने वाले इंद्र ने साक्षात शिव के समान अपने गुरु को देखकर उनकी प्रदक्षिणा की और पृथ्वी पर दंडवत गिरकर साष्टांग प्रणाम किया।।19।। समाधि के विराम होने पर गौतम ऋषि ने देवराज को आया जानकर उनसे पूछा – तात ! अब अपनी कुशल बतायें।।20।।  

इंद्र बोले – प्रभो ! आपके दर्शन से ही मेरा सब कुशल-मंगल है। मुने ! जिसके आप जैसे गुरु हों, उसके लिए कहीं अमंगल नहीं हो सकता, किन्तु मुझसे अनजाने में  एक पाप हो गया है, जिसके निस्तार हेतु मैं आप गुरुवर के सम्मुख उपस्थित हुआ हूँ।।21-22।। महामते ! वृत्रासुर के वध के लिए दधीचि मुनि की अस्थियाँ लेने के कारण मुझे दुर्निवारिणी ब्रह्महत्या लग गयी है। उसके शमन के लिये मैंने अश्वमेघ यज्ञ भी किया, किन्तु फिर भी उसका संभवतः निवारण नहीं हो रहा है। गुरो ! मेरा चित्त अत्यंत दुःखी है, नाथ ! आप इस ब्रह्महत्या के निवारण का उपाय मुझे बताइये जिससे मेरा निस्तार हो। धर्म के मर्मज्ञ आप जिसके रक्षक और गुरु हैं, उस पर भी यह बहुत दुःखदायक पाप स्थायी रूप से लग गया है।।23-26।।  

गौतम बोले – वत्स ! तुम दुःखी मत होओ, तुम्हारा पाप बहुत समय तक नहीं टिकेगा। मैं तुम्हारी बात सुनकर उस पूर्व पाप की शान्ति के लिये उपाय बताता हूँ।।27।।  

महर्षि दधीचि कोई साधारण साधारण ब्राह्मण नहीं थे। वे जीवन्मुक्त महात्मा दूसरे विश्वेश्वर के ही समान थे। सुरनन्दन ! उनकी ह्त्या से उत्पन्न तुम्हारा घोर पाप अश्वमेघ यज्ञ से कैसे मिट सकता है ! यदि तुम इस ब्रह्महत्या से मुक्त होना चाहते हो तो वहाँ जाकर महापातकनाशिनी भगवती महाकाली के दर्शन करो।। 28-30।।  

इंद्र बोले – वे पापनाशिनी महाकाली कैसी हैं और कहाँ रहती हैं, यह मुझे बताइये, जिससे मैं जाकर उन महेश्वरी के दर्शन कर सकूँ।।31।।  

गौतम बोले – मैंने वेद और आगम शास्त्रों में जैसे देखा है, वैसा आपको बताया। मुझे नहीं मालूम कि परात्परा महाकाली कहाँ विराजती हैं। सभी श्रुतियों में ऐसा बताया गया है कि महेश्वरी काली के दर्शन से मनुष्य अपने ब्रह्महत्यादिक पापों को भी नष्ट कर देता है।।32-33।।  

इंद्र बोले – मुझे लगता है कि इस पाप से मेरी मुक्ति नहीं हो सकेगी; क्योंकि मुझे कभी यही ज्ञात नहीं हो पायेगा कि वे जगदम्बा कहाँ विराजती हैं।।34।।  

गौतम बोले – तत्त्वदर्शी योगीजन दीर्घकालतक युगांतदर्शिनी उग्र तपस्या से महाकाली के दर्शन करते हैं।  जो ऐसा कर पाता है उसके समक्ष योगगम्या, सनातनी, जगन्माता महाकाली प्रकट हो जाती है। किन्तु तुम तो देवताओं के राजा हो और राष्ट्र का पालन करने वाले हो, राज्यपालन के दायित्व को छोड़कर तुम ऐसा तप कैसे कर सकोगे? इसलिए उनके भुवन में जाने के अतिरिक्त उनके दर्शन का दूसरा कोई उपाय दिखाई नहीं देता। अतः पुरन्दर ! तुम उनकी पुरी का पता लगाकर और वहाँ जाकर ब्रह्मादि के लिए दुर्लभ भगवती महाकाली का दर्शन करो।।35-39।। सुरनायक ! उनकी पुरी को खोजने का उपाय तुम्हें बताता हूँ, तुम्हें सबसे पहले निर्विकार लोकपितामह ब्रह्माजी के पास जाकर पूछना चाहिए। वे यदि स्वयं यत्नपूर्वक खोज करेंगे तो महाकाली की पुरी का पता अवश्य लग जाएगा. अतः महामते ! ब्रह्मा जिसकी खोज करें, उसका पता अवश्य ही हो जाता है – यह मैं सत्य कह रहा हूँ।।40-42।।  

इंद्र बोले – देव ! आपकी आज्ञा कभी व्यर्थ नहीं होगी, मैं ब्रह्माजी के पास जाऊँगा, जिससे कोई उपाय अवश्य होगा।।43।।     

श्रीमहादेवजी बोले – नारदजी ! ऐसा कहकर देवराज ने मुनि की तीन परिक्रमाएं कीं और उन्हें दण्डवत प्रणाम कर अपने मंत्रियों सहित पुष्पक विमान पर बैठकर उन्होंने ब्रह्मलोक के लिए प्रस्थान किया तथा महर्षि गौतम ने जैसा बताया था, वह सारा वृत्तांत उन्हें कह सुनाया।।44-45।। ऐसा सुनकर भगवान् ब्रह्मा ने देवराज इंद्र से कहा कि सुराधिप ! उन महाकाली की नगरी कहाँ है, यह मैं नहीं जानता। देवताओं के कार्य को सिद्ध करने के लिये कृपापूर्वक जब वे स्वयं प्रकट हुई थीं, उसी समय मैंने उन सनातनी ब्रह्मरूपा महाकाली के दर्शन किये थे। तत्पश्चात सभी देवताओं के देखते-देखते वे अंतर्धान हो गयी थीं। मैं इतना ही जानता हूँ, उनकी नगरी का मुझे ज्ञान नहीं।।46-48।।  

इंद्र बोले – ब्रह्मन ! जब आप ही उनकी नगरी को नहीं जानते, तब मैं कैसे जान पाऊँगा और इस ब्रह्महत्यारुपी संचित पाप से मुझे कैसे मुक्ति मिल सकेगी? ।।49।।  

ब्रह्माजी बोले – देवताओं के राजा यदि आपमें यह पातक टिका रहेगा तो स्वर्ग में बहुत-से उत्पात होने लगेगें। इसलिए इस पाप का निवारण करने के लिए मैं निश्चित रूप से प्रयत्नशील हूँ। जगदम्बा की अत्यंत गोपनीय नगरी को मैं सब प्रकार से खोजूँगा। यदि आपके कार्य सम्पादन में भगवती के दर्शन मुझे हो गये तो मैं मुक्त हो जाऊँगा। इससे बढ़कर करणीय कार्य कुछ नहीं है।।50-52।। 

श्रीमहादेव जी बोले – नारदजी ! इस प्रकार देवराज इंद्र को आश्वासन देकर पितामह ब्रह्माजी दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर वैकुण्ठधाम को चले गए।।53।। इंद्र भी अपने पुष्पक विमान पर पीछे-पीछे चलते हुए भगवान् विष्णु के द्वारा रक्षित उत्तम लोक वैकुण्ठधाम गये।।54।। तब ब्रह्माजी ने देवराज इंद्र को आश्वस्त करते हुए कहा कि वत्स ! सुरेश्वर ! मेरी बात सुनो और तुम बाहर ही ठहरो। मैं भगवान विष्णु के धाम के अंदर प्रवेश कर रहा हूँ तब परब्रह्म भगवान् विष्णु की आज्ञा प्राप्त होने पर तुम भी भीतर आ जाना ।।55-56।। ब्रह्माजी के ऐसे वचन सुनकर देवराज इंद्र ने वैसा ही किया। ब्रह्माजी वहाँ पहुँचे, जहाँ जगन्नाथ भगवान विष्णु विराजमान थे। उनके ह्रदय पर कौस्तुभ मणि शोभा पा रही थी, नवीन मेघ के समान उनका श्याम वर्ण था। उन्होंने शंख, चक्र और गदा धारण कर रखे थे तथा लक्ष्मी एवं सरस्वती उनके साथ विराजमान थीं।।57-58।।   

ब्रह्माजी को आया देखकर भगवान् विष्णु ने शुभागमन विषयक प्रश्न पूछे। ब्रह्माजी ने भगवान् से कहा कि आपकी कृपा से सानन्द आगमन हुआ है। जनार्दन ! देवराज इंद्र भी आपके दर्शनार्थ आये हैं और वैकुण्ठ लोक के द्वार पर यहाँ प्रवेश हेतु आपकी आज्ञा की प्रतीक्षा कर रहे हैं।।59-60।। यह सुनकर अच्युत भगवान् विष्णु ने गरुड़ को आज्ञा दी कि देवराज इंद्र को वैकुण्ठ के अंदर ले आओ।।61।।   

मुने ! यह सुनकर गरुड़ शीघ्रतापूर्वक द्वार पर गए और उन्होंने इंद्र को श्रेष्ठ धाम के अंदर प्रवेश कराया।। 62।। इंद्र ने भूमि पर दण्डवत प्रणाम करके हाथ जोड़कर जगत्पति भगवान् विष्णु से कहा कि आपके दर्शन से मैं धन्य हुआ।।63।।  

जब आपके चरणकमल से निकली हुई देवपूजित सौभाग्यशालिनी भगवती गंगा सभी लोकों को पवित्र करती हैं तो सभी देवताओं के वंदनीय आपका इन आँखों से मैं साक्षात दर्शन कर रहा हूँ, यह मेरे पूर्वकृत शुभ कर्मों से उत्पन्न अतुलनीय अहोभाग्य है।।64।। इस प्रकार परमेश्वर भगवान् विष्णु की भक्तिपूर्वक स्तुति करके ब्रह्माजी की आज्ञा पाकर इंद्र ने गौतम मुनि की कही बातें निवेदित कीं। इंद्र की बात सुनकर विस्मित हुए त्रिलोकी के पालनकर्ता कमलापति भगवान् श्रीविष्णु ब्रह्माजी के समक्ष मौन रह गये।।65।।  

।। इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अंतर्गत ‘गौतम के कथनानुसार ब्रह्ममयी स्थानानुसन्धानार्थ देवराज का चतुर्मुख विष्णुलोकगमन’ नामक इकसठवां अध्याय पूर्ण हुआ।।    

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