श्रीमहादेव जी बोले – जब पृथ्वी के भार का हरण करने के लिए महाकाली कृष्ण रूप से अपनी सेना को धृतराष्ट्र पुत्रों की सहायता में नियोजित कर स्वयं पूर्ण रूप से सात्यकि सहित पांडवों के पास चली आयी। महामते ! अनेक देशों के निवासी राजागण पांडवों और कौरवों की सहायता के लिए आए। महामुने ! क्षत्रियों का वैसा एकत्रीकरण न कभी कहीं हुआ था, न होगा ।।1-3।। उस समय वह धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र अनेक देशों के गज, अश्व, रथ और पैदल सैनिकों से व्याप्त हो गया था ।।4।। संसार का सर्वधा विनाश कर देने वाली उस युद्ध संबंधी तैयारी को देखकर भीष्म आदि महात्माओं ने दुर्योधन को रोका ।।5।। श्रेष्ठ, तत्वज्ञ भगवान वेद-व्यास ने स्वयं आकर पुत्र सहित धृतराष्ट्र को बार-बार रोका, लेकिन कालपाश से जकड़े हुए राजा धृतराष्ट्र ने व्यास जी की बात नहीं मानी और कर्ण के परामर्श अनुसार युद्ध के लिए निश्चय किया ।।6-7।। इसके पश्चात धृतराष्ट्र के पुत्र अपने मंत्रियों के साथ युद्ध के लिए शंखों, नगाड़ों और दुंदुभियों की ध्वनि तथा रथों के धुरों की घरघराहट से पृथ्वीतल को कँपाते हुए निकल पड़े।। 8।। उन्हें आया देखकर पांडव पक्ष के महारथियों ने बार-बार शंख ध्वनि के साथ सिंहनाद किया। उस ध्वनि ने पृथ्वी और आकाश को गुंजायमान करते हुए धृतराष्ट्र पुत्रों के मन तथा तेज को सब प्रकार से खींच लिया ।।9-10।।
तव धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर युद्ध में मोर्चा बांधकर डटे हुए भीष्म, द्रोण आदि प्रमुख गुरुजनों को पृथक-पृथक प्रणाम कर और उनसे युद्ध के लिए आज्ञा लेकर पुनः अपने रथ पर आ गए। उसके बाद उन सभी पांडवों ने उत्तम रथों से नीचे कूदकर युद्ध में विजय प्राप्ति के लिए भगवती जगदंबिका की स्तुति की ।।11-12।।
पांडव बोले – देवताओं के द्वारा पूजित चरण कमलों वाली तथा जगत के उद्भव-पालन-संहार की कारण स्वरूपिणी कात्यायनी ! भीषण दुष्टों का नाश करने वाली देवी ! त्रिपुरारिपत्नी ! संसार के महान कष्टों को दूर करने वाली दुर्गा ! हम पर प्रसन्न होइए ।।13।। आप सर्वदा दुष्ट दैत्यों का संहार करती हैं, दुष्टों को विमोहित करती हैं और भक्तों के दु:ख का हरण करती हैं। जगदव्यापिनी ! अचिंत्यरूपा ! जो प्राणी त्रिलोकी में आपकी आराधना करता है उसे कोई कष्ट कभी भी पीड़ित नहीं करता ।।14।।
जगज्जननी आप भगवती को प्रणाम करके ही ब्रह्मा जगत का सृजन करते हैं, विष्णु पालन करते हैं और शम्भु संहार करते हैं। माता ! आप समय-समय पर अपनी लीला से उनका (त्रिदेवों का) भी सृजन, पालन तथा विनाश करती हैं, किन्तु आपका नाश किसी से कभी नहीं होता ।।15।। दु:खों का हरण करने वाली भगवती ! जो लोग युद्धक्षेत्र में आपका स्मरण करते हैं, उनके शरीर में शत्रुओं के बाण प्रवेश नहीं कर पाते। अपितु श्रेष्ठ राक्षसों का संहार करने वाली देवि ! शत्रुओं के शरीर में पूंछ तक प्रविष्ट होने वाले उनके बाण उन शत्रुओं के प्राण हर लेते हैं ।।16।। जो मनुष्य अत्यंत दुर्गम तथा भीषण संग्राम में आपके मंत्र का जप करता है, शत्रुगणों को वह साक्षात काल के समान दिखाई देता है। जिस के मुख से आपका ब्रह्माक्षर स्वरूप मंत्र उच्चारित होता है, आप निश्चित रूप से उसे विजय प्रदान करती हैं ।।17।।
परमेश्वरी ! जो लोग भय की स्थितियों में आपका आश्रय ग्रहण करते हैं, उन्हें इस लोक में तथा परलोक में कहीं भी भय नहीं होता और दूर से ही उनसे भयभीत होकर दुष्टजन त्रस्त होते हुए सभी दिशाओं मे भाग खड़े होते हैं ।।18।।
पूर्वकाल में देवासुर-संग्राम में देवराज इंद्र ने आपकी आराधना करके ही राक्षस समुदाय का संहार किया था और उसी तरह श्री रामचंद्र ने भी आपकी उपासना करके राक्षस कुल का वध किया था। देवी ! आपकी आराधना के बिना यहाँ विजय संभव नहीं है।।19।। अतः हमें विजय प्रदान करने वाली, जगत के प्राणियों द्वारा एकमात्र वन्दनीया, विश्व की आश्रय स्वरूपिणी तथा ब्रह्मा, विष्णु के द्वारा भली भाँति पूजित चरणों वाली आप भगवती की आराधना करते हैं। आप हम लोगों को विजय प्रदान करें; आपकी कृपा से ही हम लोग संग्राम में शत्रुओं का संहार करके विजय प्राप्त करें।।20।।
श्रीमहादेवजी बोले – इस प्रकार महात्मा पांडवों के स्तुति करने से भगवती अत्यंत प्रसन्न हो गयीं और अंतरिक्ष में साक्षात विराजमान होकर उन्होंने वर प्रदान किया।।21।।
देवीं बोली – आप लोग मेरी कृपा से रणक्षेत्र में शत्रुओं को बार-बार मारकर इस राज्य को निष्कंटक रूप में प्राप्त करेंगे। पृथ्वी का भार मिटाने और आप लोगों की विजय के लिए मैं अपनी लीला से वासुदेव श्रीकृष्ण के रूप में उत्पन्न हुई हूँ। अर्जुन के विशाल कपिध्वज रथ में वासुदेव स्वरुप से सदा स्थित रहकर मैं निश्चित रूप से आप लोगों की रक्षा करुँगी। संसार में जो लोग इस स्तोत्र से भक्तिपूर्वक मेरा स्तवन करेंगे, उन्हें मैं सदा विजय प्रदान करुँगी; इसमें संदेह नहीं है।।22-25।।
श्रीमहादेवजी बोले – इस प्रकार यह वर प्राप्त कर महारथी पाण्डुपुत्रों का मुखकमल प्रसन्नता से खिल उठा और उन्होंने युद्ध में अपनी विजय का निश्चय कर लिया।।26।। तत्पश्चात उन पांडवों ने कवच धारण करके स्वर्णमंडित रथों पर आरूढ़ होकर अलग-अलग शंखध्वनि की।।27।। अर्जुन के रथ पर विराजमान बलवान श्रीकृष्ण ने पांचजन्य नामक महान शंख बार-बार तीव्र ध्वनि के साथ बजाया।।28।।
उस शंखध्वनि से पृथ्वी काँप गयी और यह जगत विक्षुब्ध हो उठा। सैनिकों सहित धृतराष्ट्र के सभी पुत्रों के मन में विषाद व्याप्त हो गया। लोक में महारथी के रूप में प्रसिद्द भीष्म कौरवों के सेनाध्यक्ष बने। भीष्म के विद्वेष के कारण कर्ण शस्त्र का त्याग कर के युद्ध में विरत रहा।।29-30।। उसी तरह दस हजार हाथियों के बल वाले वीर भीम पांडवों के सेनापति बने। वे साक्षात दूसरे काल की भाँति प्रतीत हो रहे थे।।31।। महामुने ! भीष्म के साथ दस रातों तक युद्ध होता रहा। नारद ! भीष्म ने अकेले ही पांडव सेना के दस करोड़ सैनिकों का संहार किया।।32।। उसी प्रकार दुर्योधन के भी बहुत-से सैनिक मारे गए। महान बल तथा पराक्रम वाले पांडवों ने उस से भी अधिक संख्या में दुर्योधन के सैनिकों का संहार किया।।33।। संग्राम के दसवें दिन जब सूर्यास्त होने में कुछ समय शेष था, तब अर्जुन ने शिखंडी को आगे करके महास्त्र से भीष्म को मार गिराया ।।34।। सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा करते हुए तथा अपने पिता के वर को सत्य प्रदर्शित करते हुए वे धर्मात्मा महारथी भीष्म शर शैय्या पर स्थित रहे।।35।।
तदनन्तर द्रोणाचार्य को सेनापति बनाकर कर्ण आदि प्रमुख योद्धाओं ने पांच दिन तक पुनः भीषण संग्राम किया।।36।। दुर्योधन के सैनिकों ने अन्यायपूर्ण युद्ध का आश्रय लेकर सुभद्रा पुत्र अभिमन्यु को उस संग्राम में मार डाला। तब महान बल तथा पराक्रम वाले अर्जुन ने जयद्रथ को सूर्यास्त तक मार डालने की प्रतिज्ञा करके अपनी बाण-वर्षा से उसे मार डाला।।37-38।।
इसी प्रकार दोनों ओर की सेनाओं के अन्य लोग भी मारे गए। पाँचवे दिन द्रुपद पुत्र धृष्टद्युम्न के द्वारा द्रोणाचार्य भी मारे गये।।39।।
तत्पश्चात कर्ण के साथ दो दिनों तक उन लोगों का युद्ध हुआ। उसमें कर्ण ने राक्षसेन्द्र वीर घटोत्कच का वध कर दिया और उस कर्ण को भी पाण्डुपुत्र कपिध्वज अर्जुन ने युद्ध में मार गिराया।।40-41।। दोनों सेनाओं के और भी दूसरे राजागण परस्पर यमपुरी चले गए।।42।।
तदनन्तर धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर ने क्रोधित होकर झुके हुए पर्वों वाले बाणों के द्वारा रण में शल्य को मार गिराया।।43।। तत्पश्चात परस्पर विजय की अभिलाषा रखने वाले राजा दुर्योधन और भीमसेन का गदायुद्ध होने लगा। भीम ने अपनी गदा से दुर्योधन का संहार कर दिया और उन महात्मा द्वारा धृतराष्ट्र पुत्र दु:शासन आदि प्रधान योद्धा रणक्षेत्र में पहले ही मार डाले गए थे।।44-45।।
तत्पश्चात अश्वत्थामा ने रात में सोते समय द्रौपदी के पाँचों पुत्रों तथा अत्यंत पराक्रमी धृष्टद्युम्न का संहार कर दिया।।46।। अर्जुन ने झुके हुए पर्वों वाले बाणों का प्रयोग करके चिरंजीवी अश्वत्थामा तथा कृपाचार्य का वध न करके उन्हें संग्राम से पराड्मुख कर दिया।।47।।
मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार अठारहवें दिन तक दोनों ही पक्षों की अठारह अक्षोहिणी सेनाएँ युद्ध मे मारी गयीं। तदनन्तर महारथी पांडवों ने वासुदेव श्रीकृष्ण को साथ में लेकर युद्ध मे मारे गए सभी राजाओं की और्ध्वदैहिक क्रिया भी संपन्न की।।48-49।।
भीष्म पितामह ने माघ महीने की शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को प्राण त्याग किया और महादेवी की कृपा से पांडव राज्य का भोग करने लगे।।50।।
।। इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अंतर्गत ‘महाभारतयुद्धवर्णन’ नामक सत्तावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।
