श्रीमहादेव जी बोले – एक समय की बात है – नारदमुनि वीणा बजाते हुए और भगवान विष्णु की अमृतमयी कथा का गान करते हुए आकाशमार्ग से मथुरा आए। मुनिश्रेष्ठ ! दुष्ट हृदय वाले राजा कंस को एकांत में समस्त गुप्त समाचार बताते हुए वे कहने लगे ।।1-2।।
नारदजी बोले – राजन ! सुनिये, मैं आपके लिए हितकर और अत्यंत गोपनीय बात बता रहा हूँ। नवीन मेघ के समान श्याम वर्ण वाले तथा वनमाला से सुशोभित जो वे महान बलशाली नंदपुत्र श्रीकृष्ण गोकुल में रहते हैं, वे ही देवकी के आठवें गर्भ से निश्चित रूप से उत्पन्न हुए हैं और प्रचंड पराक्रम वाले श्रीबलराम रोहिणी के गर्भ से आविर्भूत हुए हैं। वसुदेव ने उन दोनों को धरोहर के रूप में रखा और वे दोनों वहीं बढ़े। उन दोनों ने आपके तृणावर्त आदि वीरों को अपने बल से मार डाला और जो कन्या आकाश में चली गयी थी, वह नन्द की पुत्री थी। वह निश्चित रूप से आपको ठगने के लिए वसुदेव के द्वारा लाई गयी थी ।।3-6½।।
श्रीमहादेव जी बोले – उन नारद के ऐसा कहने पर उस क्रूर कंस ने देवकीसहित वसुदेव को काट डालने की इच्छा से कुपित होकर तलवार उठा ली। इस पर उन मुनिश्रेष्ठ नारद ने उस कोपाविष्ट राजा कंस को अनेक तरह से समझाकर ऐसा करने से रोका। इसके बाद देवताओं को दर्शन प्रदान करने वाले देवर्षि नारदमुनि अपने आश्रम को लौट गए ।।7-9।। इसके बाद कंस ने मंत्रियों से परामर्श करके अक्रूर को गोकुल में भेज और उनसे कहा कि तुम मेरे आदेश से गोकुल में जाकर नन्द के घर में स्थित बलराम और कृष्ण – इन दोनों वसुदेवपुत्रों को इस मथुरानगरी में छलपूर्वक ले आओ। वहाँ पर मुष्टिक और चानूर आदि प्रधान मल्लयोद्धाओं से मल्लयुद्ध करवाकर मैं उन दोनों महाबली वीरों को मरवा डालूँगा ।।10-12।।
मुने ! इस प्रकार उस अत्यंत दुरात्मा कंस से आज्ञा पाकर अक्रूर रथ पर सवार होकर शीघ्रतापूर्वक गोकुल आ गए। तत्पश्चात नन्द के घर पहुंचकर वे अपने रथ से भूमि पर उतरे और उन्होंने घर में प्रविष्ट होकर वसुदेव के दोनों दुर्जेय वीर पुत्रों को देखा। अक्रूर ने उन दोनों को दंडवत प्रणाम किया और कंस ने जैसा कहा था, वैसा अपने आने का प्रयोजन बताया ।।13-15।।
अक्रूरजी बोले – महान बलशाली आप दोनों – श्रीबलराम और श्रीकृष्ण को मधुपुरी (मथुरा) ले जाने के लिए दुष्ट स्वभाव राजा कंस के भेजने पर मैं यहां आया हूँ। उस कंस ने दुष्ट चेष्टाओं वाले मंत्रियों से मंत्रणा की है और वह पहलवानों से मल्लयुद्ध के द्वारा आप दोनों को मरवा डालेगा ।।16-17।।
मैं तो योगिराज के मुखारविंद से सुनकर दृढ़ रूप से जान गया हूँ कि प्रचंड पराक्रम वाले आप दोनों निश्चित रूप से साधारण मनुष्य नहीं हैं। अपनी लीला से कंस आदि दुष्टों के भार से पृथ्वी को मुक्त करने के लिए आप दोनों परा प्रकृति और पुरुष अपनी माया का आश्रय लेकर पृथ्वी पर आविर्भूत हुए हैं। नन्द और यशोदा के अतिशय भाग्य के कारण छल का आश्रय लेकर दुरात्मा कंस से भय की लीला करते हुए आप दोनों यहाँ रह रहे हैं ।।18-20।। जन्मान्तर में इन दोनों के द्वारा की गई तपस्या का प्रधान तथा उत्तम फल इस लोक में इन्हे सम्पूर्ण रूप से प्राप्त हो गया ।।21।। अब आप यदुराज के आदेश से मथुरा पहुंचकर पृथ्वी के भारस्वरूप इन महाबली कंस आदि दुष्टों को नष्ट कीजिए ।।22।।
महादेव जी बोले – अक्रूर की बात सुनकर मधुपुरी जाने की इच्छा वाले महान बलशाली श्रीबलराम तथा श्रीकृष्ण ने सभी गोपों से कहा – महाप्रतापी राजा कंस को विविध प्रकार के मधुर गव्य (दूध, दही, घृत आदि) प्रदान करने के लिए उन्हें लेकर आप सभी लोग कल प्रातःकाल प्रस्थान कीजिएगा। हम दोनों पृथ्वीपति कंस से मिलने के लिए निश्चितरूप से वहाँ जाएंगे ।।23-24½।।
मुनिश्रेष्ठ ! महामते ! उन दोनों की यह बात सुनकर आश्चर्यचकित मनवाले सभी गोपगणों ने वैसा ही किया ।।25½।। तब उस उत्तम और विचित्र रथ पर चढ़कर प्रातःकाल अक्रूर के साथ वे दोनों मथुरा जाने को तत्पर हुए। उस समय श्रीकृष्ण को देखकर व्रज की सभी गोपांगनाएं रोने लगी। तब उन्हें आश्वासन देकर वे श्रीकृष्ण शीघ्रतापूर्वक रथ चलाते हुए प्रस्थित हुए ।।26-27½।।
मुनिश्रेष्ठ ! नन्द आदि गोपवृन्द भी दधि, दुग्ध आदि गव्य पदार्थ लेकर यदुनन्दन श्रीबलराम तथा श्रीकृष्ण के पीछे-पीछे चल दिए। महाबली श्रीबलराम और श्रीकृष्ण को साथ में लेकर नन्द आदि प्रमुख गोपों से घिरे हुए अक्रूर मधुपुरी पहुँचे ।।28-29½।।
मुने ! श्रीबलराम और श्रीकृष्ण को आया हुआ सुनकर अत्यंत मूर्खबुद्धि उस कंस ने श्रीबलराम और श्रीकृष्ण के वध के लिए दरवाजे पर कुवलयापीड नामक भीषण पराक्रमवाले एक दुष्ट हाथी को नियुक्त कर दिया। श्रीकृष्ण ने अनायास ही उस हाथी की सूँड को पकड़कर उसे पृथ्वीतल पर गिरा दिया और फिर हाथ के प्रहार से उसके मस्तक के दो टुकड़े कर दिए ।।30-32।। तदनंतर महाबली तथा पराक्रमी श्रीबलराम और श्रीकृष्ण अक्रूर के साथ सिंह की भांति दहाड़ते हुए पुर में प्रविष्ट हुए ।।33।।
मुनिश्रेष्ठ ! भय से त्रस्त नन्द आदि बृजवासी भी दधि, दुग्ध आदि उपहार स्वरूप गव्यसामग्री लिए हुए उनके पीछे-पीछे चले। जहाँ पर राजा कंस विराजमान था, वहाँ पर शीघ्र जाकर उन ब्रजवासियों ने उस दुरात्मा कंस को नमस्कार करके भेंट-सामग्री प्रदान की ।।34-35।। इसके बाद मुष्टिक आदि महान बलशाली पहलवानों ने अखाड़े में खड़े प्रचण्ड पराक्रम वाले श्रीबलराम और श्रीकृष्ण को ललकारा ।।36।। महान बल तथा पराक्रम वाले रोहिणी पुत्र श्रीबलराम ने अपनी मुष्टिका के प्रहार से मुष्टिक को धराशायी कर दिया। मुनिश्रेष्ठ ! श्रीकृष्ण ने भी चानूर को आकाश में ऊपर उठाकर और फिर पृथ्वी-तल पर पटक कर मार डाला। इसी प्रकार युद्ध में अपने पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए श्रीबलराम और श्रीकृष्ण ने और भी अन्य सैकड़ों पहलवानों को आधे क्षण में ही धराशायी कर दिया ।।37-39।।
तदनंतर भीषण पराक्रम वाले अपने पहलवानों के धराशायी होने का समाचार सुनकर महान युद्ध देखने की इच्छा से वह कंस मंच के ऊपर चढ़ गया।।40।। महाबली श्रीबलराम और श्रीकृष्ण को देखकर भयाकुल दुष्टात्मा कंस ने दूतों से कहा की इन दोनों को यहाँ से शीघ्र हटाओ। मैं व्रज में रहने वाले सभी दुरात्मा ग्वालों को दंडित करूँगा और दुष्ट चेष्टा वाले नन्द को तो उसकी पत्नी सहित मरवा डालूँगा ।।41-42।।
उस कंस को ऐसा बोलते हुए देखकर श्रीकृष्ण ने आधे क्षण में ब्रह्मांड को विक्षुब्ध करने वाला अपना वह कालिका-विग्रह धारण कर लिया ।।43।। तत्पश्चात कालिकारूप श्रीकृष्ण ने उस दुष्टात्मा कंस के बालों को अपने बाएं हाथ स पकड़कर और फिर उसे अपनी ओर खींचकर तलवार से उसका सिर काट डाला।।44।। मुनिश्रेष्ठ ! उसका सिर काटने के बाद उन कालिका ने उसे देखने के लिए पुनः पूर्व की भांति कृष्ण स्वरूप धारण कर वे श्रीबलराम के साथ पृथ्वी तल पर नाचने लगीं।।45।। नन्द आदि श्रेष्ठ गोपगणों का ह्रदय हर्ष से परिपूर्ण हो गया और वे भी बाँसुरी, वीणा आदि बजाते हुए उस रणक्षेत्र में नाचने लगे। देवता आकाश से पुष्प बरसाने लगे। सभी दिशाएं प्रकाशमान तथा कोलाहल से रहित हो गयी ।।46-47।। इसके बाद श्रीकृष्ण ने बेड़ी में जकड़कर बंधे हुए वसुदेव तथा देवकी के पास जाकर उन्हें प्रणाम करके बंधन से मुक्त किया। कमल सदृश सुंदर मुखवाले अपने उन दोनों पुत्रों को पास में आते हुए देखकर हर्ष के आंसुओं से परिपूर्ण नेत्रों वाले वसुदेव तथा देवकी ने उन्हे अपनी गोद में ले लिया ।।48-49।।
महामुने ! उस समय पति के शोक से व्याकुल होकर उस कंस की सभी रानियाँ हाथों से अपने वक्ष:स्थल तथा सिर पीट-पीटकर विलाप करने लगी। उन सभी रानियों को सांत्वना देकर कमल लोचन श्रीकृष्ण ने उस राज्य पर महाराज उग्रसेन को अभिषिक्त कर दिया।।50-51।। इसके बाद आंसुओं से भरे हुए नेत्रों वाले नन्द का आलिंगन कर वसुदेव जी अपने प्रिय वचनों से उन्हें प्रसन्न करते हुए कहने लगे ।।52।।
वसुदेव जी बोले – मित्र ! मेरे ये दोनों पुत्र आपके घर में बहुत दिनों तक रहे और धर्म के ज्ञाता आपने पिता की भांति इन दोनों का पालन-पोषण किया। धर्म को जानने वाली आपकी भार्या यशोदा ने भी सदा अपने पुत्र की भांति ही मेरे इन पुत्रों का पालन किया है। इस प्रकार आप दोनों मेरे पुत्रों के माता-पिता है । आप परम दयालु हैं और मेरे बंधु हैं। व्रजपते ! अब आप इन दोनों कुमारों को मेरे घर में छोड़कर सभी व्रजवासियों के साथ व्रज चले जाइए। मेरी प्रसन्नता के लिए अब आप इस विषय में कोई सोच-विचार न करें और सखे ! यशोदा से भी मेरी यह बात बता दीजिएगा । । 53-56 । ।
श्रीमहादेव जी बोले – मुने ! वसुदेव के ऐसा कहने पर अश्रूपूरित नेत्रों वाले नन्द लंबी श्वास लेते हुए श्रीबलराम तथा श्रीकृष्ण को एकटक देखने लगे ।।57½।। महामते ! तदनंतर आंसुओं से डबडबाई आंखोवाले श्रीबलराम तथा श्रीकृष्ण भाव विह्वल गदगद वाणी में नन्द से बोले कि यहाँ माता-पिता (देवकी तथा वसुदेव) एवं अन्य बहुत-से दु:खित लोगों को संतोष प्रदान करके आपके पास आकर आप दोनों पिता तथा माता का दर्शन करेंगें ।।58-59½।।
उन दोनों के द्वारा कही गयी यह बात सुनकर नन्द अत्यंत दु:खित हुए और विलाप करते हुए व्रज वासियों सहित अपने नगर व्रज में लौट आए ।।60½।। उनके आने पर कमल के समान अति सुंदर मुखवाले श्रीबलराम तथा श्रीकृष्ण को न देखकर सभी गोपांगनाएं रोने लगीं। मुनिश्रेष्ठ ! उन गोपियों का शोक दूर करने के लिए श्रीकृष्ण ने भक्ति परायण उद्धव को गोकुल भेजा। वहाँ पहुंचकर उद्धव ने श्रीकृष्ण का संदेश देकर श्रीकृष्ण के वियोगजन्य दु:ख से अत्यंत व्याकुल सभी व्रजवासियों को सांत्वना प्रदान की ।।61-63½।। तदनंतर वसुदेव जी ने महामुनि गर्गाचार्य को बुलाकर उन दोनों का विधिपूर्वक द्विज-संस्कार सम्पन्न कराया। महान बलवाले महात्मा श्रीबलराम तथा श्रीकृष्ण को उन्होंने ही सभी शास्त्रों तथा धनुर्वेद आदि की शिक्षा दिलवाई। अपने बंधुओं को प्रसन्न करते हुए वे दोनों रमणीय मथुरा में रहने लगे ।।64-66।।
।। इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अंर्तगत ‘अक्रूर के साथ मधुपुरी आगमन के अनंतर कंस प्रयाण पूर्वक वसुदेव-देवकी दर्शन प्राप्ति’ नामक चवाननवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ।।
