बृहत् पराशर शास्त्र के 101वें अध्याय में नाड़ी मुहूर्तो के साथ अन्य कुछ महत्पूर्ण मुहूर्त्तों का भी वर्णन किया गया है, आइए जानें।
श्लोक 1,2,3,4,5 का अर्थ
पराशर जी बोले – एक मुहूर्त्त का मान 2 घड़ी या 48 मिनट होता है। दिनमान व रात्रिमान में 15वें भाग के बराबर एक-एक मुहूर्त्त नक्षत्र के नाम से या नक्षत्र पति के नाम से समझा जाता है। दिन में रूद्र, सर्प, पितर, वसु, जल, विश्वेदेव, ब्रह्मा, सूर्य, इंद्र, अग्नि, राक्षस, वरुण, अर्यमा व भग ये 15 मुहूर्त्तपति होते हैं।
रात में रुद्र, अजपाद, अहिर्बुध्न्य, पूषा, अश्विनी कुमार, यम, अग्नि, ब्रह्मा, चंद्र, अदिति, गुरु, विष्णु, सूर्य, त्वष्टा, वायु ये मुहूर्त्तपति क्रमशः होते हैं। इसका प्रयोजन यह है कि जैसे देवता का नक्षत्र मुहूर्त्त हो, तदनुसार ही जातक की प्रकृति आदि होती है। अथवा जिस नक्षत्र में जो कार्य करना कहा गया हो, तथा व नक्षत्र न मिले तो उस उस नक्षत्र मुहूर्त्त में व कार्य करना चाहिए।
शिवामुहूर्त्त – श्लोक 6,7,8,9,10,11 का अर्थ
दिनमान व् रात्रिमान का 16वाँ भाग जान लें। एक भाग तुल्य एक मुहूर्त्त होता है। ये मुहूर्त्त पहले शिवजी ने पार्वती जी को कहे थे।
रौद्र, श्वेत,मैत्र, आर्वट, जयदेव, वैराचन, तुर्यदेवत, अभिजित, रावण, बालव, विभीषण, सुनन्दन, याम्य, सौम्य, भार्गव, सवित्र ये मुहूर्त्त क्रमशः दो आवृत्तियों में दिन रात में उदित होते हैं।
रविवार को रौद्र से, सोम को मैत्र से, मंगलवार को जयदेव से, बुधवार को तुर्यदैवत से, गुरुवार को रावण से, शुक्रवार को विभिषण से, शनिवार को याम्य से आरम्भ होकर मुहूर्तों का उदय क्रमश: होता है।
मुहूर्त्त जन्म फल – श्लोक 12,13,14,15
रौद्र में क्रूर स्वभाव वाला, श्वेत में धनवान व गम्भीर, मैत्र में सबका मित्र, आर्वट में कपटाचरण करने वाला, जयदेव में आत्मकार्य नाशक, वैरोचन में समर्थ, लेकिन तमोगुणी, तुर्यदेव में विद्वान्, अभिजित में घर में सब सुखों वाला, रावण में कुलनाशक, बालव में कलहप्रिय, विभीषण में भक्त, नन्दन में सबका प्यारा, याम्य में पापी व जातिच्युत, सौम्य में धनधान्य वाला, भग में परस्त्री लौलुप, सवित्र में बहुत विद्या वाला होता है।
नाड्यांशों का फल – श्लोक 16 से 34 का अर्थ
150 नाड्यांशों का फल कहा जा रहा है। चर राशि में क्रम से, स्थिर राशि में व्युत्क्रम से व् द्विस्वभाव में आधे से (76वें से) गिनना शुरू कर फल जानें।
1) श्रीमान, 2) असफल (रिक्त), 3) मूर्ख, 4) कुशल, 5) धोखेबाज, 6) चतुर, 7) स्त्रीमुग्ध, 8) वेदवेत्ता, 9) वीर, 10) पाचन शक्ति से विकृत, 11) अतिक्रोधी, 12) रोगी, 13) चुगलखोर, 14) घूमने वाला, 15) अपवित्र आचरण वाला, 16) सेवक, 17) सुंदरभाषी, 18) धनी, 19) लोभी, 20) प्रसिद्द विद्वान, 21) बुद्धिमान, 22) श्रीमान, 23) परस्त्री लोलुप, 24) श्रीमान, 25) सुशील, 26) बलवान, 27) गुणवान, 28) यात्री, 29) अनुशासन का पक्का, 30) पातकी, 31) तपस्वी, 32) परस्त्रीलोलुप, 33) कुविचारों वाला, 34) सिंहासनारुढ़, 35) रिक्त (खाली), 36) जटिल विचारों वाला या लम्बी जटाओं वाला, 37) कुल को बदनाम करने वाला, 38) योगी, 39) जितेन्द्रिय या जाग्रत आत्मा वाला, 40) सन्यासी, 41) सेनापति, 42) बुद्धिमान, 43) सुखी, 44) गले हाथों वाला, 45) श्रीमान, 46) एक पुत्र वाला, 47) शास्त्रों का जानकार, 48) दासवृत्ति, 49) महाक्रोधी, 50) परस्त्रीरत, 51) नौकर, 52) रोगी, 53) कुरुप, 54) कुशल, 55) शत्रुजित, 56) पुत्रहीन, 57) शूर, 58) वीर, 59) आक्रामक स्वभाव, 60) कुशल, 61) उदररोगी, 62) ग्रामपति, 63) वेश्याओं से जीविका चलाने वाला, 64) धूर्त, 65) सती स्त्री का पति, 66) शत्रुजेता, 67) बाँझ स्त्री वाला, 68) शराबी, 69) दुष्ट पत्नी वाला, 70) सुखी, 71) विजयी, 72) युद्ध से डरने वाला, 73) चोर, 74) क्रोधी, 75) धनी, 76) धन कमाने के लिए सैकड़ों उपाय करने वाला, 77) शूद्रा का पति, 78) राजा, 79) सेनापति, 80) सत्यवादी, 81) पवित्र, 82) सिररोगी, 83) कोढ़युक्त, 84) प्रमेह रोगी 85) चुगलखोर, 86) सुखी, 87) जल रोगी, 88) कृतज्ञ, 89) निर्दय, 90) विवादग्रस्त, 91) सुन्दर मुख वाला, 92) क्रोधी, 93) कामुक, 94) चतुर, 95) चंचल मनवाला, 96) धनी, 97) वाक् कुशल, 98) अध्ययनशील, 99) सुखी, 100) पुत्रहीन, 101) कृषक, 102) वीर, 103) परस्त्रीरत 104) पवित्र, 105) विद्याहीन, 106) मूर्ख, 107) बुद्धिमान, 108) शास्त्रों में पारंगत, 109) डरपोक, 110) मूर्ख, 111) वाचाल, 112) कार्यकुशल, 113) सुखी, 114) नीतिकुशल, 115) लेखक, 116) नीच, 117) जाति के अनुसार काम करने वाला, 118) चतुर, 119) नौकर, 120) गोबर आदि बेचने वाला, 121) उदार, 122) धन का ठग, 123) सेनापति, 124) जमींदार, 125) वीर (दबंग), 126) लेखक, 127) मूर्ख, 128) जितेन्द्रिय, 129) वाचाल, 130) सदैव काम में व्यस्त, 131) सुखी, 132) अन्नदाता, 133) मधुरभोजी, 134) शिवभक्त, 135) जितेन्द्रिय, 136) कुबड़ा, 137) टेढ़े शरीर वाला, 138) अन्धा, 139) बहरा, 140) धोखेबाज, 141) क्रोधी, 142) नर्तक, 143) क्रोधी, 144) दुर्जन, 145) वेदज्ञ, 146) भाषण कर्त्ता (प्रवक्ता) व गायक, 147) धनी, 148) धन कमाने वाला, 149) संगीतज्ञ, 150) विद्वान् या हुनरमन्द
एक नाड़ी एक राशि लग्न का 150वाँ अंश है। इसे आप पंचाशदुत्तरशतांश भी कह सकते हैं। एक नाड्यांश का मान 12 कला हैं। एक राशि के 30 अंशों में 30*60 = 1800 कला हैं। अतः 1800/150 = 12 कला का एक अंश है।
षष्ट्यंश से विशेष फल – श्लोक 35 से 43 तक अर्थ
एक राशि में 30 कला के बराबर एक षष्ट्यंश होता है। इससे भी पूर्ववत क्रमानुसार चर राशियों में व व्युत्क्रमानुसार स्थिर राशियों से गिनें। द्विस्वभाव राशियों में पूर्वार्ध में स्थिरवत व उत्तरार्ध में चरवत अथवा 31वें अंश से करें। 60 अंशों का फल क्रमशः इस प्रकार है :-
1) वेदज्ञ अध्यापक, 2) सेवक, 3) शास्त्रों को पढ़ाने वाला, 4) घुड़सवार, 5) हाथीसवार, 6) लिपिकर्त्ता (वर्तमान में क्लर्क या टाइपिस्ट), 7) घोड़ों का प्रशिक्षक (वर्तमान में ड्राइविंग सिखाने वाला), 8) अभिनेता, 9) ज्योतिषी), 10) यज्ञकर्त्ता, 11) गुरु, 12) दानी, 13) लापरवाह, 14) मुखिया, 15) दुःखदाता, 16) बाग़-बगीचों से संबंध, 17) फल विक्रेता या ज्ञाता, 18) राजसेवक, 19) वनस्पति या सैनिकों का व्यवसाय करने वाला, 20) नृत्य व गान कुशल, 21) पान या फल विक्रेता, 22) निषिद्ध व्यापार करने वाला, 23) ग्रामों का पति, 24) स्तुति पाठक, 25) ज्योतिषी या भविष्यवक्ता, 26) बुद्धिमान, 27) खुशबू का व्यापारी, 28) दवा निर्माता या विक्रेता या प्रयोक्ता, 29) बहुरुपिया, 30) भारवाहक, 31) बर्तन व्यवसायी, 32) कृषक, 33) व्यवसायी, 34) धातु का कारीगर, 35) चर्म का कारीगर, 36) कृषिकर्ता, 37) शास्त्रवेक्ता, 38) विशिष्ट ज्ञानी, 39) तेजस्वी, 40) रंगने वाला अथवा रंगरेज, 41) व्यापारी, 42) वेदवेत्ता, 43) शास्त्रवेत्ता, 44) स्तुति पाठक, 45) मुखिया, 46) अधिकारी, 47) गणितज्ञ, 48) दंडाधिकारी, 49) हत्यारा या कसाई, 50) ईंधन या लकड़ी कोयले का व्यापारी, 51) फल या जड़ी बूटी का व्यवसायी, 52) शान्ति पूर्ण कार्य करने वाला, 53) सोने का व्यापारी, 54) कृषक, 55) माँस व्यापारी, 56) यज्ञकर्त्ता, 57) अध्यापक, 58) अध्यक्ष या मुखिया, 59) दान देने वाला, 60) सफल या फलादि का व्यापारी।
इसका उपयोग भी नाड्यांशों की तरह वास्तविक लग्नेष्ट शुद्धि में करना चाहिए अथवा व्यवसाय निर्णय में करें।
महानिशा लक्षण (राजयोग) – श्लोक 44, 45 का अर्थ
अर्धरात्रि से एक प्रहर 3 घंटे पहले व 3 घंटे बाद ‘महानिशा’ कहलाती है। 56 घड़ी इष्ट के बाद, सूर्योदय से 1.36 घंटे पहले प्रातः कालसंज्ञा, 57 घडी इष्ट पर अरुणोदय काल, 58 घड़ी पर उषःकाल व् तदनन्तर सूर्योदय काल संज्ञा होती है।
महानिशा के समय (विशेषतया 48 मिनट पहले व 48 मिनट बाद) जन्म होने पर मनुष्य राजा होता है। यदि धन स्थान में (या किसी शुभ स्थान में) एक भी उच्चगत ग्रह हो तो उक्त योग का फल, धन-संपत्ति, यश, सुख, प्रतिष्ठा आदि श्रेष्ठ होता है।
अधिमासकर्म व्यवस्था – श्लोक 46 का अर्थ
गर्भाधान या गर्भसंस्कार, वर्धापन, सेवक नियुक्ति, शवदाह (पिण्डदान, श्राद्धादि, तर्पण), मासिक कार्य, दैनिक नित्य कृत्य अधिमास में भी किए जाते हैं।
गोचर फल व्यवस्था – श्लोक 47 का अर्थ
सूर्य – मंगल राशि प्रवेश के प्रारम्भ में, शुक्र-गुरु राशि प्रवेश के मध्य में, शनि व चन्द्रमा राशि से जाते-जाते व बुध सम्पूर्ण राशि गोचर में फल देता है।
अतिचारी वक्री ग्रह का फल – श्लोक 48 का फल
जब मंगलादि ग्रह अतिचारी या वक्री होते हैं, तब वर्तमान राशि से पूर्व राशि का फल कहना चाहिए. यह सामान्य नियम है, लेकिन बृहस्पति अर्थात गुरु पर यह नियम लागू नहीं होता है, अर्थात बृहस्पति उक्त स्थिति में वर्तमान राशि का ही फल देते हैं।
रात्रि में दान का निषेध – श्लोक 49 का अर्थ
अभिचारादि दुष्ट यज्ञों में, विवाह में, संक्रांतिकाल में, ग्रहण में रात में दान किया जा सकता है, अन्य अवस्थाओं में रात में दान देना निषेध है।
पांचभौतिक स्नान – श्लोक 50,51 का अर्थ
आग्नेय, वारुण,ब्राह्म, वायव्य व दिव्य ये पाँच प्रकार के स्नान होते हैं। भस्म शरीर पर लगाना ये आग्नेय स्नान। नदी आदि में डुबकी लगाना या जल स्नान करना वारुण स्नान। ‘आपोहिष्ठा’ इत्यादि ऋचाओं से शरीर पर जल छिड़कना ब्राह्म स्नान। गायों द्वारा उड़ाई धूलि से लिप्त होना वायव्य स्नान व धूप या वर्षा आदि में स्नान करना दिव्य स्नान होता है।
जल स्नान करने की असामर्थ्य में अन्य प्रकार से स्नान करके यज्ञादि कार्य किए जा सकते हैं। मुहूर्तादि संहिता प्रकरण में इन विषयों का उल्लेख युक्त ही है।
लुप्त संवत्सर ज्ञान – श्लोक 52 का अर्थ
जब बृहस्पति 10 मास से युक्त कुछ अधिक एकराशि में रहकर अतिचारी होने से दूसरी राशि में जाकर व पुनः वक्री होकर पूर्वराशि में न लौटे, तो ‘लुप्त संवत’ होता है। इसमें विवाहादि गुरु बल प्रधान कार्य नहीं होते हैं। लेकिन 1,2,11,12 राशिस्थ गुरु को यह दोष नहीं लगता, अर्थात तब विवाहादि होते हैं, ऐसा मतान्तर प्रचलित है।
तीन जेठ व्यवस्था – श्लोक 53 का अर्थ
यदि वर कन्या दोनों पहली संतान (ज्येष्ठ संतान) हों तो उनका विवाह ज्येष्ठ मास में वर्जित है। यदि कन्या या वर में से कोई एक ज्येष्ठ संतान हो तथा दूसरा ज्येष्ठ न हो, तब उनका विवाह ज्येष्ठ मास में हो सकता है।
सिंहस्थ गुरु व्यवस्था – श्लोक 54 का अर्थ
गंगा व गोदावरी के मध्य देशों में सिंहस्थ गुरु में विवाह नहीं करना चाहिए। लेकिन अन्यत्र मघा नक्षत्रगत गुरु व मीन के सूर्य में कही भी विवाह नहीं करना चाहिए।
ऋतुमती शुद्धि व्यवस्था – श्लोक 55, 56 का अर्थ
यदि किसी रोग के कारण स्त्री को लगातार स्त्राव होता हो तो वह धार्मिक कार्यों में अशुद्ध नहीं होती। 18 दिन के अंतराल पर रजस्वला हो तो तुरंत स्नान करने से ही शुद्ध होती है। यदि 18 दिन के बाद रजस्वला हो तो तीन दिन तक धार्मिक कार्यों के प्रसंग में अयोग्य रहती है। ऐसा भृगुजी ने कहा है।
कन्या का विवाह वर्ष – श्लोक 57 का अर्थ
गर्भ के 9 मास सहित वर्तमान आयुवर्ष यदि विवाह के समय सम हों तो कन्या का विवाह करने से सुख, संपत्ति, धर्म विद्या व आयु की वृद्धि होती है। अर्थात कन्या का विवाह सम संख्यक आयु वर्ष में करना चाहिए।
विषम वर्ष में कन्या का विवाह करने से पति या विवाहित जीवन में अनिष्ट होता है।
मेलापक में नाड़ी दोष परिहार – श्लोक 58 का अर्थ
यदि वर कन्या का नक्षत्र एक हो तथा राशि भी एक हो, लेकिन नक्षत्र के चरण पृथक हों तो नाड़ी वेध दोष रहते हुए भी विवाह शुभ होता है।
विवाह लग्न का एक नियम – श्लोक 59 का अर्थ
वर कन्या के जन्म लग्न से आठवीं राशि लग्न में व अष्टमेश की अधिष्ठित राशि लग्न में बुद्धिमानों को उनका विवाह नहीं करना चाहिए।
शुक्र का अंधत्व – श्लोक 60 का अर्थ
रेवती नक्षत्र से शुरू कर कृतिका के दूसरे चरण तक चन्द्रमा रहने पर ‘शुक्रान्धत्व’ होता है। अतः द्विरागमनादियात्रा में सम्मुख या दाहिने शुक्र रहने पर भी अंधत्व में अशुभ नहीं होता है।
विवाहादि में गोचर – श्लोक 61 का अर्थ
यदि गोचर में सूर्य, चन्द्र व् गुरु तीनों या कोई दो ग्रह निर्बल हों तो अष्टकवर्ग प्रकरणोक्त विधि से गोचर शुद्धि देखकर विवाह या यज्ञोपवीत करना चाहिए।
