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बृहत् पराशर होरा शास्त्र – अथ मूलशान्त्यध्याय 

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बृहत् पराशर होरा शास्त्र के अध्याय 96वें में पराशर जी ने मूलादि नक्षत्रों में जन्म के फलों के साथ मुख्य रूप से उनकी शान्ति के विषय में विस्तार से बताया है। आइए जानें :- 

 

श्लोक 1,2,3 का अर्थ 

पराशर जी बोले – मूल के प्रथम चरण में पिता का, दूसरे चरण में माता का, तीसरे चरण में धन-धान्य का नाश होता है। चौथे चरण में धन लाभ होता है। पिता का अनिष्ट एक वर्ष के अंदर, माता का अरिष्ट 3 वर्षों के अंदर, धन नाश 2 वर्षों के अंदर और एक वर्ष के अंदर स्वयं की हानि होती है। इसीलिए चारों चरणों में ही विधिपूर्वक शान्ति करनी चाहिए। दोष प्रतीत न होने पर भी मूलादि नक्षत्रों की शान्ति से हानि न होकर लाभ ही होता है। इसीलिए चौथे चरण में भी शान्ति करनी ही चाहिए। 

 

शान्ति का समय – श्लोक 4 का अर्थ 

जन्म से बारहवें दिन या 27वें दिन उसी नक्षत्र में या किसी भी शुभ दिन में, जन्म से 8 वर्षों के अंदर विधानपूर्वक शान्ति कार्य करना चाहिए।  

 

शान्ति की विधि – 5,6,7 का अर्थ 

अब शान्ति की विधि कहता हूँ। समतल भूमि पर शुभ स्थान में, गोबर से लीपकर मंडल बनाएं। घर में पूर्व या उत्तर दिशा में मंडप बनाएं। मंडप का नाप पिता के हाथ से 8 हाथ या 4 हाथ वर्गाकार बनाएं। चारों तरफ द्वार, केले के खम्बे, तोरण आदि बनाएँ। कुण्ड निर्माण में यज्ञीयशास्त्र की विधि का पालन करें। 

 

पूजन विधि – श्लोक 8,9,10,11,12 का अर्थ 

चारों दिशाओं में चार कलश, पाँचवाँ रूद्र कलश ईशान कोण में व एक और कलश सौ छेदों वाला रखें। कलश स्थापन की विधि से पाँचों कलश स्थापित करें। पूर्वोक्त प्रकार से 16 माशे या 8 या 4 माशे की नक्षत्र देवता की मूर्त्ति बनाएं। अथवा सामर्थ्यानुसार मूर्त्ति बनाएं। मूल नक्षत्र के अधिपति राक्षस नैऋति की मूर्त्ति दो सिर वाली, काला रंग, भेड़िए जैसा मुख, तलवार व ढाल हाथ में, दिखने में भयानक व राक्षस की सवारी वाली बनाएं। अथवा मूर्त्ति का मूल्य रखकर पूजें। सोने में सब देवताओं का निवास है। अन्य गण्ड नक्षत्रों में उसी नक्षत्र के देवता की मूर्त्ति का निर्माण होगा।  

 

श्लोक 13,14,15,16,17,18,19,20,21,22 का अर्थ 

इसके बाद स्वस्ति वाचन, आचार्य वरण,कलश स्थापन करें। कलशों में तीर्थों का जल, पंचगव्य, शतौषधी (अदरक,तुलसी,सतावर,आवँला) सौ छेद वाले घड़े में रखें। पश्चिम दिशा में एक बांस की टोकरी रखें। सफ़ेद वस्त्र, अक्षत आदि से नैऋति देव की पूजा करें। 

अधिदेव के रूप में इंद्र की, प्रत्यधिदेव के रूप में जल की पूजा करें। अपनी परम्परानुसार सभी देवों का पूजन करें। उसके बाद प्रधान देव व महादेव जी की प्रीत्यर्थ हवन करें। हवन में 108 या 1008 आहुतियाँ दें। मृत्यु निवारण हेतु त्र्यम्बकं मंत्र का जप व हवन भी करें। 

नैऋति के लिए हविष्य (हवन सामग्री) की आहुति नैऋत्य कोण में अग्नि में दें। ‘मोषुण: पराशर’ इत्यादि या ‘यत्तदेवेति’ मंत्र से पूजा व हवन करें। नैऋति के लिए घी व खीर की 108 आहुति दें। अधिदेव व प्रत्यधि देवों की भी आहुतियाँ उन्हीं के मंत्रों से दें। 

उसके बाद ‘जातवेदसे सुनवाम’ मंत्र या गायत्री मंत्र, त्र्यम्बकं मंत्र, ‘सीरायुजन्ति’ ‘तामाग्निवर्णा’ मंत्र, ‘वास्तोष्यते’ मन्त्र, ‘क्षेत्रस्यपतिना’ गृणानां मंत्र, ‘अग्निदूतं पुरोदधे मंत्र से श्री सूक्त से घी व चरु की आहुतियाँ दें। 

बाद में ‘या ते रूद्र शिव’ मंत्र से स्रुवा भरकर घी की आहुति दें। बाद में महाव्याहृतियों का व स्विष्टकृत हवन करें। 

 

श्लोक 23,24,25,26,27,28 का अर्थ 

बाद में उत्तम आसन या लकड़ी की पटरी, चौकी आदि पर बैठकर पिता माता व पुत्र का मंत्रवेत्ता आचार्य प्रसन्नतापूर्वक अभिषेक करें। बाद में कपडे से घड़े को लपेटकर शतछिद्र कलश में शतौषधी जल डालते हुए यजमान को स्नान कराएँ। स्नान कराते समय ‘अक्षीभ्यामित्यादी’ सूक्त व ‘पावमानीऋचाओं’ का पाठ करें। आचार्य को दुधारू गाय का दान करें। अन्य ब्राह्मणों को भी दक्षिणा दें व ब्राह्मण भोजन कराएं। \

यत्यायं यच्च में दौ:स्थ्यं सर्वगात्रेष्वस्थितम। 

तत्सर्वं भक्षयाज्यत्वं लक्ष्मीपुष्टिं विवर्धय।।

इस श्लोक को बोलते हुए घी से छाया पात्र का दान करें। उसके बाद शान्त्यध्याय या शान्ति पाठ करके, ब्राह्मणों से आशीर्वाद लें। इस तरह शान्ति विधान करने से मूल दोष का सर्वथा विनाश हो जाता है।  

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