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बृहत् पराशर होरा शास्त्र – अथ गण्डांतशान्त्यध्याय: 

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बृहत् पराशर होरा शास्त्र के 95वें अध्याय में तिथि, नक्षत्र और लग्न गण्डान्त के विषय में बताया गया है और इनके शान्ति विधान का भी विस्तार से उल्लेख किया गया है। 

 

गण्डान्त लक्षण – श्लोक 1,2,3,4,5 का अर्थ 

तिथि, नक्षत्र व् लग्न के भेद से तीन प्रकार का गण्डान्त होता है। इस गण्डान्तकाल का जन्म, यात्रा व विवाह में परम अनिष्टकारक फल मिलता है। 

पूर्णा तिथि (5,10,15) व नन्दा (1,6,11) तिथियों की संधि अर्थात पूर्णा के अंत की 2 घड़ी व नन्दा के आरम्भ की 2 घड़ियाँ, कुल 4 घड़ी का (48-48 मिनट) तिथिगण्डान्त है। 

रेवती व अश्विनी, ज्येष्ठा व मूल, अश्लेषा व मघा की सन्धि की चार घड़ियाँ (48-48 मिनट) नक्षत्र गण्डान्त होती है। 

मीन व मेष लग्न, कर्क व सिंह लग्न, वृश्चिक व धनु लग्न की कुल एक घड़ी अर्थात संधि में आधी-आधी घड़ी ‘लग्न गण्डान्त’ कहलाती है। 

इन गण्डान्तों में भी ज्येष्ठा के अन्त की 5 घडी व मूल के आरम्भ की 8 घडी कुल 13 घड़ी का समय ‘अभुक्त मूल’ कहलाता है। यह सविशेष कष्टप्रद व हानिकारक होता है। 

 

तिथि गण्डान्त शान्ति विधान – श्लोक 6,7,8,9,10 

तिथि या लग्न गण्डान्त में जन्म होने पर सूतक निबट जाने पर शुभ दिन में पिता गण्डान्त शान्ति करे। शान्ति से पहले पिता, संतान का मुख न देखे। 

तिथि गण्ड में बैल का दान, नक्षत्र में गोदान, लग्नगण्डान्त में सोने का दान करने से दोष निवारण होता है। 

गण्डान्त में पूर्व भाग में जन्म हो तो माता व पुत्र का इकट्ठे अभिषेक करें। द्वितीय भाग में जन्म हो तो माता व पुत्र का अभिषेक करें। 

नक्षत्र के आकार की प्रतिमा बनाकर, दो वस्त्र समर्पित करके पूजन करें। 

 

श्लोक 11,12,13,14 का अर्थ 

नक्षत्र मूर्त्ति के लिए 16 मासा या 8 मासे की मूर्त्ति या सामर्थ्यानुसार कम अधिक तोल की मूर्त्ति बनाएं। तिथिगण्ड में तिथि स्वामी की व लग्न गण्ड में राशि स्वामी की मूर्त्ति रखें। तब स्वस्तिवाचनादि कार्य यथाविधि करके 16 उपचारों से पूजा, हवन आदि सब कार्य होगा। समिधा, अन्न (जौ,तिल या खील) व घी का हवन, पूर्णादि होम होगा। उसके बाद विद्वान् ब्राह्मण को तिलपात्र आदि दान करें। ब्राह्मण भोजन भी कराएँ। इस प्रकार करने से दोष का निवारण होता है तथा आयु, आरोग्य व ऐश्वर्य बढ़ते हैं। 

 

नक्षत्र गण्डान्त शान्ति – श्लोक 15,16,17,18 का अर्थ 

नक्षत्र गण्डान्त में 16 पल के काँसे के बर्तन में अथवा 8 या 4 पल के बर्तन में खीर रखें। शंख व मक्खन भी रखें। चाँदी की चंद्र प्रतिमा बनाकर विधिपूर्वक पूजन करें। यह विधि मूलशांति के अतिरिक्त होगी। 

पूर्वोक्त चन्द्रमा के मंत्र का 1000 बार जप करें। ‘आप्यायस्व’ इत्यादि मंत्र से पूजन करें। शेष समस्तविधि लग्नगण्डान्तादि की तरह होगी। ऐसा करने से दोष शान्ति होकर सब प्रकार से कल्याण होता है। जिस प्रकार पानी में रहकर भी कमल का पत्ता गीला नहीं होता है, उसी प्रकार दोषकाल में जन्म होने पर भी शान्ति करने से मनुष्य दोष का भागी नहीं होता है। 

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