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बृहत् पराशर होरा शास्त्र – अथ ग्रहणजन्मशान्त्यध्याय: 

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बृहत् पराशर होरा शास्त्र के 94वें अध्याय में महर्षि पराशर ने ग्रहण समय में जन्म के अशुभ प्रभाव व उनका निवारण बताया है, आइए जानें वह क्या हैं। 

 

पराशर बोले – श्लोक 1,2,3,4 

सूर्य व चंद्र ग्रहण के समय जिनका जन्म हो, उन्हें व्याधि, कष्ट, दरिद्रता और मृत्युभय होता है। लोकहितार्थ में उनकी शान्ति कहता हूँ। सूर्य या चंद्रग्रहण हो तो सूर्य की सुवर्णमयी व चंद्रग्रहण हो तो चन्द्रमा की चाँदी की मूर्त्ति बनवाएं। साथ ही राहु की मूर्त्ति सीसे (काँसा आदि) से बनवाएँ। इस प्रकार नक्षत्रनाथ, राहु व सूर्य या चंद्र की, कुल तीन मूर्त्तियाँ बनाना आवश्यक है। 

 

श्लोक 5,6,7,8 का अर्थ 

पवित्र स्थान गोबर से लीपकर वहां पर सुन्दर कपड़ा बिछाएँ। कपडे पर तीनों पूर्वोक्त मूर्त्तियाँ रखें। सूर्य पर रोली से रंगे लाल चावल, लाल चन्दनादि गंध, लाल फूल व सूर्य की प्रसन्नतार्थ गेहूँ, गुड़, लाल कपड़ा, ताँबा आदि भी रखें। 

चन्द्रमा पर सफ़ेद अक्षत, सफ़ेद फूल, सफ़ेद चन्दन आदि व चन्द्रमा के दान की वस्तुएं, चावल, बूरा, सफ़ेद वस्त्र, मोती आदि रखें। राहु की पूजा काले फूल व काले वस्त्र से करें। यहाँ काला व नीला दोनों में से कोई भी ले सकते हैं। नक्षत्रपति को सफ़ेद चावल गन्धादि चढ़ाएं। गन्ध में मूल रूप से चन्दन का ग्रहण है। उसके अभाव में गंगारज या गोपी चन्दन आदि चढ़ा सकते हैं। 

 

पूजा मंत्र – 9,10 श्लोक का अर्थ 

सूर्य पूजा में ‘आकृष्णेन रजसा’ आदि मंत्र, चंद्र के लिए ‘इमं देवा’ आदि मंत्र, राहु के लिए दूर्वा चढ़ाते समय ‘कयानश्चित्रा’ आदि मंत्र पढ़ें। ये मंत्र प्रसिद्द ही हैं। नक्षत्र स्वामी के पूर्वोक्त मंत्र से नक्षत्रेश की पूजा करें। 

 

हवन की समिधा – श्लोक 11,12,13 का अर्थ 

हवन में सूर्य के लिए आक, चन्द्रमा के लिए ढाक, राहु के लिए दूब से हवन करें। नक्षत्र के लिए पीपल या बड़ की समिधा लें। घी, सामग्री व तिलों से हवन करके, कलश जल से यजमान व बालक का अभिषेक करें। 

 

श्लोक 14,15,16 का अर्थ 

उसके बाद स्थिर चित्त से आचार्य का सत्कार पूजनादि करके, अपनी सामर्थ्यानुसार ब्राह्मणों को भोजन कराएं। ब्राह्मणों को प्रणाम करके क्षमा याचना करें। इस विधि से शान्ति करने पर मनुष्य के सब अरिष्ट दूर होते हैं और सौभाग्य बढ़ता है। यह शान्ति विधान भृगुजी ने शौनक को कहा था। 

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