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बृहत् पराशर होरा शास्त्र – अथ कृष्णचतुर्दशीजन्माध्याय: 

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बृहत् पराशर होरा शास्त्र के 90 अध्याय में कृष्ण चतुर्दशी के दिन जातक के जन्म के विषय में बताया गया है कि कब ये शुभ होती है और कब किस प्रकार के कष्ट हो सकते हैं और उनका निवारण क्या है। 

 

पराशर बोले – श्लोक 1,2,3 का अर्थ 

कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के समस्त मान तिथि भोग को 6 से भाग दें। पहले षष्ठांश में जन्म हो तो शुभ है। जातक दूसरे षष्ठांश में पिता को, तीसरे में माता को, चौथे में मां को, पंचम में वंश को, छठे में धन या स्वयं को नष्ट करता है। इसकी शान्ति विधानपूर्वक करनी चाहिए। 

 

पूज्य देवता – श्लोक 4,5 

पूजा के लिए शिवजी की सोने की मूर्त्ति बनवाएं। एक कर्ष, आधा कर्ष या चौथाई कर्ष (तीन माशा तोल) की मूर्त्ति बनवाएं। सिर पर बाल चन्द्रमा, सफ़ेद माला व श्वेत वस्त्र धारण किए, तीन नेत्रों वाली, बैल पर आसीन, वर और अभय मुद्रा धारण किए हुए मूर्त्ति बनाएं। 

 

पूजा विधान – श्लोक 6,7,8,9 का अर्थ 

चारों दिशाओं में चार कलश स्थापित करें। अग्नि कोण में अलग से पाँचवाँ रुद्रकुम्भ स्थापित करें। कलश स्थापन की विधि से अलग रखें। तब अग्निकोण के कलश से आरम्भ कर बारी-बारी से प्रदक्षिणा कम से कम (बाएँ से दाएँ) चलते हुए ‘वारुण मन्त्रों’ से आवाहन करें। 

उसके बाद ‘त्र्यम्बकं यजामहे’ इत्यादि मन्त्र से भक्तिभाव से शिव की पूजा करें। 

पुनः ‘इमं में वरुण’ ‘तत्त्वायामि इत्यादि’ मन्त्रों से, ‘त्वन्नो अग्ने’ व ‘सत्वन्नो अग्ने’ मन्त्रों से सभी कलशों में पूजा आवाहन करें। 

उसके बाद ‘आनोभद्रा’ अथवा ‘भद्राअग्ने’ व पुरुषसूक्त का पाठ करें। उसके बाद ‘कद्रुद्र’ इत्यादि सूक्त का पाठ करें। 

उसके बाद शिवजी का रुद्रसूक्त से अभिषेक व ग्रहों की यथाविधि पूजा करें।  

 

वरुण मन्त्र 

ॐ तत्त्वायामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदा शास्ते यजमानो हविर्भि:।  

अहेडमानो व्वरुणेह बोदध्युरुशं स मा नsआयु: प्रमोषीः।।  

“ॐ वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुणस्य सकम्भ सर्ज्जनीस्थो। वरुणस्य ऋतसदन्यसि वरुणस्य ऋतसदनमसि वरुणस्य ऋतसदनमासीद्।।” 

 

त्र्यम्बकं मन्त्र 

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । 

उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात् ।। 

 

अन्य मन्त्र 

1) इमं में वरुण श्रुधी हवमद्या च मृडय। त्वामवस्युराचके।।

2) त्वम्। नः॒। अ॒ग्ने॒। वरु॑णस्य। वि॒द्वान्। दे॒वस्य॑। हेळः॑। अव॑। या॒सि॒सी॒ष्ठाः॒। 

यजि॑ष्ठः। वह्नि॑ऽतमः। शोशु॑चानः। विश्वा॑। द्वेषां॑सि। प्र। मु॒मु॒ग्धि॒। अ॒स्मत्।।

पुरुष सूक्त :- रुद्राष्टाध्यायी का अध्याय 2, सहस्रशीर्षा इत्यादि 16 मन्त्र। 

आनोभद्राइत्यादि :- प्रसिद्द स्वस्तिवाचन मन्त्र सब को विदित ही हैं। कुद्रूद्रेति मन्त्र इस प्रकार है – 

कद्रुद्राय प्रचेतसे मीह्वुष्टतमाय तव्यसे। वोचेम शंतमं हृदे।  

 

हवन की विधि – श्लोक 10,11,12,13 

समिधा, घी व चरु, तिल, काले उड़द, सरसों से आहुतियाँ दें। पीपल, प्लक्ष (पिलखन), ढ़ाक, खैर की लकड़ी हवन में प्रयुक्त करें। 108 या 28 आहुतियाँ सब मंत्रों की अलग-अलग दें। बाद में त्रयम्बकं मंत्र से व तीनों व्याहृतियों (भूर्भुव: स्वः) से भी तिलों का हवन करें। सब ग्रहों के लिए भी विहित ढंग से हवन करें, तब कल्याण होता है। माता-पिता व जातक का अभिषेक, ब्राह्मण भोजन, छायापात्र दान आदि सब यथाविधि करें। सब विधि किसी योग्य मंत्रवेक्ता ब्राह्मण से संपन्न कराएं। 

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