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पंच महाभूत फल अध्याय 

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बृहत् पराशर होरा शास्त्र के अध्याय 78 में पंच महाभूत अर्थात पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि व आकाश के बारे में विस्तार से बताया गया है। किस ग्रह का सम्बन्ध किस तत्त्व से बनता है, उसके फलों का वर्णन इस अध्याय में किया गया है। 

 

पराशर जी कहते हैं :- अब मैं पंचमहाभूत – पृथ्वी, जल, वायु, तेज(अग्नि) व आकाश की छाया का ज्ञान बताता हूँ। इससे मनुष्य की वर्तमान दशा, ग्रह प्रभाव व तत्व प्रधानता का अनुमान लगाया जाता है। मंगल – अग्नि, बुध – पृथ्वी, गुरु – आकाश, शुक्र – जल, शनि – वायु तत्व है। इस प्रकार मंगलादि ग्रहों का तत्वों पर अधिकार  होता है। जो ग्रह जन्म समय में बली हो या जिसकी दशा हो, उसी के तत्व की एकदम स्पष्ट अनुभूति जातक में होती है। 

यदि मंगल बलवान हो तो पुरुष अग्नि स्वभाव, बुध से पृथ्वी स्वभाव, गुरु से आकाश स्वभाव, शुक्र से जल प्रकृति व शनि से वात प्रकृति होता है। यदि कई ग्रह प्रधान हों तो सब प्रधान ग्रहों का मिश्रित प्रभाव आता है। इनके लक्षण आगे बताये जा रहे हैं।  

सूर्य प्रधान बली होने से भी अग्नि स्वभाव एवं चंद्र प्रधान होने से जल स्वभाव होता है। अपनी-अपनी दशा में ग्रह अपने तत्व की प्रधानता दिखाते हैं। 

 

वह्निस्वभाव (अग्नि) पुरुष का लक्षण 

अग्नि तत्व प्रधान जातक अधिक भूख वाला, चंचल व फुर्तीला, निडर, पतला, बुद्धिमान, अधिक खाने वाला, तीखा स्वभाव, गोरा रंग व स्वाभिमानी स्वभाव वाला होता है। 

 

भूमि स्वभाव पुरुष का लक्षण 

भूमि स्वभाव  शरीर से स्वाभाविक गंध आती है। कपूर व कमल की खुशबू वाला, भोग भोगने वाला, सदैव सुखी, बलवान, क्षमाभाव से युक्त, शेर की तरह दबंग  धनी  होता है। 

 

आकाश स्वभाव पुरुष का लक्षण 

आकाश स्वभाव व्यक्ति शब्दार्थ को जानने वाला अर्थात बातों के गूढ़ार्थ को समझने वाला, नीति विशारद, ज्ञानी, प्रगल्भ (स्पष्टवादी व खरा), बड़े मुँह वाला, लंबा होता है। 

 

जल स्वभाव पुरुष का लक्षण 

जल स्वभाव व्यक्ति कान्तियुक्त, बहुत भार अर्थात उत्तरदायित्व वाला, प्रिय वचन बोलने वाला, राजा, अनेक मित्रों वाला, कोमल स्वभाव, विद्वान् होता है।  

 

वायु प्रकृति पुरुष का लक्षण 

वायु तत्व प्रधान व्यक्ति दानी स्वभाव वाला, क्रोधी, गौर वर्ण, घूमने का शौक़ीन, राजा, न दबने वाला, पतले शरीर वाला होता है। 

 

अग्नि तत्व की छाया 

जब वह्नि (अग्नि) तत्व की छाया का उदय हो तब शरीर में सोने के समान चमक, शुभ व आकर्षक दृष्टि, सब कामों में सफलता व धन लाभ होता है। 

 

भूमि तत्व की छाया 

भूमि तत्व की छाया का उदय हो तो शरीर में सुन्दर गंध का उदय,त्वचा में कान्ति, दाँतों व नाखूनों में विशेष चमक, धर्म व अर्थ का लाभ, सुख लाभ होता है। 

 

आकाश छाया लक्षण 

आकाश छाया का उदय हो तो वाक्पटुता, सुन्दर व मनोहर बातों को सुनने के अवसर मिलते हैं।  

 

जल छाया लक्षण 

जल छाया का उदय हो तो शरीर में कोमलता, स्वस्थता, अभीष्ट व मनोरथानुकूल भोजन आदि प्राप्त होने के अवसर होते हैं। 

 

वायु तत्व छाया लक्षण 

वायु तत्व की छाया का उदय हो तो मन में मलिनता, विचारों में दृढ़ता व तीव्रता की कमी, निर्णय करने में भूल, वायु रोग, शोक व सन्ताप होते हैं।  

इस प्रकार विद्वानों को मंगलादि ग्रहों की बलवत्ता देखकर उक्त प्रकार से फलादेश करना चाहिए। यदि मंगलादि ग्रह निर्बल हो तो बलानुसार कम फल प्राप्त होता है। 

इसी प्रकार ग्रहों की नीच स्थिति या शत्रु राशिगतत्व होने पर भी विपरीत फल कहें जाएंगे। निर्बल ग्रह होने पर उक्त फलों की प्राप्ति केवल कल्पना लोक में या स्वप्नादि में होती है। 

जिनका जन्म समय अज्ञात होने से दशा/अन्तर्दशा आदि का ज्ञान न हो, उनके शरीर में उदित तत्त्व छाया को देखकर, विद्वान् लोग वर्तमान दशा का ज्ञान कर लें, तथा दुष्ट दशाफल की शान्ति के लिए दशाध्याय में प्रोक्त शान्ति विधान करें। 

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