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जन्म कुंडली में धनयोग

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जन्म कुंडली में धनयोग कई प्रकार से बनता है। एक धनयोग तो प्रत्यक्ष रुप से बनता है तो कई कुंडलियों में व्यक्ति अपने परिश्रम से धनवान बनता है तो कई कुंडलियाँ ऎसी भी होती हैं जिनमें धन अकस्मात बिना किसी परिश्रम के मिल जाता है। कुंडली में मिलने वाले अनेकों प्रकार के धनयोग का वर्णन हम अपने इस लेख में करेगें।

 

2) अकस्मात धनयोग

 

3) आमदनी योग

(उपरोक्त योगों के साथ-साथ जन्म कुंडली का पूर्ण विश्लेषण करना चाहिए क्योंकि एक योग के आधार पर पूरा फलकथन कभी नहीं कहा जा सकता है।)

 

4) अनायास धनयोग

यदि जन्म कुंडली में द्वितीयेश तथा लग्नेश का परस्पर राशि परिवर्तन हो रहा है तब अनायास धन की प्राप्ति जीवन में हो सकती है। (अगर पीड़ा होती है तब ये योग कमजोर हो जाएगा)

 

5) इन्दु योग

यह योग जैमिनी में उपयोग होता है और इस योग का बलाबल अष्टकवर्ग से भी देखा जाता है। इन्दु अर्थात चंद्रमा तो इस गणना में चंद्रमा की भूमिका अहम होती है। इस योग को देखने के लिए कुछ गणना जन्म कुंडली में की जाती है। गणना करने के लिए राहु तथा केतु को शामिल नहीं किया जाता है और बाकी बचे सात ग्रहों की अंक संख्या निर्धारित की गई है जो इस प्रकार से है –

सूर्य             30

चंद्रमा       16

मंगल       6

बुध          8

गुरु        10

शुक्र      12

शनि     1

अब लग्न से नवमेश(9L) तथा चंद्रमा से नवमेश जो भी राशि आती है उसके स्वामियों की संख्या को जोड़कर उसे 12 से भाग दे देते है और जो शेष बचा उसे नोट कर लेते है, अगर शेष शून्य बचता है तब ऎसी स्थिति में 12 की संख्या लेते हैं। अब जन्म कुंडली में चंद्रमा को देखेगे कि वह किस भाव में स्थित है और जो संख्या शेष बची है तो चंद्रमा से गिनकर उस शेष बची संख्या तक गिनती करेगें।

मान लीजिए किसी कुंडली में चंद्रमा सातवें भाव में स्थित है और शेष आठ बचता है तो सातवें भाव से आठ भाव आगे तक गिनेगें जो दूसरा भाव आता है। इस प्रकार दूसरा भाव इन्दु लग्न बनता है। अब इन्दु लग्न का बल देखेंगे कि इसमें अशुभ ग्रह तो नहीं है अथवा इन्दु लग्नेश अशुभ भावों में अथवा अशुभ ग्रहों के साथ तो स्थित नहीं है। जितना बली ये योग होगा उतना अधिक धनकारक होगा।  

यदि इन्दु लग्न में कोई ग्रह स्थित नहीं है तो ज्यादा शुभकारक नहीं माना जाता है तब केवल इन्दु लग्नेश की स्थिति देखी जाती है। अगर इन्दु लग्न में कोई एक शुभ ग्रह स्थित है तब व्यक्ति करोड़पति तक हो सकता है। यदि इन्दु लग्न में कोई एक पाप ग्रह स्थित है तब व्यक्ति लखपति होता है और दो पाप ग्रह स्थित है तब व्यक्ति हजारों में खेलता है।

 

6) करोड़पति योग

 

7) कुबेर योग

यदि जन्म कुंडली के पंचम भाव(5H) में बृहस्पति हो, नवम भाव(9H) में चंद्रमा स्थित हो और तीसरे भाव(3H) में सूर्य स्थित हो तब कुबेर योग बनता है जिसमें व्यक्ति के घर में लक्ष्मी का आगमन धीरे-धीरे बढ़ता जाता है।

 

8) धनवृद्धि योग

 

9) धन संग्रह योग

 

10) धनी योग

 

11) परधन प्राप्ति योग

 

12) पुत्र द्वारा धन योग

कई जातक ऎसे भी होते हैं जो जीवनभर परिश्रम तो करते हैं लेकिन पर्याप्त धन नहीं जुटा पातें लेकिन जब पुत्र धन कमाने लायक होता है तब उसके द्वारा धन प्राप्त करते हैं अथवा पुत्र की सहायता से धन मिलता है। आइए देखें कुंडली के ऎसे कौन से योग होते हैं :-

 

13) पैतृक धन योग

जन्म कुंडली का पहला भाव तन भाव कहलाता है तो दूसरा भाव पैतृक धन होता है, अत: दूसरे भाव का, दूसरे भाव के स्वामी का पंचम व नवम भाव के साथ संबंध होने से पैतृक संपत्ति मिलने के योग बनते हैं।

 

14) माता से धन प्राप्ति योग

जन्म कुंडली के चतुर्थ भाव से माता को देखा जाता है और दूसरा भाव धन भाव होता है तो किसी कुंडली में चतुर्थेश और द्वितीयेश की युति होने पर माता द्वारा धन मिलने की संभावना बनती है। अगर किसी कुंडली में द्वितीयेश पर चतुर्थेश की दृष्टि हो अथवा चतुर्थेश पर द्वितीयेश की दृष्टि पड़ रही हो तब भी माता से धन मिलता है। यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में चंद्रमा दशम भाव में स्थित है तब ऎसा व्यक्ति खेती अथवा व्यापार करता है परंतु माता द्वारा धन भी उसे मिलता है।

 

15) लक्ष्मी योग

जन्म कुंडली के अनुसार सांसारिक सुखों की प्रबलता शुक्र से देखी जाती है और बृहस्पति ग्रह को धन का कारक मानने से धन-संचय का  विचार इनसे किया जाता है।

 

17) लॉटरी योग

 

18) ससुराल से धन प्राप्ति

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