Site icon Astroprabha

जन्मकुंडली में पूर्व-जन्म के फल पहचानने की विधि

Advertisements

जन्मकुंडली भविष्य नहीं बताती,
वह केवल यह दिखाती है कि
पूर्वजन्म में क्या बोया गया था
और इस जन्म में क्या काटना है।

उपरोक्त पंक्तियों को समझने के लिए आदि शंकराचार्य जी द्वारा रचित भज गोविंदम के श्लोकों में से एक का अर्थ यहाँ समझा जा सकता है। 

भज गोविंदम् श्लोक 

“पुनरपि जननं पुनरपि मरणं
पुनरपि जननी जठरे शयनम्।
इह संसारे बहु दुस्तारे
कृपयाऽपारे पाहि मुरारे॥”

अर्थ:
बार-बार जन्म होता है, बार-बार मृत्यु होती है और बार-बार माता के गर्भ में शयन करना पड़ता है। यह संसार, जन्म और मृत्यु का यह अनंत चक्र, अत्यंत कठिन और दुस्तर है। हे मुरारी (भगवान विष्णु), अपनी अपार और निष्काम कृपा से मुझे इस संसार रूपी भवसागर से पार कराइए।

यह श्लोक यह बताता है कि मानव जीवन का दुःख तब तक दोहराया जाता है जब तक अज्ञान और अपूर्ण कर्मों का मूल कारण पूरी तरह समाप्त न हो जाए, और इसके लिए ईश्वर की कृपा तथा आत्मबोध जरूरी है।  

पराशर मुनि के अनुसार—

“वर्तमान जन्म की कुंडली, पूर्व जन्म के कर्मों का ही फल है।”
अर्थात् कुंडली में जो भी सुख-दुःख, योग, दोष, विलंब या विशेषता दिखती है, वह सब पूर्वजन्मीय कर्मों का परिणाम है।

1️⃣ पंचम भाव — पूर्व जन्म का मुख्य संकेतक

पंचम भाव = पूर्व जन्म का पुण्य / बुद्धि / संस्कार

BPHS में पंचम भाव को विशेष रूप से पूर्वजन्मीय संस्कारों का भाव माना गया है।

संकेत:

पंचम भाव जितना शुद्ध, उतना ही पूर्व जन्म श्रेष्ठ

2️⃣ नवम भाव — पूर्व जन्म का धर्म और भाग्य

नवम भाव = पूर्वजन्म का धर्म (Past Life Dharma)

पराशर के अनुसार:

संकेत:

3️⃣ अष्टम भाव — गहरे कर्म और ऋण

अष्टम भाव = संचित कर्म (Deep Karmic Store)

BPHS में अष्टम भाव को:

संकेत:

4️⃣ वक्री (Retrograde) ग्रह — अधूरे पूर्वजन्मीय कर्म

पराशर स्पष्ट करते हैं कि:

वक्री ग्रह असामान्य चेष्टा बल रखते हैं

अर्थ:

वक्री ग्रह पूर्वजन्म के unresolved lessons हैं।

5️⃣ राहु–केतु — सीधे पूर्वजन्म के संकेतक

BPHS में राहु-केतु को:

संकेत:

उदाहरण:

6️⃣ दशा प्रणाली — कर्म फल का समय

पराशर की दशा प्रणाली बताती है:

विशेषकर:

7️⃣ जन्म कुंडली में दुख = पूर्वजन्म का ऋण

BPHS का स्पष्ट सिद्धांत:

जहाँ बार-बार समस्या → वही पूर्वजन्म का कर्म

Exit mobile version