गरुड़ पुराण – आठवाँ अध्याय

मरणासन्न व्यक्तियों के निमित्त किये जाने वाले कृत्य गरुड़ उवाच गरुड़जी बोले – हे प्रभो! आपने आतुरकालिक दान के संदर्भ में भली भाँति कहा। अब म्रियमाण (मरणासन्न) व्यक्ति के लिए जो कुछ करना चाहिए, उसे बताइए।   श्रीभगवानुवाच श्रीभगवान ने कहा – हे तार्क्ष्य ! जिस विधान से मनुष्य मरने पर सद्गति प्राप्त करते हैं,…

गरुड़ पुराण – आठवाँ अध्याय

गरुड. उवाच गरुड़ जी ने कहा – हे तार्क्ष्य ! मनुष्यों के हित की दृष्टि से आपने बड़ी उत्तम बात पूछी है। धार्मिक मनुष्य के लिए करने योग्य जो कृत्य हैं, वह सब कुछ मैं तुम्हें कहता हूँ। पुण्यात्मा व्यक्ति वृद्धावस्था के प्राप्त होने पर अपने शरीर को व्याधिग्रस्त तथा ग्रहों की प्रतिकूलता को देखकर…

गरुड़ पुराण – सातवाँ अध्याय

इस अध्याय में पुत्र की महिमा, दूसरे के द्वारा दिये गये पिण्डदान आदि से प्रेतत्व से मुक्ति की बात कही गई है – इस संदर्भ में राजा बभ्रुवाहन तथा एक प्रेत की कथा का वर्णन है।   सूत उवाच सूतजी ने कहा – ऎसा सुनकर पीपल के पत्ते की भाँति काँपते हुए गरुड़जी ने प्राणियों…

भक्त ध्रुव की कथा

महाराज उत्तानपाद की दो रानियाँ थी, उनकी बड़ी रानी का नाम सुनीति तथा छोटी रानी का नाम सुरुचि था। सुनीति से ध्रुव तथा सुरुचि से उत्तम नाम के पुत्र पैदा हुए। महाराज उत्तानपाद अपनी छोटी रानी सुरुचि से अधिक प्रेम करते थे और सुनीति प्राय: उपेक्षित रहती थी। इसलिए वह सांसारिकता से विरक्त होकर अपना…

भगवान के कपिल अवतार की कथा

भगवान ब्रह्मा ने अपने पुत्र महर्षि कर्दम को सृष्टि की वृद्धि के लिए आदेश दिया। महर्षि कर्दम पिता की आज्ञा स्वीकार करके बिन्दुसर-तीर्थ के समीप जाकर कठोर तपस्या में लग गये। उस समय तप ही मनुष्य की समस्त इच्छाओं की पूर्ति का प्रधान साधन था। महर्षि की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान नारायण प्रकट हुए।…

भगवान नर-नारायण की कथा

भगवान विष्णु ने धर्म की पत्नी रुचि के माध्यम से नर और नारायण नाम के दो ऋषियों के रूप में अवतार लिया। वे जन्म से तपोमूर्ति थे अत: जन्म लेते ही बदरी वन में तपस्या करने के लिए चले गये। उनकी तपस्या से ही संसार में सुख और शान्ति का विस्तार होता है। बहुत से…

मुण्डमाला तन्त्रोक्त महाविद्या स्तोत्रम्

ऊँ नमस्ते चण्डिके चण्डि चण्डमुण्डविनाशिनी। नमस्ते कालिके कालमहाभयविनाशिनि।। शिवे रक्ष जगद्धात्रि प्रसीद हरवल्लभे। प्रणमामि जगद्धात्रीं जगत्पालनकारिणीम्।। जगत् क्षोभकरीं विद्यां जगत्सृष्टिविधायिनीम्। करालां विकटां घोरां मुण्डमालाविभूषिताम्।। हरार्चितां हराराध्यां नमामि हरवल्लभाम्। गौरीं गुरुप्रियां गौरवर्णालंकारभूषिताम्।। हरिप्रियां महामायां नमामि ब्रह्मपूजिताम्। सिद्धां सिद्धेश्वरीं सिद्धविद्याधरगणैर्युताम्।। मन्त्रसिद्धिप्रदां योनिसिद्धिदां लिंगशोभिताम्। प्रणमामि महामायां दुर्गां दुर्गतिनाशिनीम्। उग्रामुग्रमयीमुग्रतारामुग्रगणैर्युताम्। नीलां नीलघनश्यामां नमामि नीलसुन्दरीम्।।     श्यामांगी श्यामघटितां श्यामवर्णविभूषिताम्। प्रणमामि…

दशमहाविद्या – कमला

श्रीमद्भागवत के आठवें स्कन्ध के आठवें अध्याय में कमला के उद्भव की विस्तृत कथा आती है। देवताओं तथा असुरों के द्वारा अमृत प्राप्ति के उद्देश्य से किये गए सनुद्र-मंथन के फलस्वरुप इनका प्रादुर्भाव हुआ था। इन्होंने भगवान विष्णु को पति रूप में वरण किया था। महाविद्याओं में ये दसवें स्थान पर आती हैं। भगवती कमला…

दशमहाविद्या – मातंगी

मतंग शिव का नाम है, इनकी शक्ति मातंगी है। मातंगी के ध्यान में बताया गया है कि ये श्यामवर्णा हैं और चन्द्रमा को मस्तक पर धारण किये हुए हैं। भगवती मातंगी त्रिनेत्रा, रत्नमय सिंहासन पर आसीन, नीलकमल के समान कान्तिवाली तथा राक्षस-समूह रूप अरण्य को भस्म करने में दावानल के समान हैं। इन्होंने अपनी चार…

दशमहाविद्या – वगलामुखी

व्यष्टि रूप में शत्रुओं को नष्ट करने की इच्छा रखने वाली तथा समष्टि रूप में परमात्मा की संहार-शक्ति ही वगला है। पीताम्बरा विद्या के नाम से विख्यात वगलामुखी की साधना प्राय: शत्रु भय से मुक्ति और वाक्-सिद्धि के लिए की जाती है। इनकी उपासना में हरिद्रामाला, पीत-पुष्प एवं पीतवस्त्र का विधान है। महाविद्याओं में इनका…