दशमहाविद्या – धूमावती

धूमावती देवी महाविद्याओं में सातवें स्थान पर मानी जाती हैं। इनके बारे में जो कथा आती है उसके अनुसार एक बार भगवती पार्वती भगवान शिव के साथ कैलाश पर्वत पर बैठी हुई थीं। उन्होंने महादेव से अपनी क्षुधा का निवारण करने का निवेदन किया। कई बार माँगने पर भी जब भगवान शिव ने उनकी तरफ…

चतु:श्लोकी भागवतम्

श्रीभगवानुवाच ज्ञानं परमगुह्यं मे यद्विज्ञानसमन्वितम् । सरहस्यं तदंग च गृहाण गदितं मया ।।1।। अर्थ – श्रीभगवान बोले – (हे चतुरानन!) मेरा जो ज्ञान परम गोप्य है, विज्ञान (अनुभव) से युक्त है और भक्ति के सहित है उसको और उसके साधन को मैं कहता हूँ, सुनो।   यावानहं यथाभावो यद्रूपगुणकर्मक:। तथैव तत्त्वविज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात् ।।2।। अर्थ…

श्री ललिता सौभाग्य कवच स्तोत्रम्

शिखाग्रं सततं पातु मम त्रिपुर-सुन्दरी। शिर: कामेश्वरी नित्या तत् पूर्वं भग-मालिनी।।1।। नित्य-क्लिन्नाSवताद्दक्षं भेरुण्डा तस्य पश्चिमम् । वह्नि-वासिन्यवेद् वामं मुखं विद्येश्वरी तथा।।2।। शिव-दूती ललाटं मे त्वरिता त्सय दक्षिणम् । तद् – वाम – पार्श्वमवतात् तथैव कुल – सुन्दरी।।3।। नित्या पातु भ्रुर्वोमध्यं भ्रुवं नील – पताकिनी। वाम – भ्रुवं तु विजया नयनं सर्व – मंगला।।4।। ज्वाला –…

श्री ललिता त्रिशती

ऊँ ककार रूपा कल्याणी कल्याण गुण शालिनी। कल्याण शैलनिलया कमनीया कलावती।।1।। कमलाक्षी कल्मषघ्नी करुणामृतसागरा। कदम्ब कानन आवासा कदम्बकुसुमप्रिया।।2।। कंदर्पविद्या कंदर्प जन कापांग वीक्षणा। कर्पूर वीटी सौरभ्य कल्लोलित कुकुब् तटा।।3।। कलिदोषहरा कंजलोचना कम्रविग्रहा। कर्मादि साक्षिणी कारयित्री कर्मफलप्रदा।।4।। एकाररूपा च एकाक्षरी एकानेकाक्षराकृति:। एतत् अदित्य निर्देश्या च एकानंद चित् आकृति:।।5।। एवम् इति आगम बोध्या चैकभक्तिमदर्चिता। एकाग्रचित्तनिर्ध्याता चैषणारहितादृता।।6।। एला…

गरुड़ पुराण – छठा अध्याय

गरुड़ उवाच गरुड़ जी ने कहा – हे केशव ! नरक से आया हुआ जीव माता के गर्भ में कैसे उत्पन्न होता है? वह गर्भवास आदि के दु:खों को जिस प्रकार भोगता है, वह सब भी मुझे बताइए। विष्णुरुवाच भगवान विष्णु ने कहा – स्त्री और पुरुष के संयोग से जैसे मनुष्य की उत्पत्ति होती…

दशमहाविद्या – त्रिपुरभैरवी

क्षीयमान विश्व के अधिष्ठान दक्षिणामूर्ति कालभैरव हैं और उनकी शक्ति ही त्रिपुरभैरवी है। ये ललिता या महात्रिपुरसुन्दरी की रथवाहिनी हैं। ब्रह्माण्ड पुराण में इन्हें गुप्त योगिनियों की अधिष्ठात्री देवी के रुप में चित्रित किया गया है। मत्स्यपुराण में इनके त्रिपुरभैरवी, कोलेशभैरवी, रुद्रभैरवी, चैतन्यभैरवी तथा नित्याभैरवी आदि रूपों का वर्णन प्राप्त होता है। इन्द्रियों पर विजय…

गरुड़ पुराण – पाँचवां अध्याय

गरुड़ उवाच गरुड़ जी ने कहा – हे केशव ! जिस-जिस पाप से जो-जो चिह्न प्राप्त होते हैं और जिन-जिन योनियों में जीव जाते हैं, वह मुझे बताइए।   श्रीभगवानुवाच श्रीभगवान ने कहा – नरक से आये हुए पापी जिन पापों के द्वारा जिस योनि में आते हैं और जिस पाप से जो चिह्न होता…

काशी-स्तुति

सेइत सहित सनेह देह भरि, कामधेनु कलि कासी। समनि सोक-संताप-पाप-रुज, सकल-सुमंगल-रासी।।1।। अर्थ – इस कलियुग में काशी रुपी कामधेनु का प्रेम सहित जीवन भर सेवन करना चाहिए. यह शोक, सन्ताप, पाप और रोग का नाश करने वाली तथा सब प्रकार के कल्याणों की खानि है.   मरजादा चहुँओर चरनबर, सेवत सुरपुर-बासी। तीरथ सब सुभ अंग…

श्रीसिद्धसरस्वती स्तोत्रम्

दोर्भिर्युक्ताश्चतुर्भि: स्फटिकमणिमयीमक्षमालां दधाना हस्तेनैकेन पद्मं सितमपि च शुकं पुस्तकं चापरेण । या सा कुन्देन्दुशंखस्फटिकमणिनिभा भासमाना समाना सा मे वाग्देवतेयं निवसतु वदने सर्वदा सुप्रसन्ना ।।11।।   आरूढ़ा श्वेतहंसे भ्रमति च गगने दक्षिणे चाक्षसूत्रं वामे हस्ते च दिव्याम्बरकनकमयं पुस्तकं ज्ञानगम्या । सा वीणां वादयन्ती स्वकरकरजपै: शास्त्रविज्ञानशब्दै: क्रीडन्ती दिव्यरूपा करकमलधरा भारती सुप्रसन्ना ।।2।।   श्वेतपद्मासना देवी श्वेतगन्धानुलेपना ।…

गरुड़ पुराण – चौथा अध्याय

नरक प्रदान करने वाले पाप कर्म   गरुड़ उवाच गरुड़ जी ने कहा – हे केशव ! किन पापों के कारण पापी मनुष्य यमलोक के महामार्ग में जाते हैं और किन पापों से वैतरणी में गिरते हैं तथा किन पापों के कारण नरक में जाते हैं? वह मुझे बताइए।   श्रीभगवानुवाच श्रीभगवान बोले – सदा…

भवानी स्तुति

दुसह दोष-दुख, दलनि, करु देवि दाया । विश्व-मूला-Sसि, जन-सानुकूलाSसि, कर शूलधारिणि महामूलमाया ।।1।।   तडित गर्भांड्ग सर्वांड्ग सुन्दर लसत, दिव्य पट भव्य भूषण विराजैं । बालमृग-मंजु खंजन-विलोचनि, चन्द्रवदनि लखि कोटि रतिमार लाजैं ।।2।।   रूप-सुख-शील-सीमाSसि, भीमाSसि, रामाSसि, वामाSसि वर बुद्धि बानी । छमुख-हेरंब-अंबासि, जगदंबिके, शंभु-जायासि जय जय भवानी ।।3।।   चंड-भुजदंड-खंडनि, बिहंडनि महिष मुंड-मद-भंग कर…

रोग के संबंध में नक्षत्रों की भूमिका

ज्योतिष में कुल 27 नक्षत्रों की बात कही गई हैं और ज्योतिष चिकित्सा में ये 27 नक्षत्र ही अपना महत्व रखते हैं. इन सत्ताईस नक्षत्रों के अलावा एक अठ्ठाईसवाँ नक्षत्र अभिजित भी माना गया है. इस नक्षत्र का विस्तार उत्तराषाढ़ा के बाद और श्रवण नक्षत्र से पहले माना गया है. ज्योतिष में सामान्यतया अभिजित नक्षत्र…