चतु:श्लोकी भागवतम्

श्रीभगवानुवाच ज्ञानं परमगुह्यं मे यद्विज्ञानसमन्वितम् । सरहस्यं तदंग च गृहाण गदितं मया ।।1।। अर्थ – श्रीभगवान बोले – (हे चतुरानन!)

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श्री ललिता सौभाग्य कवच स्तोत्रम्

शिखाग्रं सततं पातु मम त्रिपुर-सुन्दरी। शिर: कामेश्वरी नित्या तत् पूर्वं भग-मालिनी।।1।। नित्य-क्लिन्नाSवताद्दक्षं भेरुण्डा तस्य पश्चिमम् । वह्नि-वासिन्यवेद् वामं मुखं विद्येश्वरी

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श्री ललिता त्रिशती

ऊँ ककार रूपा कल्याणी कल्याण गुण शालिनी। कल्याण शैलनिलया कमनीया कलावती।।1।। कमलाक्षी कल्मषघ्नी करुणामृतसागरा। कदम्ब कानन आवासा कदम्बकुसुमप्रिया।।2।। कंदर्पविद्या कंदर्प

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दशमहाविद्या – त्रिपुरभैरवी

क्षीयमान विश्व के अधिष्ठान दक्षिणामूर्ति कालभैरव हैं और उनकी शक्ति ही त्रिपुरभैरवी है। ये ललिता या महात्रिपुरसुन्दरी की रथवाहिनी हैं।

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काशी-स्तुति

सेइत सहित सनेह देह भरि, कामधेनु कलि कासी। समनि सोक-संताप-पाप-रुज, सकल-सुमंगल-रासी।।1।। अर्थ – इस कलियुग में काशी रुपी कामधेनु का

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श्रीसिद्धसरस्वती स्तोत्रम्

दोर्भिर्युक्ताश्चतुर्भि: स्फटिकमणिमयीमक्षमालां दधाना हस्तेनैकेन पद्मं सितमपि च शुकं पुस्तकं चापरेण । या सा कुन्देन्दुशंखस्फटिकमणिनिभा भासमाना समाना सा मे वाग्देवतेयं निवसतु

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