माघ माहात्म्य – छब्बीसवाँ अध्याय

पथिक कहने लगा कि हे प्रेत! तुमने सारस के वचन किस प्रकार और क्या सुने थे. सो कृपा करके कहिए. प्रेत कहने लगा कि इस वन में कुहरा नाम की नदी पर्वत से निकली है. मैं घूमता-घूमता उस नदी के किनारे पहुंचा और थकावट दूर करने के लिए वहाँ पर ठहर गया. उसी समय लाल…

माघ माहात्म्य – पच्चीसवाँ अध्याय

पिशाच कहने लगा कि हे मुनि! केरल देश का ब्राह्मण किस प्रकार मुक्त हुआ यह कथा कृपा करके विस्तारपूर्वक कहिए. देवद्युति कहने लगा केरल देश में वासु नाम वाला एक वेद पारंगत ब्राह्मण था. उसके बंधुओं ने उसकी भूमि छीन ली जिससे वह निर्धन और दुखी होकर अपनी जन्मभूमि त्यागकर देश-विदेश में घूमता किसी व्याधि…

माघ माहात्म्य – चौबीसवाँ अध्याय

लोमश जी कहने लगे कि वह राजा पहले तो तामिश्र नामी नरक में गया फिर अंध तामिश्र नरक में जहाँ पर अति दुखों को प्राप्त हुआ. फिर महारौरव, फिर कालसूत्र नामी महा नरक में गया, फिर मूर्छा को प्राप्त हो गया. मूर्छा से चेतना आने पर तापन और संप्रतापन नाम के नरक में गया. अनेक…

माघ माहात्म्य – तेईसवाँ अध्याय

लोमश ऋषि कहने लगे कि जिस पिशाच को देवद्युति ने मुक्त किया वह पहले द्रविड़ नगर में चित्र नाम वाला राजा था. वह बड़ा शूरवीर, सत्य परायण तथा पुरोहितों को आगे करके यज्ञ आदि करता था. दक्षिण दिशा में उसका राज्य था और उसके कोष धन से भरे हुए थे. उसके पास बहुत से हाथी-घोड़े…

माघ माहात्म्य – बाईसवाँ अध्याय

इतना कहकर भगवान अन्तर्ध्यान हो गए तब देवनिधि कहने लगे हे महर्षि! जैसे गंगाजी में स्नान करने से मनुष्य पवित्र हो जाता है वैसे ही भगवान की इस कथा को सुनकर मैं पवित्र हो गया. कृपा करके उस स्तोत्र को कहिए जिससे उस ब्राह्मण ने भगवान को प्रसन्न किया. लोमशजी कहते हैं कि उस स्तोत्र…

माघ माहात्म्य – इक्कीसवाँ अध्याय

लोमश जी कहने लगे कि पूर्व काल में अवंती देश में वीरसैन नाम का राजा था. उसने नर्मदा के किनारे राजसूय यज्ञ किया और अश्वमेघ यज्ञ भी किए जिनके खम्भे सोने के बनाए गए. ब्राह्मणों को अन्न का बहुत-सा दान किया और बहुत-सी गाय, सुंदर वस्त्र और सोने के आभूषण दान में दिए. वह देवताओं…

माघ माहात्म्य – बीसवाँ अध्याय

वेदनिधि कहने लगे कि हे महर्षि! धर्म को जल्दी ही कहिए क्योंकि श्राप की अग्नि बड़ी दुखकारक होती है. लोमश ऋषि कहने लगे कि यह सब मेरे साथ नियमपूर्वक माघ स्नान करें. अंत में यह श्राप से छूट जाएंगे. मेरा यह निश्चय है शुभ तीर्थ में माघ स्नान करने से शाप का फल नष्ट हो…

माघ माहात्म्य – उन्नीसवाँ अध्याय

वह पाँचों कन्याएँ इस प्रकार विलाप करती हुई बहुत देर प्रतीक्षा करके अपने घर लौटी. जब घर में आईं तो माताओं ने कहा कि इतना विलम्ब तुमने क्यों कर दिया तब कन्याओं ने कहा कि हम किन्नरियों के साथ क्रीड़ा करती हुई सरोवर पर थी और कहने लगी कि आज हम थक गई हैं और…

माघ माहात्म्य – अठारहवाँ अध्याय

श्री वशिष्ठ ऋषि कहने लगे कि हे राजन! मैंने दत्तात्रेयजी द्वारा कहा माघ मास माहात्म्य कहा, अब माघ मास के स्नान का फल सुनो. हे परंतप! माघ स्नान सब यज्ञों, व्रतों का और तपों का फल देने वाला है. माघ मास में स्नान करने वाले स्वयं तो स्वर्ग में जाते ही हैं उनके माता और…

माघ माहात्म्य – सत्रहवाँ अध्याय

अप्सरा कहने लगी कि हे रा़क्षस! वह ब्राह्मण कहने लगा कि इंद्र इस प्रकार अपनी अमरावती पुरी को गया. सो हे कल्याणी! तुम भी देवताओं से सेवा किए जाने वाले प्रयाग में माघ मास में स्नान करने से निष्पाप होकर स्वर्ग में जाओगी, सो मैंने उस ब्राह्मण के यह वचन सुनकर उसके पैरों में पड़कर…

माघ माहात्म्य – सोलहवाँ अध्याय

कार्तवीर्य कहने लगा कि हे भगवान! वह राक्षस कौन था? और कांचन मालिनी कौन थी? उसने अपना धर्म कैसे दिया और उनका साथ कैसे हुआ. हे ऋषि! अत्रि ऋषि की संतानों के सूर्य! यह कथा सुनाकर मेरा कौतूहल दूर कीजिए तब दत्तात्रेयजी कहने लगे कि राजन इस पुरातन विचित्र इतिहास को सुनो – कांचन मालिनी…

माघ माहात्म्य – पंद्रहवाँ अध्याय

दत्तात्रेयजी कहने लगे कि हे राजन! प्रजापति ने पापों के नाश के लिए प्रयाग तीर्थ की रचना की. सफेद (गंगाजी) और काली(यमुनाजी) के जल की धारा में स्नान का माहात्म्य भली प्रकार सुनो. जो इस संगम में माघ मास में स्नान करता है वह गर्भ योनि में नहीं आता. भगवान विष्णु की दुर्गम माया माघ…